आर्टिकल 370 खत्म करना संघ फिर जनसंघ और अब की भाजपा का पुराना संकल्प था वो उन्होंने पूरा किया। उनकी विचारधारा से मेरी घनघोर असहमतियां हैं लेकिन इस विषय पर उनसे कोई गिला-शिकवा नहीं हैं। वो जो करना चाहते थे, उन्होंने किया। भले ही इसके लिए कोई भी रास्ता अपनाया हो।
मेरी आपत्तियां उनसे हैं जो कश्मीर के न होकर जश्न मना रहे हैं। उनसे हैं जो ‘जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है’ का नारा बुलंद करते थे लेकिन कह रहे हैं कि कश्मीर आज भारत का हिस्सा बना है। कश्मीर से बाहर रहने वाले ऐसे लोग इसलिए जश्न नहीं मना रहे हैं कि इससे उन्हें कुछ हासिल होगा वो जश्न के मूड में इसलिए हैं कि मुस्लिम बाहुल्य राज्य कश्मीर को मिल रहा स्पेशल स्टेटस का दर्जा खत्म हुआ।
जी हाँ, मुस्लिम बाहुल्य राज्य जो उनके अंदर पल रहे राष्ट्रवाद के जुनून को बढ़ावा देता है। उन भावनाओं को हवा मिलती जो उनके मन में संघ के बौद्धिक कार्यक्रमों में डाली गई है।
दरअसल ऐसी जमात कश्मीर को एक भूमि का टुकड़ा भर मानता है। इसलिए एक जमीन को जीतने के लिए एक राजा जो करता है वही उनके आराध्य ने किया। बंदूक के जोर से जमीन तो कब्जाई जाती है लेकिन लोगों के दिलों पर कब्जा करने के लिए उनके दिलों को जीतना पड़ता है। कश्मीर पर निर्णय लिया गया लेकिन निर्णय में एक भी कश्मीरी शामिल नहीं है।

रही बात हमारे जश्न में डूबने की तो हम भी जश्न मनाएंगे, जरूर मनाएंगे लेकिन तब जब इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली कश्मीर की अवाम जश्न मनाती दिखेगी। कश्मीर अभी बंद है। लोग घरों में कैद हैं। लोगों के कैद होने का जश्न आपको ही मुबारक़।
ये जश्न उन्हें मुबारक जिन्हें instrument of accession पर राजा हरि सिंह के हस्ताक्षर की कहानी का इतिहास नहीं पता। उन्हें मुबारक़ जो नहीं जानते कि आर्टिकल 370 लगाने में नेहरू से आगे सरदार पटेल थे। उन्हें मुबारक जो Kashmir Insurgency के बारे में नहीं जानते। जो नहीं जानते कि 19 जनवरी 1990 को कश्मीरी पंडितों के पलायन के समय जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था, जगमोहन मल्होत्रा राज्यपाल थे।देश में वीपी सिंह के सरकार थी और उसे बीजेपी का समर्थन प्राप्त था।

आर्टिकल 370 भारत को कश्मीर से एक एक पुल की तरह जोड़ता था। यह पुल अब टूट चुका है तो उसके क्या परिणाम होंगे यह भविष्य ही बतायेगा लेकिन उम्मीद करता हूँ जम्हूरियत, कश्मीरियत और इंसानियत तीनों बची रहे।
रही बात साहसिक और ऐतिहासिक कदम की तो नोटबन्दी भी एक साहसिक और ऐतिहासिक कदम था और इससे भी आतंकवाद की कमर टूट जाने वाली थी।

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