सुबह की हल्की धूप परदों के किनारों से सरकती हुई कमरे में बिना आहट चली आई थी, मैं चाहता तो नींद की बची हुई सिलवटें झाड़कर जल्दी उठ जाता, आईने के सामने खड़े होकर खुद से कुछ बातें कर लेता.
मेज़ पर बिखरे कागज़ समेट सकता था, किताबों को उनके हिस्से की जगह दे सकता था, बालकनी में रखे गमलों में सूखी मिट्टी की प्यास बुझा सकता था, और नए उगे पत्तों पर धीरे से उँगलियाँ फेर सकता था.
रसोई में उबलती चाय के साथ सुबह को थोड़ा अपना बना सकता था, उसकी उठती भाप में दिन भर की उलझनें रख सकता था, या किसी अधूरी किताब के पन्नों के बीच कुछ देर के लिए खुद को भूल सकता था.
कमरे की दीवारों पर ठहरी ख़ामोशी में घड़ी की सुइयों की टिक- टिक के साथ पुराने दिनों तक लौट सकता था, पुरानी डायरी खोलकर उन पन्नों के बीच रखी सूख चुकी यादों को फिर छू सकता था, और उन लम्हों की बची हुई खुशबू फिर से महसूस कर सकता था.
मैं चाहता तो दोपहर की चुप्पी में पंखे की धीमी आवाज़ के साथ थोड़ी देर सो भी सकता था, खिड़की से बाहर गुजरती दुनिया को देखकर खुद को समझा देता कि हर चीज़ आगे बढ़ती रहती है.
फिर शाम ने आसमान के रंग बदलने शुरू किए, नीले में थोड़ा सुनहरा घुला, पंछी लौटते हुए दिखे, हवा में किसी रसोई से आती पकते खाने की धीमी सी खुशबू तैरने लगी.
मैं चाहता तो उस उतरती हुई रोशनी के साथ दिन को एक मुस्कान देकर विदा कर देता. लेकिन मैं वहीं बैठा रहा, धीरे-धीरे ठंडी पड़ती चाय के साथ, तुम्हारी आवाज़ के बचे हुए कंपन सुनता हुआ, तुम्हारी हँसी की धुंधले उजाले में खोया हुआ.
और फिर वैसे ही दिन मेरे हाथों से फिसल गया, सूरज कहीं उतर गया, पक्षी अपने घर पहुँच गए, रात और गहरी होती गई, नींद दरवाज़े तक आई और लौट गई, चाँद छत पर देर तक ठहरा रहा, और एक पूरा दिन फिर तुम्हारी यादों के नाम हो गया.
सुबह की ख़बरों में फिर वही शोर बेहिसाब है, सच की गर्दन झुकी हुई, झूठ का ऊँचा रुतबा जनाब है। हर चीख़ को तालियों में बदलने का कमाल है, बाक़ी जनता समझे न समझे… सब ठीक है, अमृत काल है।
स्कूलों में प्रश्न नहीं, उत्तर रटवाए जाते हैं, “क्यों” और “कैसे” वाले बच्चे चुप कराए जाते हैं। शिक्षा अब बाज़ार हुई, ज्ञान यहाँ कंगाल है, फिर भी भाषण कहता है… सब ठीक है, अमृत काल है।
पेपर लीक की खबरें अब मौसम जैसी लगती हैं, मेहनत की रातें अक्सर अफ़वाहों में जगती हैं। सपनों के शव पर बैठे बिचौलिये दलाल हैं, फिर भी ज्ञान बाँटा जाता… सब ठीक है, अमृत काल है।
हाथों में डिग्रियाँ लेकर युवा खड़े चौराहों पर, उम्मीदों के जूते घिसते भर्ती वाले दरवाज़ों पर। रोज़गार के वादों का बस पोस्टरनुमा हाल है, सपनों की अर्थी कहती है… सब ठीक है, अमृत काल है।
अस्पताल में साँस अटकी, पहले पर्ची, फिर भुगतान, बीमारी से पहले टूटे आदमी का स्वाभिमान। इलाज यहाँ सुविधा कम, किस्मत का व्यापार है, पर रिपोर्ट में दर्ज हुआ… सब ठीक है, अमृत काल है।
तेल की क़ीमत रोज़ नई ऊँचाई छू आती है, सब्ज़ी अब थाली में आने से पहले घबराती है। महँगाई की चादर में सिकुड़ते घर-परिवार हैं, पूछो अगर बाज़ार का हाल… सब ठीक है, अमृत काल है।
धर्म यहाँ अब आस्था कम, चुनावी औज़ार हुआ, नफ़रत का हर नया ठेकेदार अचानक अवतार हुआ। जाति की दीवारें ऊँची, बड़े सिर्फ़ बवाल हैं, पर टीवी पर एंकर चिल्लाया… सब ठीक है, अमृत काल है।
रुपया गिरता जाता है, तर्क नए गढ़े जाते हैं, आँकड़ों की चमक में अक्सर आईने छुपाए जाते हैं। नौटंकी कुछ ज़्यादा है और काम बहुत बेहाल है, मगर सुनिए आधिकारिक बयान… सब ठीक है, अमृत काल है।
सवालों की औक़ात यहाँ अब अपराधों जैसी है, सच बोलो तो देशद्रोह की तैयारी पहले से ही है। हर असहमति के माथे पर गद्दारी का गुलाल है, पूछो मत, बस मान लो… सब ठीक है, अमृत काल है।
जवाबदेही भूखी बैठी, भाषण खाते जाते हैं, प्रश्न अगर मुश्किल हों तो मुद्दे बदले जाते हैं। सिस्टम अपनी पीठ थपथपाए, जनता बदहाल है, बाकी कागज़ कहता है सब ठीक है, अमृत काल है।
ये कविता नहीं, गलियों की साँसों का हिसाब है, जो दिखता कम है बाहर, अंदर उसका सैलाब है। अगर फिर कोई पूछे, “देश के कैसे हाल हैं?” मुस्कुराकर बस इतना कहना… सब ठीक है, अमृत काल है।
थकान के उस पार पुरुष दफ़्तर से लौटता है तो अक्सर दरवाज़ा खुला मिलता है, टेबल पर रखा पानी का गिलास, रसोई से आती रोटी की खुशबू, और एक स्त्री जो मुस्कुराकर पूछती है– “दिन कैसा था?”
लेकिन वही स्त्री सुबह नींद से नहीं, ज़िम्मेदारियों की आवाज़ से जागती है. अलार्म से पहले उठकर रसोई की पीली रोशनी में चाय का पानी चढ़ाती है, बच्चों के टिफ़िन में अपने हिस्से का समय भरती है, और फिर सबको विदा करते-करते ख़ुद को सबसे पीछे छोड़ देती है.
वह भी निकली थी घर से कुछ सपनों को आँखों में सजाकर, कुछ अधूरी इच्छाओं को दुपट्टे में बाँधकर. उसने भी सोचा था कभी कि वह अपने लिए जिएगी, अपनी पसंद की किताबें पढ़ेगी, लंबी शामों में ख़ुद के साथ बैठकर चाय पिएगी. पर शाम तक आते-आते रोटी बेलते हुए उसके सपने भी आटे की तरह हथेलियों में चिपक जाते हैं.
पुरुष के हिस्से आता है जूते उतारकर बैठ जाना, और उसके सामने रखा ठंडे पानी का गिलास. स्त्री के हिस्से आता है बस एक लंबी साँस लेना, पसीने से भीगे बालों को पीछे सरकाना, और फिर उठ खड़ा होना अगले काम के लिए.
उसके हाथ भी दुखते हैं, पीठ में उसके भी दर्द उठता है, कंधे उसके भी भारी हो जाते हैं, पर उसकी थकान घर की चीज़ों की तरह सामान्य मान ली जाती है.
कभी-कभी रात के आख़िरी पहर में जब सब सो जाते हैं, वह चुपचाप बालकनी में खड़ी होकर थोड़ी हवा लेती है. उसकी आँखें भर आती हैं. वह रोती नहीं ज़ोर से, क्योंकि उसे पता है सुबह फिर जल्दी उठना है.
वह भी चाहती है कि कोई उससे पूछे– “तुम थक गई हो क्या?” वह सहारा नहीं माँगती, बस इतना चाहती है कि कोई उसके साथ चले.
जिस दिन दफ़्तर से लौटी स्त्री के लिए भी कोई पुरुष एक गिलास पानी लेकर खड़ा होगा, उस दिन बराबरी पहली बार घर की चौखट पर दिखाई देगी.
जिस दिन रसोई में जलती आग के सामने पुरुष भी उसके साथ खड़ा होकर रोटी की गर्मी और थकान की तपिश महसूस करेगा, उस दिन स्त्री को पहली बार लगेगा कि यह घर सिर्फ उसकी जिम्मेदारी नहीं.
बराबरी बड़ी-बड़ी बहसों से नहीं आती, वह आती है बर्तन धोते हाथों में, बच्चे को सुलाते कंधों में, और उस आवाज़ में जो कहती है- “तुम बैठो, आज मैं कर लेता हूँ…”
जब याद उसकी आती है दिन की हलचल थम जाती है भीड़ में भी तन्हाई दिल से आकर टकराती है तसल्ली खुद को दे लेता हूं चुपके से उसकी फोटो देख लेता हूं।
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जब प्यार बहुत आता है कुछ कहना रह जाता है लफ़्ज़ नहीं मिलते होंठों को दिल ही दिल में घबराता है दिल को धीरे से थाम लेता हूँ चुपके से उसकी फोटो देख लेता हूँ।
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जब खिड़की पर बारिश की बूंदें उसकाचेहरा बन जाती हैं, हर टपकती बूँद में उसकी आहट सी सुनाई आती है, भीगे मन को सुलझा लेता हूँ चुपके से उसकी फोटो देख लेता हूँ।
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कुछ कहना जब चाहता हूँ मन भीतर ही सिमट जाता है भावों का सारा सावन जैसे सूखे पत्तों सा झर जाता है, मैं खुद को फिर सहला लेता हूँ चुपके से उसकी फोटो देख लेता हूँ।
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जब रात ज़्यादा लंबी हो नींद आंखों से रूठी हो ख़ामोशी कुछ पूछ रही हो और उम्मीदें भी टूटी हो खुद से थोड़ा मिल लेता हूं चुपके से उसकी फोटो देख लेता हूं।
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जब चाय ठंडी हो जाती है और बात अधूरी रह जाती है फोन की स्क्रीन पर उंगली बस यूं ही घूम जाती है खुद को समझा लेता हूं चुपके से उसकी फोटो देख लेता हूं।
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जब कोई पुराना गीत अचानक उसकेनाम से भर जाता है हर स्वर मेरे सूने भीतर धीरे से घर कर जाता है होंठों पर मुस्कान सजा लेता हूँ चुपके से उसकी फोटो देख लेता हूँ।
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जब आईने में खुद को थोड़ा थका हुआ पाता हूं एक पल को ही सही मैं भी अच्छा लग जाता हूं नज़रें नीचे कर लेता हूं चुपके से उसकी फोटो देख लेता हूं।
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जब सपनों की सीढ़ी पर कदम अचानक रुक जाते हैं कुछ चेहरे आगे बढ़ते हैं कुछ पीछे ही छूट जाते हैं मैं रास्ता फिर चुन लेता हूं चुपके से उसकी फोटो देख लेता हूँ।
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जब जीवन समझाता है सब अपना नहीं होता हर मिलना टिक जाए ऐसा कोई सपना नहीं होता मैं सच को भी मान लेता हूं चुपके से उसकी फोटो देख लेता हूं।
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जब मन का सागर शांत होकर दर्दों को धीरे धो देता है, यादों का छोटा सा दीपक फिर उजियाराकरदेता है, मैं उस उजाले में जी लेता हूँ चुपके से उसकी फोटो देख लेता हूँ।
सुनो… जब दुनिया अमेरिका और ईरान के बीच तनती हुई तलवारों की तरह तनी हुई खबरों को पढ़ रही है, जब आकाश में उड़ते जहाज़ पंछियों से अधिक परछाइयाँ लगने लगे हैं, जब नक्शों पर सरहदें स्याही से नहीं, संशय से खिंची जा रही हैं तब मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ…
लोग पूछते हैं मुझसे “डर नहीं लगता तुम्हें इस बारूद भरी दुनिया से?” मैं मुस्कुरा देता हूँ. कहता हूँ– डर तो उन्हें लगता है जिनके पास सिर्फ़ तोपें, टैंक और तकनीक होती है, मेरे पास तो तुम हो… तुम मेरी मौन मगर मज़बूत मधुरतम शक्ति…
जब समुद्रों के पार मिसाइलों की मंशाएँ मौत की भाषा बोलती हैं, तब तुम्हारी मुस्कान मेरे भीतर मंद-मंद महकती हुई मोगरे जैसी खिलती है. जब युद्ध के शोर में वीर रस की वाणी वज्र की तरह गूँजती है, तब तुम्हारी याद शीतल शबनम बनकर मेरे मन पर गिरती है.
वे कहते हैं– “एक बटन दबेगा और शहर सिसक उठेंगे.” मैं कहता हूँ– “एक बार तुम हँस दो मेरा संसार सँवर उठेगा.” वे नापते हैं दूरी ड्रोन और धमाकों से, मैं नापता हूँ निकटता तुम्हारी धड़कनों से. वे सजाते हैं सेनाएँ सीमाओं की सलाखों पर, मैं सजाता हूँ सपने तुम्हारी साँसों की सरहदों पर.
तुम मेरा परमाणु बम हो पर वह नहीं जो नगर निगल जाए, जो नदियाँ निचोड़ दे, जो इतिहास को हाहाकार में बदल दे. तुम वह विस्फोट हो जो मेरे भीतर होता है और मेरी सारी सिहरन, संदेह, संताप सहलाकर स्नेह में बदल देता है.
जब वायु में विनाश की गंध गहराती है, तब तुम्हारा नाम मेरे होंठों पर उम्मीद बनकर उतरता है. जब धरती धमाकों से दहलती है, तब तुम्हारी छवि मेरे भीतर दीप-सी जगमगाती है. दुनिया के पास हज़ार हथियार होंगे, मेरे पास सिर्फ़ तुम हो और सच कहूँ, तुम्हारा होना ही मेरी सबसे बड़ी जीत है..
यदि सचमुच आसमान आग उगले, यदि सचमुच इतिहास जलने लगे, तब भी मैं सारी दुनिया के सामने निर्भय, निडर, निश्चल खड़ा होकर कहूँगा तुम ही हो मेरा परमाणु बम जिसकी शक्ति तबाही नहीं, तरलता है. जिसकी तीव्रता विनाश नहीं, विश्वास है. क्योंकि युद्ध क्षणिक हैं पर प्रेम अनादि है, अमिट है, अविनाशी है..
मैं कोई सेलिब्रिटी नहीं हूं. पेशे से इंजीनियर हूं. सैलरी ठीक-ठाक है. इतनी कि घर, गाड़ी, बिजली-पानी और अच्छा फोन चल सके. जिंदगी की चेकलिस्ट लगभग पूरी है. लेकिन…मनुष्य का अस्तित्व अकेले नहीं खिलता. उसे भीड़ चाहिए. कंधों की गर्माहट चाहिए. आँखों की नमी चाहिए. होंठों की मुस्कान चाहिए.
आज हमारी जेब में एक ऐसा डिवाइस है जो हमें पूरी दुनिया से जोड़ता है फिर भी हमारे आस-पास कोई नहीं होता जिससे हम मन खोलकर कह सकें–“आज मन उदास है… ”
Facebook के हज़ारों दोस्त, Instagram के हज़ारों फॉलोअर्स, WhatsApp के दर्जनों ग्रुप; हर तरफ कनेक्शन का भ्रम है. मैं कुछ लिखूँ तो लोग लाइक करते हैं, कमेंट करते हैं, कभी तारीफ़, कभी बहस, कभी मज़ाक भी करते हैं. जन्मदिन पर बधाइयों की बाढ़ आ जाती है. खुशी पर Congrats, दुख पर Stay Strong या Take Care.
वर्चुअल दुनिया पूरी सजधज के साथ यह यकीन दिलाती है कि मैं अकेला नहीं हूं लेकिन असली दिक्कत तब शुरू होती है जब स्क्रीन बंद होती है. जहाँ दोस्त के कंधे पर सिर रखकर मन हल्का होना चाहिए, वहाँ तकिया भीगा पड़ा है. जहाँ कोई सामने बैठकर कहे-“चल यार, चाय पीते हैं”…वहाँ सिर्फ़ मोबाइल स्क्रीन जलती है.
मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य ‘टच’ से जुड़ता है, ‘टेक्स्ट’ से नहीं. Emoji से नहीं आँखों से जुड़ता है. Comment से नहीं आवाज़ से जुड़ता है. Screen से नहीं साँसों से जुड़ता है. Digital interaction मस्तिष्क में उतना oxytocin नहीं छोड़ता जितना आमने-सामने की मुलाकात, हँसी, स्पर्श या आँखों का मिलना छोड़ता है. यही वजह है कि ऑनलाइन जुड़े होने के बावजूद हम भीतर से खाली महसूस करते हैं. हमने वर्चुअल रिश्तों को रियल का विकल्प मान लिया है. लेकिन सच यह है कि जब स्क्रीन बंद होती है तो सामने तन्हाई का खाली कमरा होता है.
हमारी प्राथमिकताएं बदल गई हैं. रिश्ते अब “टाइम मिलने पर” निभाए जाते हैं, जबकि असली दोस्ती तो वक्त निकालकर निभाई जाती थी. जब तक कोई आपके साथ चुपचाप बैठकर आपकी चाय में चीनी नहीं घोलता, तब तक दोस्ती पूरी नहीं होती. मन को अब भी दोस्त चाहिए. वो दोस्त जो बिना पूछे सब समझ जाए. जो आँसू भी देख ले और हंसी भी चुरा ले. जिसके साथ चुप्पी भी पूरी बातचीत बन जाए. Birthday से लेकर ब्रेकअप तक..हर मोड़ पर कोई चाहिए जो ‘पास’ हो.
मन उम्मीद रखता है कि शायद कल कोई पुराना दोस्त दरवाज़ा खटखटा दे. शायद किसी चौपाल पर कोई भूला हुआ यार मिल जाए. शायद बरसात में कोई साथ चाय पीने आ जाए. शायद मोबाइल से बाहर, असली दुनिया लौट आए.
क्योंकि दोस्ती जब तक ‘रियल’ न हो; सुख अधूरा है और दुःख बेहिसाब. परिवार चाहे कितना भी प्यारा हो, दोस्त का विकल्प नहीं हो सकता. और शायद दोस्त मिलें या न मिलें… उनकी तलाश ज़रूरी है. क्योंकि यही तलाश हमें इंसान बनाए रखती है..
लड़कियाँ चुप रहीं… पर समय हमेशा एक-सा नहीं रहता। एक दिन सदियों की चुप्पी के भीतर हल्की-सी दरार पड़ती है। किसी घर में एक लड़की पहली बार ज़ोर से हँस देती है। किसी स्कूल में एक लड़की हाथ उठाकर पूछ लेती है अपना सवाल। किसी दहलीज़ पर एक लड़की यह कह देती है- “मेरी ज़िंदगी का फ़ैसला मैं खुद करूँगी।”
और तब इतिहास की मोटी किताब में एक नया पन्ना खुलता है। एक लड़की ऐसी भी जन्म लेती है जो अपनी माँ की अधूरी इच्छाएँ अपनी आँखों में लेकर चलती है, और अपनी बेटी के लिए थोड़ा और खुला आसमान छोड़ जाती है। एक नई सुबह है। अब लड़कियाँ सिर्फ़ चुप नहीं रहेंगी… वे बोलेंगी, लिखेंगी, चलेंगी, उड़ेंगी और उनके पंखों की आहट से दुनिया को समझ में आएगा कि आधा आसमान सदियों से चुप था।
पर शायद तुम यह सब पढ़ते हुए सोच रही हो कि वह लड़की कौन है जो दीवारों में दरार बनती है, जो चुप्पी को आवाज़ में बदल देती है, जो अपने हिस्से का आसमान माँगती है।
सच तो यह है.. वह कोई दूर की कहानी नहीं है। वह कोई किताब की नायिका नहीं है। वह लड़की… तुम ही हो। तुम्हारी हँसी में किसी पीढ़ी की आज़ादी छिपी है, इसलिए आज नहीं, अभी से याद रखना तुम सिर्फ़ किसी घर की बेटी नहीं, किसी का बोझ नहीं, किसी परंपरा की खामोश कड़ी नहीं। तुम एक पूरी कहानी हो, एक पूरा आसमान हो। 🌸
वो दिन…महीना अगस्त का था पर डेट ठीक से न मुझे याद है, न उसे। पहली बार उसे मेट्रो स्टेशन के गेट पर देखा था। समय ने मेरी कलाई की घड़ी उतारकर अपने पास रख ली थी। उसके खुले बाल… उफ्फ…
हवा उसकी खुली ज़ुल्फ़ों को जैसे ही छूती थी वो लहलहा उठती थी । फिर जब हमारी नज़रें एकाएक मिलीं तो मेट्रो प्लेटफॉर्म की घड़ी की सुइयाँ उल्टी चलने लगी।
मैंने बस इतना कहा-“चलें?” वो कुछ नहीं बोली…न हामी, न इनकार… बस एक हल्की-सी मुस्कान उसके होंठों पर आई जैसे कोई पुराना राज़ अचानक याद आ गया हो। अगले ही पल बिना कुछ कहे, बिना कुछ पूछे वो मेरे साथ चल दी।
शहर का शोर अब जैसे किसी पुराने रेडियो की तरह धीरे-धीरे मद्धम हो रहा था और पेड़ों की पत्तियों में कोई अनकहा गीत बजने लगा था। उस पल की ख़ामोशी कोई आम ख़ामोशी नहीं थी। वो पहली चुप्पी थी जिसने हमारे बीच कुछ नया जन्म दिया।
वो चुप थी…मगर उसकी ख़ामोशी में मौसम बदल रहे थे। कभी गर्मी की दोपहर-सी तपिश, कभी सर्दियों की लंबी रात-सी सुकून तो कभी बारिशों-सी बेपरवाह भीगती बातों की महक। धड़कनों की धीमी सरगम, निगाहों की डोर में बंधे वादे और दो कंधों के बीच हवा में तैरते वो अल्फ़ाज़ जो बोले नहीं गए मगर महसूस ज़रूर हुए। बस…वहीं पहली चुप्पी टूटी थी और एक कहानी शुरू हो गई…
फिर मेरी उंगलियाँ उसके हाथों की ओर बढ़ीं और जैसे ही मैंने उसकी हथेलियों को छुआ वो हल्का-सा सिहर उठी …मानो किसी पुरानी जादुई किताब का पन्ना खुल गया हो या गुलाब की पंखुड़ी पर पहली बार ओस गिरी हो। उस एक छुअन में मेरे भीतर जैसे कोई बग़ीचा उग आया जहाँ सूरजमुखियाँ मुस्कराने लगेऔर उसकी होठों की वो शर्मीली सी मुस्कान, ओस बनकर मेरी हथेली पर ठहर गई।
पहली बार उसके अधरों से शब्द फिसले-“क्या आप कुछ कहना चाहते हैं?”
मैंने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा- “तुम आज… जैसे चाँदनी में भीगती किसी राग की पहली तान लग रही हो जिसे सुनते ही मन मंदिर झूम उठता है।” (ऐसा मैंने कहा नहीं लेकिन मन ही मन सोचा ज़रूर)
वो मुस्कुराई…उसकी उस एक मुस्कान से पत्थर की कठोर दीवार पर उगे काँटों की बेलों पर गुलाब की कोपलें फूट पड़ीं।वो मुस्कुराती रही…नज़रें झुकीं पर मन की आवाज़ जैसे कह रही थी,“बस यही तो सुनना था तुमसे…”
उस पल वक़्त ने अपने क़दम रोक दिए। चारों ओर लोगों की चहल-पहल, गाड़ियों का शोर और हवा में कहीं दूर से आती एक मीठी तान…हम थे,हमारी धड़कनों की अनकही लय थीऔर वो संकोच जो अब धीरे-धीरेप्रणय की पहली बूँद बनकरउसके गालों पर गुलाबी रंग भर रहा था।
हमारी बातचीत शुरू हुई…पहले शब्दों से, फिर निगाहों से, फिर मौसमों से। पहले कुछ संकोच के साथ, फिर धीरे-धीरे खुलती हुई और फिर एक बेतहाशा बाढ़ की तरह जैसे कोई नदी अचानक समंदर से मिल जाए…
उसकी हँसी किसी तितली की तरह आकर मेरे काँधे पर ठहर जाती…हल्की, रंगीन और जादू से भरी हुई। जैसे ही वह मुस्कुराती, मेरी रूह के वीरान कमरों में उजाले की एक नर्म लहर दौड़ जाती। उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि उसकी हँसी मेरे थके हुए मन के लिए किसी एनर्जी ड्रिंक से कम नहीं… एक ऐसा अमृत जो हर थकावट को बहा ले जाए। उसकी खिलखिलाहट में एक ऐसी कशिश थी जो मेरे मन की सादी कैनवास पर हर बार कोई नया रंग बिखेर देती। जब मैं उसे सुनता तो लगता जैसे कोई भूला-बिसरा गीत कभी बहुत अपना था जो अचानक दिल के किसी कोने में बजने लगा हो….धीमे-धीमे…. मगर पूरी शिद्दत से….
ये हमारी दूसरी मुलाकात थी लेकिन तब से लेकर आज तक उसकी बातें कभी खत्म नहीं हुईं। उसकी आवाज़ अब भी हवा में घुली रहती है और जब वो पास नहीं होती तो उसकी स्मृति किसी अधूरी कविता की तरह दिल में गूँजती है। तब से लेकर आज तक उसकी हर बात मेरे लिए एक कविता बन गई है। उसकी हर मुस्कान एक दुआ और उसका साथ… मेरी ज़िन्दगी की सबसे खूबसूरत वजह।
कभी-कभी सोचता हूँ अगर हमारी पसंद-नापसंदों को तराजू में तौलकर रिश्ता तय होता तो शायद हम कभी साथ न हो पाते।
उसे सलमान ख़ान की अदा भाती थी और मुझे उसका अंदाज़ ज़रा भी नहीं सुहाता था।
वो जिस नेता को उम्मीद की किरण समझती थी, मैं उसी में नफ़रत की परछाइयाँ देखता था।
वो चायनीज़ पसंद करती थी और मुझे उसकी खुशबू तक बेचैन कर देती थी।
उसे भीड़ का कोलाहल जीवन लगता था, मुझे तन्हाई का सुकून अमृत सा।
उसे आसमान की ऊँचाइयाँ पुकारती थीं और मैं धरती की गहराइयों में जड़ें तलाशता था।
वो गर्मियों की धूप में खिलती थी, मैं सर्द रातों की रज़ाई में खुद को समेट लेना चाहता था।
फिर भी न जाने कैसे…जैसे किसी पुराने लोक-कथा की धुँधली याद के सहारे हम दो विपरीत दिशाएं एक ही पगडंडी पर कदम-दर-कदम चलने लगे और फिर एक दिन हम एक-दूजे के हो गए।
उसके खुले बालों में तो सच में कोई रहस्य है, उसके खुले बाल जैसे काजल से बुनी रात जिसमें चाँदनी ने खुद को खो दिया हो, हर लट मानो किसी शायर की अधूरी पंक्ति जो मेरी रूह में उतर कर मुकम्मल हो जाती है।उसकी काजल-सी गहराइयों वाली ज़ुल्फ़ों का जादू और मेरी छोटी-छोटी मासूम-सी आँखों में छुपा हर सपनाएक-दूसरे में यूँ रच-बस गए जैसे दो विपरीत राग एक ही सुर में मिलकर नुसरत साहब के क़व्वाली गा रहे हों।
उसकी आँखें….नहीं…वो केवल आँखें नहीं थीं…वो गुलमोहर के पेड़ पर झूलती मासूमियाँ थीं जहाँ रेशमी झूले पर बैठी हर शरारत मेरी ओर देखकर मुस्कुराती थी।
हम दोनों मिले…जैसे रेगिस्तान को अचानक कोई सरोवर मिल जाए या जैसे तानपूरा खुद ही किसी
अनजाने राग पर झूम उठे और बस…मिलते चले गए जैसे कोई शंखनाद धीरे-धीरे मौन में बदल जाए पर
उसकी प्रतिध्वनि सदा जीवित रहे।
~दिलीप
उसकी हँसी…उफ़्फ़! वो कोई हँसी नहीं बल्कि किसी प्रभात की पहली किरण है जो मेरी रूह की अंधेरी गलियों में सूरज का दीपक रख देती है।
तो मैं…उसके नाम एक झप्पी भेज रहा हूँ…उन लम्हों के लिए जिनमें उसने मुझे सिर्फ़ चाहा नहीं बल्कि मेरी हर परत को, मेरी हर खामोशी को अपनी बाँहों की भाषा में पढ़ लिया। क्योंकि वो सिर्फ़ ‘मेरी हमसफ़र’ नहीं है, मेरी कहानी की सबसे जादुई और सबसे अलौकिक परिभाषा है।
जब उदासी के बादल मेरे दिल पर बरसते हैं, मैं चुपचाप उसके पास चला जाता हूँ जैसे कोई कश्ती अपने किनारे से लिपट जाए। उसकी कोमल बाहों में जब भी समाता हूँ…लगता है किमैंने सारी दुनिया जीत ली हो जैसे किसी टूटते सितारे को गिरने से पहले एक आकाश मिल जाए। बस एक ही ख्वाहिश जगी…उसका हाथ हो… उसका साथ हो…
वो कोई जादूगरनी है, उसके गले लगते ही हर मुश्किल मोम की तरह पिघल जाती है, हर दुख बादल बनकर उड़ जाता है, हर उलझन कंघी में उलझे बालों-सी सुलझ जाती है। उसकी साँसों की लय में मेरी बेचैनी थम जाती है जैसे कोई बंजारा आखिरकार अपना घर पा ले। जब ज़िंदगी की रेत हाथ से फिसलती है तो उसकी गोद मेरे लिए सबसे मुकम्मल शरण बन जाती है।
मुझे उसके साथ जीना है… सिर्फ़ वो पल नहीं जब सब सरल हो बल्कि वो भी जब पूरी कायनात एक बोझ लगे। मैं उजाले में भी उसका चेहरा चाहता हूँ और अंधेरे में बस उसकी ऊँगली…जैसे रात की स्याही में कोई तारा। मैं उसके साथ पहाड़ों की चोटी पर सांस लेना चाहता हूँ और समुद्र की सबसे शांत गहराई में उतरकर उसकी चुप्पी में डूब जाना चाहता हूँ। ज़िंदगी के हर मौसम में, हर रौशनी, हर अंधेरे, हर तूफ़ान और हर ठहराव में मुझे सिर्फ़ उसका साथ चाहिए।
अब जब ये सब लिख रहा हूँ तो लगता है कि शब्द भी थककर उसकी गोद में सिर रख देना चाहते हैं, वो भी अब लफ़्ज़ नहीं रह गए वो उसका स्पर्श चाहते हैं, उसकी हथेली की गर्माहट में लिपटकर सो जाना चाहते हैं।
शरीक-ए-सफ़र के नाम…जो साथ चलती नहीं बल्कि मेरे अंदर धड़कती है!
ॐ ट्रंप टैरिफ, ॐ चीन की चाल, ॐ बाज़ार का हिसाब ॐ पाकिस्तान के दिल में युद्ध का ख्वाब ॐ इज़रायल की गोलेबारी, ॐ ईरान का ग़ुस्सा ॐ तेल का भाव, ॐ हथियार का किस्सा
ॐ वोट चोरी, ॐ EVM, ॐ चुनाव आयोग का भजन ॐ नरेंद्र मोदी, ॐ मन की बात, ॐ फोटो-सेशन ॐ पहलगाम की बर्फ़, ॐ घाटी का सन्नाटा ॐ हिन्दू-मुसलमान, टीवी पर महाभारत की गाथा
ॐ नफ़रत का नृत्य, ॐ भाईचारे का क़त्ल ॐ WhatsApp का सत्य, ॐ इतिहास का मल्ल ॐ न्याय में भी जात, ॐ आस्था में जंग ॐ भूखे पेट में राष्ट्रगान का रंग
ॐ गगनचुंबी मीनार, ॐ गिरता मकान ॐ आत्मनिर्भरता में विदेशी सामान ॐ नौजवान की बेरोज़गारी, ॐ भक्त का जयकार ॐ बंशी बजा रहा तानाशाह अवतार
ॐ किसान का रोष, ॐ लाठी की मार ॐ लहू से सना लोकतंत्र का द्वार ॐ महंगाई के मंदिर में दलालों की पूजा ॐ भूख की आरती, ॐ रोटी का दूजा
ॐ धर्म की आड़, ॐ सत्ता का खेल ॐ जनता बेवक़ूफ़, ॐ नेता का मेल ॐ कश्मीर की क़ैद, ॐ मणिपुर की आग ॐ दिल्ली के गलियारे में मुनादी का राग
ॐ देशभक्ति के नाम पे गद्दार का तमगा ॐ अंधे की आँख, ॐ बहरों का भागा ॐ सच बोलने पर जेल, ॐ झूठ पर इनाम ॐ आकाश में गूँजता भारत महान!
ॐ परम PR, ॐ परम प्रचार, ॐ परम प्रपंच ॐ फिल्मी सीन, पर स्क्रिप्ट है पंच ॐ जुमलों का अमृत, ॐ झूठ का प्रसाद ॐ नागार्जुन भी पूछें-कहाँ गया संवाद?