देश को आजतक मोदी जी जैसा प्रधानमंत्री नहीं मिला है। ऐसा प्रधानमंत्री जो 18 घंटे बिना थके बिना रुके लगातार काम करता हो। रात में बस 4 घंटे सोता हो। सुबह उठकर नियमित योगासन करता हो। नहा-धोकर प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करता हो। वाकई देश धन्य है ऐसा प्रधान सेवक पाकर।
मोदी जी ही थे जिन्होंने पाकिस्तान में घुस कर एयर स्ट्राइक करने का पूरा मास्टर प्लान तैयार किया और फिर उसे वायु सेना के अधिकारियों को दिया। ख़ुद रात भर जगकर बिना कुछ खाये पिये इस योजना को सफल बनाया। एयर स्ट्राइक पर गए पायलट्स को दिल्ली में अपने सरकारी घर पर बने कंट्रोल रूम से लगातार निर्देश दिया कि आतंकियों का ठिकाना कहाँ है और उस पर कब और कैसे अटैक करना है। कुछ लोग तो ये भी बताते हैं कि मोदी जी ख़ुद एक मिराज विमान लेकर पाकिस्तान के अंदर घुसे थे और पूरे ऑपेरशन को अंजाम तक पहुंचाया। लेकिन उनका दिल इतना बड़ा है कि ये बात किसी और को नहीं बताई और इसका कभी श्रेय नहीं लिया। जब तक ऑपरेशन खत्म नहीं हुआ और पायलट्स सकुशल वापस नहीं लौटे, उन्होंने कुछ नहीं खाया-पिया। ऑपेरशन की सफलता के बाद ब्रह्म मुहर्त में उन्होंने दुर्गा सप्तशती का पाठ किया और मौजूद सभी भक्तों को प्रसाद बांटा। भक्त-जन मोदी जी के हाथों से प्रसाद पाकर अभिभूत हुए। कुछ सौभाग्यशाली भक्तों को मोदी जी के चरणों को धोकर अमृत पीने का भी मौका मिला।
सूर्योदय के बाद दैनिक क्रिया से निवृत्त हुए बिना उन्होंने केबिनेट सिक्योरिटी कॉउंसिल की बैठक की। पूरे ऑपेरशन के बारे में सबको बताया। सबने खड़े होकर करतल ध्वनि से उनका अभिवादन किया। फिर जलपान किये बिना ही वो राजस्थान के चुरू में एक सभा में पहुंचे वहां उन्होंने एक वीर रस की कविता पढ़ी—
“सौगंध देश की खाता हूं देश नहीं झुकने दूंगा देश नहीं मिटने दूंगा”
कविता सुनकर मेरे जैसे तमाम लोगों के रोगंटे खड़े हो गए और मुंह से अनायास ही निकल पड़ा ‘वाह मोदी जी वाह’।
इसके बाद दोपहर का खाना खाए बिना पराक्रमी प्रधानमंत्रीजी दिल्ली आए और अचानक से मेट्रो से इस्कॉन टेम्पल पहुँचे। मेट्रो की यात्रा के दौरान उन्हें दो मुस्लिम बंधु मिले जिनसे मोदी जी बड़ी आत्मीयता से मिले। मुस्लिम बंधु भी उनसे मिलकर भावविभोर हो उठे। उनके चेहरे का हाव-भाव बतला रहा था कि आज उन्हें साक्षात किसी दिव्य पुरुष के दर्शन हुए हैं। इस्कॉन टेम्पल में मोदी जी ने विश्व की सबसे बड़ी गीता का अनावरण किया और भगवान कृष्ण की भांति गीता का उपदेश देकर सभी भक्तों का मार्गदर्शन किया।
सच कहूं तो मोदी जी इस कलयुग में भगवान कृष्ण का साक्षात अवतार हैं लेकिन भारत के कुछ गिने-जुने सेक्युलर, कांग्रेसी, आपिये, टुकड़े-टुकड़े गैंग, डिज़ाइनर पत्रकारों को मोदी जी की अहमियत नहीं समझ आती है। एक फकीरी सी है उनके स्वभाव में।
बस मैं उम्मीद करता हूँ 2019 ही नहीं, आने वाले सौ जन्मों तक परम पूजनीय, प्रातः स्मरणीय, देवतुल्य, चंद्रगुप्त के अवतार मोदी जी की कृपा भारतवर्ष पर यूँ ही बनी रहे।
दोनों हाथ उठाकर ज़ोर से बोलिये–
“हर-हर मोदी”
~दिलीप ‘देशभक्त’
इस पोस्ट को आग की तरह फेसबुक और व्हाट्सएप पर फैला दो..
हमारे-तुम्हारे मन को युद्धरत और क़बीलाई बना देंगे, यही ख़ुदगर्ज़ मंसूबे हैं, सियासत के खेल अजूबे हैं।
चुनाव करीब है और कुछ लोग सेना जैसी दिखने वाली वर्दी पहनकर वोट मांगने निकले हैं। सत्ता का लालच देश के विचार से आगे बढ़ गया है। भारत पाकिस्तान के बहाने देशभक्त और देशद्रोह के प्रमाण पत्र बांटे जा रहे हैं। झूठ का ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि सच भी झूठा नज़र आने लगा है। तथ्य को पीछे छिपा दिया गया है और झूठ ख़ुद को देशभक्त बतलाकर सच को बेशर्मी से चिढ़ा रहा है।
सत्ता का यह दौर—जहाँ झूठ खुद को ‘देशभक्त’ और सच को ‘देशद्रोही’ कहकर आईने को धिक्कार देता है—अब संस्थाओं को नेस्तनाबूद करने की फेहरिस्त में सेना को आख़िरी मोहरा बना देना चाहता है। एक-एक संस्था को ऐसे कुचला गया है जैसे यह देश नहीं, कोई कंपनी हो, और संस्थाएं बस ‘डिपार्टमेंट्स’ जिन्हें बंद या बदला जा सकता है।
देखिए एक-एक संस्थान का हाल:-
केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI)—‘तोते’ का गला भी घोंट दिया गया
फरवरी 2017 में आलोक वर्मा सीबीआई के प्रमुख नियुक्त किए गए। सीबीआई डायरेक्टर बनने से पहले वर्मा दिल्ली के पुलिस कमिश्नर, दिल्ली में जेलों के डीजीपी, मिज़ोरम के डीजीपी, पुडुचेरी के डीजीपी और अंडमान-निकोबार के आईजी थे। आलोक वर्मा सीबीआई के पहले निदेशक थे जिनके पास इस जांच एजेंसी का कोई अनुभव नहीं रहा था बावजूद इसके उन्हें चीफ़ बनाया गया। उनकी नियुकि से पहले राकेश अस्थाना को सीबीआई का स्पेशल डायरेक्टर नियुक्त किया गया था। राकेश अस्थाना वर्ष 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और स्पेशल डायरेक्टर बनने से पहले सीबीआई में कई भूमिकाओं में काम कर चुके थे।अस्थाना ने कई अहम मुक़दमों की जांच की थी जिनमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का चारा घोटाला भी शामिल था। गोधरा में ट्रेन जलाने की एसाआईटी जांच भी अस्थाना ने की थी इसलिए मोदी और शाह के पसंद के व्यक्ति थे। इनकी नियुक्ति भी विवादित थी क्योंकि इन्हें सीबीआई के नंबर दो अधिकारी आरके दत्ता के ऊपर वरीयता दी गयी थी।
जब आलोक वर्मा सीबीआई चीफ बने तो उन्होंने राकेश अस्थाना की नियुक्ति का न केवल विरोध किया बल्कि कई संगीन आरोप लगाये। जवाब में अस्थाना ने भी आलोक वर्मा पर घूस लेने का आरोप लगाया। हवाला और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में मीट कारोबारी मोईन क़ुरैशी को क्लीनचिट देने में कथित तौर पर घूस लेने के आरोप में सीबीआई ने अपने ही विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज किया। अस्थाना पर आरोप लगा कि उन्होंने मोईन क़ुरैशी मामले में हैदराबाद के एक व्यापारी से दो बिचौलियों के ज़रिये पांच करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी। जिसके बाद राकेश अस्थाना ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर भी इस मामले में आरोपी को बचाने के लिए दो करोड़ रुपये की घूस लेने का आरोप लगाया।दोनों अफसरों के बीच मची रार सार्वजनिक हो गई तो केंद्र सरकार ने दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया, साथ ही अस्थाना के ख़िलाफ़ जांच कर रहे 13 सीबीआई अफसरों का भी तबादला कर दिया गया।आलोक वर्मा सुप्रीम कोर्ट में गए जहां से उन्हें वापस सीबीआई में भेजा गया लेकिन सरकार ने उसी दिन उनका ट्रांसफर फायर सेफ्टी विभाग में कर दिया जिसके बाद उन्होंने स्वेच्छा से रिटायरमेन्ट ले लिया।
सीबीआई की ऐसी दशा पहली बार हुई जहां नंबर एक और दो की लड़ाई हुई और सरकार ने अपनी पसंद वाले को बचाने का भरपूर प्रयास किया।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)—-
सरकार और आरबीआई के बीच विवाद इसलिए शुरु हुआ क्योंकि सरकार आरबीआई के कोष से 3.5 लाख करोड़ रुपये चाहती थी। शुरु में सरकार ने इस मसले पर आक्रामक रवैया अपनाया, यहां तक कि उसने आरबीआई एक्ट की धारा 7 तक के इस्तेमाल की सोच डाली।इस धारा का इस्तेमाल कर सरकार रिजर्व बैंक को निर्देश दे सकती है लेकिन रिजर्व बैंक के 83 साल के इतिहास में किसी भी सरकार ने इसका इस्तेमाल नहीं किया था। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने यह चेतावनी भी दे दी कि सरकार द्वारा आरबीआई की स्वायत्तता को कमज़ोर करना विनाशकारी हो सकता है। लेकिन सरकार अपने रुख़ पर कायम रही। परिणाम यह हुआ कि 61 सालों के इतिहास में पहली बार आरबीआई के गवर्नर ने इस तरह से इस्तीफा दे दिया।
इस्तीफा देने के बाद न ही उन्होंने प्रधानमंत्री और न ही वित्त मंत्री का धन्यवाद किया। उर्जित पटेल के इस्तीफा देने के बाद सरकार ने शशिकांत दास को नया गवर्नर नियुक्त किया जिनकी शिक्षा इतिहास विषय में हुई थी।
केन्द्रीय सतर्कता आयोग (CVC)—
मोदी सरकार ने केवी चौधरी को भारत का अगला सीवीसी नियुक्त किया गया। चौधरी काले धन के मामले में गठित विशेष जांच दल के सलाहकार भी थे।सीवीसी का पद परंपरागत तौर से किसी पूर्व आईएएस को ही मिलता रहा है लेकिन यह पहली बार ही हुआ जब किसी गैर-आईएएस को इस पद पर नियुक्त किया गया। इसके अलावा चौधरी पर कई आरोप भी थे।आरोप था कि चौधरी ने हवाला कारोबारी मोईन कुरैशी को क्लीन-चिट देकर पूर्व सीबीआई डायरेक्टर रंजीत सिन्हा की मुश्किलें आसान कीं, उधर सिन्हा ने उन्हें ‘स्टॉक-गुरु’ घोटाले से आरोपमुक्त कर दिया.
इसके अलावा भी चौधरी पर केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड का चीफ रहते हुए अपने पद का दुरुपयोग करने था अपराधियों को लाभ पहुंचाने के कई आरोप प्रसिद्ध वकील रामजेठमलानी और प्रशांत भूषण ने लगाए थे।
केंद्रीय सूचना आयोग (CIC)—-
केंद्रीय सूचना आयोग में लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने के लिए 20 दिसंबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में चयन समिति की हुई बैठक में चार लोगों को सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त करने की सिफारिश की गई थी। इसके बाद 1 जनवरी, 2019 को सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त होने वालों में पूर्व आईएफएस अधिकारी यशवर्द्धन कुमार सिन्हा, पूर्व आईएएस अधिकारी नीरज कुमार गुप्ता, पूर्व आईआरएस अधिकारी वनजा एन. सरना और पूर्व विधि सचिव सुरेश चंद्रा शामिल थे।
लेकिन आरोप लगा कि केंद्र की मोदी सरकार ने सुरेश चन्द्रा को बिना आवेदन किए ही नियुक्त कर दिया।कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) द्वारा वेबसाइट पर अपलोड की गई नियुक्ति की फाइलों से भी खुलासा हुआ है कि सुरेश चंद्रा ने इस पद के लिए आवेदन ही नहीं किया था। बाद में सुरेश चन्द्रा ने भी स्वीकार किया था कि उन्होंने इस पद के लिए आवेदन नहीं किया था। ध्यान देने वाली बात यह थी कि सुरेश चंद्रा वित्त मंत्री अरुण जेटली के निजी सचिव रह चुके थे और सूचना आयुक्त को चुनने वाली कमेटी में अरुण जेटली सदस्य भी थे।
भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान (FTII)—
फिल्म इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया जो कि पुणे में स्तिथ है में टेलीविजन कलाकार गजेन्द्र सिंह चौहान को सरकार ने नियुक्त किया जिनकी नियुक्ति को लेकर कई दिनों तक इंस्टीट्यूट में हंगामा होता रहा। इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षण ले रहे छात्र−छात्राएं हड़ताल पर चले गए।भाजपा और सरकार के लोगों ने हड़ताल कर रहे छात्र-छात्राओं को देशद्रोही तक बतला दिया.कई महीनों तक चले धरने, प्रदर्शन और प्रशिक्षण के बहिष्कार के बाद आखिरकार केंद्र सरकार को चौहान को हटाकर अभिनेता अनुपम खेर को अध्यक्ष नियुक्त करना पड़ा। फिलहाल खेर ने भी अपनी व्यस्तता के चलते इस्तीफा दे दिया है।
केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC)—-
यह संस्था भी केंद्र सरकार की वजह से विवादों में रही।केंद्र सरकार ने पहलाज निहलानी को इसका चेयरमैन नियुक्त किया। निहलानी जबरदस्त विवादों में घिर गए। निहलानी पर अनावश्यक रूप से फिल्मों को पास करने में अड़ंगे लगाए जाने के आरोप लगे।साथ ही निहलानी अपने स्तरहीन बयानों के लिए सरकार की किरकिरी कराने लगे। उनके कामकाज से खफा होकर फिल्म इंडस्ट्री में भी व्यापक असंतोष रहा।केंद्र सरकार पर बोर्ड के जरिए छिपे हुए एजेंडे के अनुरूप काम करने के आरोप लगे। सरकार की ज्यादा किरकिरी होने पर निहलानी को रूखसत होना पड़ा और फिर भाजपा के चुनावी गीत लिखने वाले गीतकार प्रसून जोशी की एंट्री हुई और उन्हें बोर्ड का नया चेयरमैन नियुक्त किया गया।
लोकपाल (Lokpal)—
लोकपाल तो याद ही होगा।हो सकता है हाथ में तिरंगा लेकर, सफेद टोपी पहनकर आप और हम इस आंदोलन का हिस्सा रहे हों। कांग्रेस सरकार ने जाते-जाते भारी दवाब में लोकपाल कानून संसद में पास कर दिया जिसे विपक्षी पार्टी भाजपा ने भी पूरा समर्थन दिया था। अब भाजपा सरकार में हैं और कार्यकाल खत्म होने को है लेकिन लोकपाल का अता पता नहीं है।सुप्रीम कोर्ट के दवाब के बाद सरकार ने 28 सितंबर 2018 को लोकपाल अध्यक्ष और उसके सदस्यों के नामों की सिफारिश करने के लिए आठ सदस्यीय एक समिति बनायी थी। समिति की अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई थी। लेकिन अभी तक इस पर कुछ फाइनल नहीं हो सका है।
चुनाव आयोग (ECI)—
2018 में चुनाव आयोग के मुखिया बने एके जोति.ल। एके जोती गुजरात कैडर के अधिकारी रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी के भरोसेमंद अधिकारी माने जाते थे। केंद्र सरकार ने राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग को कहीं ज़्यादा पारदर्शी बनाने के लिए जिस इलेक्ट्रॉल बांड्स का प्रस्ताव रखा था, उससे 2017 में चुनाव आयोग सहमत नहीं हुआ था लेकिन 2018 में मुख्य चुनाव आयुक्त एके जोती ने इस प्रस्ताव को सही दिशा का क़दम बताया। 08 अक्तूबर, 2018 को चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा वाली प्रेस कांफ्रेंस को तीन घंटे के लिए टाल दिया था।पहले पत्रकारों को साढ़े बारह बजे प्रेस कांफ्रेंस के लिए बुलाया गया था बाद में ये समय साढ़े तीन बजे किया गया।इस बीच दोपहर के एक बजे राजस्थान के अजमेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक रैली को संबोधित करना था। आरोप लगा कि चुनाव आयोग ने समय इसलिए बदला ताकि प्रधानमंत्री की रैली पर अचार संहिता लागू नहीं हो।
मीडिया —-खंभा नहीं, खोमचा बन गया है
भारत में मीडिया लगभग प्राइवेट हाथों में ही है।इसे लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में चौथा खम्भा, खम्भा नहीं बल्कि खोमचा बन गया।इस खोमचे में काम करने वाले पत्रकार भी इस पतन के लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं जितने खोमचे के मालिक. आज मीडिया पर बिक जाने के आरोप हैं। समूल्य खबर दिखाने एवं छापने के आरोप हैं। चुनिंदा ख़बरों को छुपाने के आरोप हैं।दलगत पक्षपात के आरोप हैं। ये वही सब आरोप हैं जो एक भ्रष्ट दलाल पर होते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि मीडिया मुंहजोर और बेशरम हो चुका है। अपराधी को बेगुनाह और बेगुनाह को अपराधी बनाने में लगा हुआ है।
याद कीजिये, यही मीडिया कांग्रेस सरकार के समय सरकार से सवाल करती थी लेकिन मोदी सरकार में विपक्ष से सवाल किया जा रहा है।जो मीडिया संस्थान या पत्रकार सवाल करने की हिम्मत जुटा पाते हैं उन्हें धमकियां मिल रही हैं, गालिया मिल रही हैं,उन्हें चैनल्स से निकलवा दिया जा रहा है।संस्थानों पर सरकारी छापे डाले जा रहे हैं।इस दौर में मीडिया का जितना पतन हुआ शायद ही कभी हुआ हो।
इतनी संस्थाओं को लोकतांत्रिक मूल्यों से तो डिगा ही दिया है हमारे प्रिय प्रधानमंत्री ने. बस सेना को बख़्श दीजिए. हिंदुस्तान और पाकिस्तान के निज़ाम में बुनियादी अंतर यही है कि हमारे यहां सेना सत्ता के खेल में साझेदार नहीं रही है. बख़्श दीजिए प्लीज़!
“देशभक्ति हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकती। मेरा आश्रय मानवता है। मैं हीरे के दाम में काँच नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जिंदा हूं, मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।”
(रविन्द्र नाथ टैगोर)
पुलवामा हमले के बाद देश में गुस्सा है और देश के लिए कुछ कर गुज़रने की भावना चरम पर है. 15 अगस्त, 26 जनवरी के बाद फिर से जनसमूह तिरंगे लेकर सड़क पर निकल पड़ा है. भारत माता की जय की गूंज दूर तक सुनाई दे रही है।सब कुछ ठीक है लेकिन राष्ट्रवाद की इस आंधी में कुछ ऐसा भी हो रहा है जो ठीक नहीं है, जो आतंकियों के मंसूबों को कामयाब बनाता है, जो देश की एकता को चोट पहुंचाता है, जो अपने ही देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करता है,जो नफ़रत को जन्म देता है,जो आपसी भाईचारे के लिए चुनौती पैदा करता है.
इसलिए देशभक्ति के कुछ स्वरूप मुझे डराते हैं. मुझे डर तब लगता है, जब इसके बहाने कुछ उपद्रवी लोग भारत माता की जय के नारे लगाते हुए देहरादून में कश्मीरी छात्राओं के हॉस्टल को घेर लेते हैं. मुझे डर लगता है, जब कुछ लोग पटना में छोटे-छोटे कश्मीरी दुकानदारों को घेर लेते हैं और जब एक कश्मीरी पूछता है कि मेरी क्या ग़लती है को उसका गला पकड़ लिया जाता है.
डर लगता है मुझे टीवी देखने से. टीवी चैनलों का उन्माद सबसे आगे है. एंकरों ने सीमा पर लड़ाई का एलान कर दिया गया है. स्टूडियो वॉर रूम बना दिए गए हैं जहां चार लोग एअर कंडीशनर रूम में बैठकर पूरी लड़ाई की योजना बना दे रहे हैं. हमारे पास क्या हथियार हैं, उन्हें कैसे इस्तेमाल करना है? सब टीवी पर बैठे उन्मादी एंकर तय कर दे रहे हैं. मानो, इन्हें ही सीमा पर जाकर लड़ना हो.
टीवी के बाहर भी कहीं कहीं वैसा ही उन्माद दिखाई पड़ता है. जब शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देना चाहिए तब लोग श्रद्धांजलि की आड़ में अपने हित साध रहे हैं.हंसी-ठिठोली के साथ, हाथों में मोमबत्तियां लेकर किसकी मौत का शोक मनाया जा रहा है? मज़े के लिए नारे लग रहे हैं, श्रद्धांजलि सभाओं में फ़ोटो अच्छी आये इसका ज्यादा ख्याल रखा जा रहा है. जब पीड़ित परिवारों की मदद की कोशिश होनी चाहिए तब राजनेता शहीद सिपाही की शव यात्रा में हाथ हिलाने और फोटो खिंचाने के लिए पहुँच रहे हैं.
देश का मुसलमान दवाब, तनाव और इसकी समानार्थी सभी तरह की स्थितियों का सामना कर रहा है. दवाब है अपनी देशभक्ति साबित करने का, दवाब है कि एक हिंदू की अपेक्षा तेज़ आवाज़ में पाकिस्तान मुर्दाबाद कहने का, दवाब है एक हिंदू की अपेक्षा आतंक के खिलाफ़ ज़्यादा विरोध प्रदर्शन करने का और एक हिंदू की अपेक्षा आतंक के खिलाफ ज़्यादा तीखी फ़ेसबुक पोस्ट करने का. उन्हें शक की निगाह से देखे जाने का मौसम लौट आया है.
निशाने पर मुसलमान एक्टर, लेखक, कवि,समाजसेवी सब हैं. आमिर खान और नसरूदीन शाह से पूछा जा रहा है कि उनके बच्चों को अब डर नहीं लगता. पूछा जा रहा है कि सलमान,शाहरुख़, जावेद अख्तर और सैफ अली खान ने घटना पर शोक जताया या नहीं? जताया तो कब जताया? उसमें कितनी देरी की?जल्दी जताया तो उनके शब्द क्या थे? स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाला हर मुसलमान शक के नज़रिए से देखा जा रहा है। मुसलमान पड़ोसी की गतिविधियों का हिसाब रखा जा रहा है.
मुसलमान के बाद सबसे ज़्यादा सेक्युलर और लिबरल जमात निशाने पर हैं. सवाल जेएनयू के छात्रों से पूछा जा रहा है. सवाल कन्हैया कुमार, शेहला राशिद से पूछा जा रहा है। बरखा दत्त, रविश कुमार, राजदीप सरदेसाई, अभिसार शर्मा जैसे पत्रकारों को फोन करके, मैसेज करके धमकियां दी जा रही हैं. सवाल अवार्ड वापसी करने वाले लेखकों और कवियों से पूछा जा रहा है. लगता ऐसा है कि देश की सरकार यही लोग चला रहे हैं. सारी ज़िम्मेदारी इन्हीं की है. जिनसे सवाल पूछा जाना चाहिए वे नारे लगा और लगवा रहे हैं.
हर विपक्षी पार्टी जो भाजपा के ख़िलाफ़ खड़ी है, निशाने पर है. फर्ज़ी ख़बरों, फ़ोटोज़ की बाढ़ आ गयी है. राहुल गांधी की फ़ोटो के साथ पुलवामा में अटैक करने वाले आतंकी की फ़ोटो जारी की जा रही है. अफ़वाह फैलाई जा रही है कि कुछ दिन पहले प्रियंका गांधी दुबई में पाक सेना-चीफ़ से मिली थी. पाकिस्तान के जश्न के विडीओ भारत के बता कर शेयर किए जा रहे हैं . सीरिया और बग़दाद के विडीओ भारत के बता कर फैलाए जा रहे हैं. व्हाट्सएप मैसेज के ज़रिए नफ़रत फैलायी जा रही है.
अब सवाल यह कि ये कौन लोग हैं? जो सबसे सवाल कर रहे हैं लेकिन प्रधानमंत्री से,गृहमंत्री से,कश्मीर के राज्यपाल से इनका कोई सवाल नहीं है. सरकार चला रही पार्टी और उनके नेताओं से इनका कोई सवाल नहीं है. क्या ये लोग जिम्मेदार लोगों से सवाल करने से डरते हैं? या क्या ये लोग इन्हीं के साथी संगी है? जवाब हम और आप अच्छे से जानते हैं.
चुनाव बस आने को है. आतंकी घटना सरकारी पार्टी, भाजपा के लिए संजीवनी का काम कर रही है. उनको मन मुताबिक़ पिच मिल गयी है जो उनकी विचारधारा और उसकी मौक़ापरस्ती को ख़ूब सूट करती है. इस पिच पर वे फ्रंटफुट पर खेलते हैं. पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारों के बीच किसान, जवान और बेरोज़गारों के सारे मुद्दे पीछे रह जाएंगे. भाजपाईयों के लिए एक ऐसा प्लेटफ़ोर्म तैयार हो गया है जिस पर आसानी से वोटों की खेती की जा सकती है. अमित शाह की तरफ से पार्टी नेताओं को इशारा भी दिया जा चुका है. प्रधानमंत्री के लिए चुनावी भाषणों में बोलने के लिए अच्छा मैटेरियल भी जुट गया है. वैसे भी छद्म राष्ट्रवाद आतंकवाद और पाकिस्तान के बिना फल-फूल नहीं सकता.
इन सबके बीच अहम बात यह है कि बॉर्डर पर जा कर भारत का सिपाही ही लड़ेगा, जान भी वही गंवाएगा और उसी का परिवार सब कुछ सहेगा लेकिन क्या नफ़रत की आग लगाने वाले लोगों को असल में सैनिकों की कोई फ़िक्र है? क्या ये लोग जवान तेजबहादुर के साथ तब खड़े हुए थे जब उसने सेना के खाने की क्वालिटी पर सवाल उठाया था? क्या ये लोग शहीद हेमराज के परिवार के साथ आए थे जब परिवार सड़क पर दर-दर की ठोंकरें खा रहा था? क्या इन्होंने कभी माँग की कि जब अर्धसैनिक बल का जवान को नौकरी के बाद पेंशन मिले और जब ड्यूटी पर मौत हो जाए तो उसे शहीद का दर्जा और शहीद वाली सुविधाएँ मिलें? क्या जब सैनिक जंतर मंतर पर अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे थे इन्होंने उनका साथ दिया? इन सारे सवालों का जवाब नहीं है क्योंकि फ़िरक़ापरस्त ताक़तों को इससे मतलब ही नहीं हैं. ये बस ये तय करने में लगे हैं कि बातचीत से हल निकालने की सलाह देशभक्ति है या लड़ाई लड़ने की सलाह देशभक्ति है? समस्या का समाधान क्या हो सकता है इन्हें उस पर बात नहीं करनी, उन्हें तय करना है कि इनकी परिभाषा में देशभक्त कौन हैं और देशद्रोही कौन हैं?
शहीद सैनिकों के प्रति हमारी जो ज़िम्मेदारी है वो हम अपनी हैसियत के हिसाब से पूरी कर रहे हैं. लेकिन आपने क्या किया? जब तक आपने बताया नहीं तब तक आप देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं पाएंगे.हाँ, अगर आप नफ़रत अच्छे से फैला पा रहे हैं, आपकी आवाज़ में ग़ुस्सा दिख रहा है, आप वीर रस की ज़ोरदार कविता गा रहे हैं या कापी पेस्ट कर रहे हैं, आप अगर सोनू निगम की तरह सेक्युलर लोगों को गाली दे रहे हैं, आप ग्रांडमास्टर शीफ़ू और पायल रोहतगी की तरह धर्मनिरपेक्षता को निशाने पर ले रहे हैं तो कमल की मुहर वाला देशभक्ति का सर्टिफिकेट ले जाइए.
पर नफ़रती लोगों को मालूम होना चाहिए कि पुलवामा में शहीद एक जवान कश्मीर का नसीर अहमद है पिछले दिनों औरंगजेब नाम के कश्मीरी जवान ने भी शहादत दी थी. मुशर्रफ़ ने अपनी भारत यात्रा के दौरान जब भारत में मुसलमानों की स्थिति पर चिंता ज़ाहिर करने के बहाने भारत को नीचा दिखाने की कोशिश की थी तब मौलाना महमूद मदनी ही थे जिन्होंने उसे ज़ोरदार जवाब देकर उसकी बोलती बंद कर दी थी. ये वो देश है जहां देश के सबसे लोकप्रिय भजन शकील बदायूंनी ने लिखे, मोहम्मद रफ़ी ने गाए और नौशाद और ख़य्याम ने उन्हें संगीतबद्ध किया.
इस देश की मूल आत्मा को बहुत लोग बदलने की कोशिश में लगे हैं. उन्हें सभी पहचानते हैं, पर उनकी धूर्त साज़िशों को भी पहचानना होगा.
मुनव्वर राणा साहब ने ठीक ही फ़रमाया है
“बस इतनी सी बात पर उसने हमें बलवाई लिखा है
हमारे घर के एक बर्तन पर “आईएसआई” लिखा है”
हम क्या कर सकते हैं?
आतंकवाद और उससे पैदा होने वाली समस्या से सरकार को लड़ना है. हमारा काम उसकी नीति और नीयत पर पैनी नज़र रखना है. हम आतंक से घर बैठे बोलकर, लिखकर, नारे लगाकर, मोमबत्ती जला कर, शोकसभा में शामिल होकर नहीं लड़ सकते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि ये सब ना करें, जरूर करें, लेकिन ध्यान रखें हमारा विरोध प्रदर्शन केवल हँसी-ठिठोली न बन जाए, श्रद्धांजलि सभाएं केवल फ़ोटो खिंचवाने का मौक़ा न बन जाएं, ये मौक़ा किसी धर्म विशेष का विरोध न बन जाए.
ऐसा न हो जाये कि कल तक जो महिला पर छींटाकशी कर रहा था वो आज देशप्रेम के नारे लगा रहा हो.
आतंकवादी और पाकिस्तान में बैठे उनके आका आतंकी गतिविधियों के ज़रिए न केवल भय फैलाना चाह रहे हैं बल्कि इस देश की एकता अखंडता, धर्मनिरपेक्षता पर चोट करना चाहते हैं. वो चाहते हैं कि देश के मुसलमानों को ये बताया जाए कि भारत देश उनके लिए सुरक्षित नहीं है और हम एक कौम के खिलाफ़ नफ़रत बढ़ा कर उनका काम आसान बना रहे हैं.
जब परिवार पर कोई बाहरी हमला करता है तो परिवार को आपसी भेद भुलाकर एक होना पड़ता है. मुश्किल वक्त में देश के भिन्न-भिन्न विचारों वालों को और मजबूती के साथ एक होना पड़ता है. ध्यान रखना पड़ेगा कि इस नाज़ुक मौक़े का कोई राजनीतिक इस्तेमाल तो नहीं कर रहा.
अगर हम और आप सचेत नहीं हुए तो आपके आक्रोश की आंच पर कोई अपनी चाय की केतली चढ़ाता रहेगा और आपको भनक भी नहीं लगेगी.
“इस सरकार ने आपके लिए बहुत कुछ किया है। आपने यूपी में भाजपा को अप्रत्याशित बहुमत दिया था। मैं चाहता हूँ कि आप आगे भी मुझ पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें।” देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झाँसी में पुलवामा अटैक के अगले दिन बोल रहे थे।
जब देश पर एक बड़ा आतंकी हमला हो और अगले ही दिन देश का प्रधानमंत्री चुनाव में वोट माँगने लगे तो यह अशोभनीय है या नहीं, आप तय कीजिये. तय कीजिये कि क्या यह देखा नहीं जाना चाहिए कि आतंकी हमलों पर 2014 से पहले के मोदी और बाद के मोदी के आचरण में कोई फर्क़ है क्या?
घटना के बाद सरकार और सरकारी पार्टी का आचरण ऐसा क्यों?
मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब आतंकी घटनाओं पर वो सरकार पर कड़े जुबानी हमले करते हुए इस्तीफे की मांग करते थे. याद कीजिये कि मुंबई हमले के बाद तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल को इस्तीफा देना पड़ा था लेकिन कहना राजनाथ सिंह का कि वर्तमान सरकार में इस्तीफे नहीं होते हैं. इस वक़्त छवि-प्रबंधन का दबाव ऐसा है कि विपक्ष के बड़े नेता भी सरकार को उस तरह नहीं घेर रहे, जैसे २०१४ से पहले मोदी यूपीए को घेरते थे. बल्कि विपक्ष सरकार की हर कार्रवाई में साथ रहने की बात कर रहा है।फ़िलहाल अभी तक किसी ने प्रधानमंत्री या गृहमंत्री से इस्तीफा भी नहीं मांगा है। जब सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक की तो वाहवाही सरकार ने लूटी. पर जब ज़िम्मेदारी तय करने का वक़्त आया तो केवल सुरक्षा की चूक बता कर छोड़ दिया गया। इंटेलीजेंस इनपुट होने के बाद भी इस हमले को नहीं रोका जा सका। ख़बरों के मुताबिक़ सीआरपीएफ ने सरकार से अपने सैनिकों को एअर लिफ़्ट करने की माँग की थी लेकिन गृह मंत्रालय ने इस माँग को ठुकरा दिया था, मजबूरन इतनी बड़ी संख्या में सड़क के रास्ते निकलना पड़ा। आख़िरी बार कश्मीर जैसी संवेदनशील जगह पर २५०० से ज़्यादा जवानों का काफिला कब निकला था, पता करके बताइएगा.
आतंकी घटना जिस दिन हुई उस शाम अमित शाह कर्नाटक में एक सभा में अयोध्या में राम मंदिर बनाने का ऐलान कर रहे थे। यूपी जहां से सबसे अधिक जवान शहीद हुए के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ केरल में सबरीमाला के नाम पर वोट माँग रहे थे। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष और सांसद मनोज तिवारी रात में प्रयाग कुम्भ में खुशी-खुशी “हो गइल बा प्यार ओढनिया वाली से” गा रहे थे। सुबह होते-होते ट्विटर पर उन्होंने आतंकी घटना से स्वयं को स्तब्ध बताया, उन्हें गुस्सा आने लगा और आंसुओं को रोकना दुष्कर हो गया.
घटना के अगले दिन भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने प्रधानमंत्री मोदी की सभी राजनीतिक सभाएं रद्द करने की घोषणा की। लेकिन प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के साथ झांसी पंहुचे कुछ सरकारी योजनाओं का उद्घाटन किया और पहले से तय एक बड़ी सभा को संबोधित किया।अपने लंबे भाषण के शुरुआत में पुलवामा अटैक पर शोक जताया, शहीदों को श्रद्धांजलि दी, आतंकियों को चेताया, आतंक के समर्थकों को चेताया ये भी अच्छी बात थी।लेकिन सभा का आयोजन चुनाव के मद्देनज़र किया गया था और मोदी की हर सभाओं की तरह खर्चा भी किया गया भीड़ भी काफ़ी इकट्टी की गई थी इसलिए मोदी जी ने अपने आगे के भाषण में यूपी में बहुमत के लिए लोगों का धन्यवाद किया,केंद्र की योजनाओं का गुणगान किया और आने वाले चुनाव में दुबारा से जीत का आशीर्वाद मांगा। कुछ अख़बारों के मुताबिक़ हमले वाले दिन भी प्रधानमंत्री शाम तक बिजनौर में डिस्कवरी चैनल के एक प्रोग्राम की शूटिंग में व्यस्त थे।
आतंकी घटना के बाद प्रधानमंत्री ने संसद में सर्वदलीय बैठक बुलायी लेकिन लेकिन वो ख़ुद उसमें शामिल नहीं हुए और महाराष्ट्र में सभा करने निकल लिए. विपक्ष के बड़े नेता गृह मंत्री के साथ बैठक में शामिल हुए। एक स्टेट्समैन की भाषा ऐसे समय में संयमति होनी चाहिए और उसे देश में शांति बनाए रखने की अपील करनी चाहिए. लेकिन प्रधानमंत्री चुनावी सभाओं में कह रहे हैं कि आपकी तरह मेरा भी ख़ून खौल रहा है. इस तरह वह ख़ून खौलने से संचालित होने वाले हर तत्व को ऑक्सीजन मुहैया करा रहे हैं. देहरादून, हरियाणा और बिहार में कश्मीरी छात्रों पर हमले करने वालों का ख़ून भी खौल ही रहा था.
उरी और पठानकोट हमले के बावजूद सरकारी मंत्री बताते रहे कि इस सरकार में देश पर कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ है। हमले के एक दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू यही बयान दे कर अपनी पीठ थपथपा रहे थे।
भाजपा नेतृत्व ने पार्टी नेताओं, सांसदों, विधायकों को निर्देश जारी कर किया कि शहीद सैनिक की शव यात्रा में शामिल होना है। इसे चुनाव में वोट पाने का अच्छा मौक़ा बना लिया है. साक्षी महाराज उन्नाव में शहीद सिपाही के शव वाहन में सबसे आगे सवार हुए और हाथ जोड़ कर अभिवादन भी स्वीकार किया।केरल में मोदी सरकार में मंत्री अलफोन्सो शहीद जवान के शव के साथ साथ सेल्फ़ी लेते पाए गए ।अन्य जगहों पर भी नेताओं ने फ़ोटो खिंचाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा। अटल जी की राख को लोटों में भर कर सभी राज्यों में घुमाने वाले शहीद सैनिक के शव पर वोट की खेती करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ रहे हैं। जब भाजपा प्रवक्ता कहते हैं कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए तो क्या वो ये कह रहे होते हैं कि इस राजनीति पर उनका एकाधिकार है?
अतीत और वर्तमान में भाजपा की कश्मीर नीति और नियत में अंतर क्यों?
पिछले कुछ साल कश्मीर में ज़्यादा मुश्किल थे। पथरबाज लगातार बढ़ रहे थे, आतंकी भी मारे जा रहे थे लेकिन बदले में हम अपने जवानों और नागरिकों को खो रहे थे।सरकार मारे हुए आतंकियों को गिनकर अपनी पीठ थपथपा रही थी ।जबकि हमने कितने अपने खोए इसकी चर्चाओं को कालीन के नीचे दबाया जा रहा था।
दरअसल भाजपा सरकार कश्मीर-नीति हमेशा ही अस्पष्ट और प्रपंच से भरी रही है. जिसमें शोर है, लेकिन अपने ही मुद्दों का क्रियान्वयन नहीं है. कैसे?
भाजपा ने हमेशा धारा ३७० हटाने की बात की है लेकिन दो बार सरकार में आने बाद भी इस दिशा में कुछ नहीं किया। इस बार तो पूर्ण बहुमत था लेकिन मोदी सरकार पीडीपी के चरणों में जा कर बैठ गयी।
अटल बिहारी जब प्रधानमंत्री थे तब दिल्ली से लाहौर बस चलायी गयी, मुशर्रफ़ को आगरा बुलाकर शिखर वार्ता की गयी लेकिन फिर सीमा पर घुसपैठिए आ धमके और देश को कारगिल युद्ध लड़ना पड़ा।इस सरकार के दौरान देश की संसद तक पर आतंकी हमला हुआ।
अटल-सरकार में कंधार विमान अपहरण के बाद छोड़ा गया आतंकी मसूद अज़हर भारत के लिए नासूर बन गया है। बाद के हुए अधिकतर हमले में उसी का हाथ बताया गया है।मसूद अज़हर जिसे 1999 में कंधार विमान अपहरण के बाद छोड़ा गया- वो 1994 में भी गिरफ़्तार हुआ था और फिर आतंकवादियों ने 6 विदेशी नागरिकों का अपहरण किया गया था और बदले में उसकी रिहाई की माँग की लेकिन तब की सरकार ने उसे नहीं छोड़ा था।
प्रधानमंत्री ने चीनी राष्ट्रपति को साबरमती के तट पर झूला झुलाया लेकिन इस झूला डिप्लोमेसी के बाद भी चीन ने विश्व पटल पर कभी मसूद अज़हर को आतंकी नहीं माना और उस पर कार्यवाही करने में भारत का साथ नहीं दिया।
भाजपा के लोग जिस पार्टी को हुरीयत् और आतंकियों का समर्थक बतलाते थे उसी पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनायी।कश्मीर के लिए अपनी सारी नीति को सत्ता के लालच में दरकिनार कर दिया।
पूर्व अलगाववादी नेता और पाकिस्तान समर्थक नेता के दामाद सज्जाद लोन से भाजपा की नज़दीकियाँ २०१४ के बाद से बढ़ गयी। उन्हें भाजपा ने अपने कोटे से राज्य में मंत्री बनाया। पीडीपी से समर्थन वापसी के बाद लोन के भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनने की अटकलें भी थी जिसका ख़ुलासा ख़ुद जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मालिक ने किया था लेकिन भाजपा ज़रूरी बहुमत नहीं जुटा पायी और आख़िरकार जम्मू और कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।
एक तरफ़ मोदी सरकार ने पाकिस्तान को पठानकोट हमले का ज़िम्मेदार ठहराया दूसरी और उसी पाकिस्तान की इंटेलीजेंस एजेंसी आई एस आई को पठानकोट एयरबेस बुला कर जाँच करने को कहा।
मोदी के अपने उधोगपति दोस्त पाकिस्तान के साथ व्यापार कर रहे हैं,पैसा कमा रहे हैं लेकिन मोदी जी को इस पर कोई एतराज़ नहीं है। मोदी समर्थकों को पाकिस्तान के एक्टर और संगीतकारों से दिक़्क़त है।
भाजपा जब विपक्ष में थी तब उनके नेताओं के बयान याद कीजिए। स्मृति इरानी प्रधानमंत्री को चूड़ी पहना रही थी, गिरिराज सिंह का कहना था कि अगर मोदी प्रधानमंत्री होते तो लाहौर तक चढ़ाई कर चुके होते। अमित शाह कहते थे कि अगर मोदी प्रधानमंत्री होते थे तो आतंकवादियों की भारत में घुसने की हिम्मत नहीं होती। ख़ुद तब गुजरात के प्रधानमंत्री आतंकी घटना के बाद कांग्रेस को घेरने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते थे और सलाह देते थे पाकिस्तान को लव लेटर लिखना बंद कर देना चाहिए लेकिन 2014 में प्रधानमंत्री बनाने के बाद मोदी ने अपने के शपथ ग्रहण में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को न्योता दिया, उम्मीद की गयी कि मोदी बातचीत के रास्ते पर बढ़ेंगे। अचानक से जब ख़ुद वो पाकिस्तान पहुँच गए तब इसे और बल मिला लेकिन इस रास्ते पर वो आगे नहीं बढ़ सके।
देश की आंतरिक सुरक्षा का मामला हो या बाहर के दुश्मनों से निपटना हो, सभी राजनीतिक विचारधारा के लोगों को एक साथ आना चाहिए। इस पर एक दूसरे पर आरोप लगाने से बाज़ आना चाहिए लेकिन सरकार के रवैये से लगता है कि इस पर बस विपक्षी पार्टियों को राजनीति नहीं करनी चाहिए लेकिन उन्हें खुल कर राजनीति करने का हक़ है।
मोदी ने हमले के बाद कहा था कि हमने सेना को खुली छूट दे दी है। इस खुली छूट का क्या मतलब है? क्या पठानकोट और उरी हमले के बाद भी सेना के हाथ बांधे रखे गए थे? क्या एलओसी पर या कश्मीर में अब तक सेना को ज़रूरत पड़ने पर बंदूकों का मुंह खोलने की अनुमति नहीं थी? या सेना को खुली छूट का नारा देकर प्रधानमंत्री तुरंत बेरोज़गारी, कमज़ोर अर्थव्यवस्था और किसानों में निराशा के आरोपों से बरी होकर देशभक्ति के रथ पर सवार हो गए हैं?
शहीदों की मौत का बदला लिया जाना चाहिए पर कहीं इसे किसी ने अपना राजनीतिक प्लेटफॉर्म तो नहीं बना लिया?
प्रियंका गांधी राजनीति से अछूती तो कभी नहीं रहीं लेकिन अखाड़े में पहली बार उतर रही हैं. पूर्वांचल किन संभावनाओं और चुनौतियों के साथ उनका इंतज़ार कर रहा है?
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले के एक छोटे से गाँव में एक ठाकुर साहब रहते थे। (गांव और परिवार की जानकारी सार्वजनिक नहीं कर सकता) ठाकुर साहब के बारे में दो बातें विख्यात थी एक तो वो काँग्रेस पार्टी बड़े समर्थक थे दूसरा वो खेती- ज़मीन के मामले में संपन्न थे । बाद के दिनों में ठाकुर साहब दूर- सुदुर तक एक और बात के लिए पहचाने जाने लगे कि वो प्रियंका गांधी को ख़ूब पसंद करते थे । उनके सामने प्रियंका की कोई बुराई कर दे तो वो अवधी में ख़ूब गरियाते थे। प्रियंका को देखने और सुनने के लिए ठाकुर साहब अपने सारे काम धंधे छोड़कर अमेठी या रायबरेली तक चले जाते थे। जैसे- जैसे समय बढ़ता गया ठाकुर साहब की प्रियंका को लेकर दीवानगी भी बढ़ती गयी। यह दीवानगी एक तरफा प्यार में बदल गई। ठाकुर साहब शादीशुदा थे बावज़ूद इसके उनके मन में प्रियंका से शादी के सपने पलने लगे थे. गाँव भर में अपने इस प्यार को वो जता भी चुके थे। लोग उनके बारे के अजब-ग़ज़ब बातें करते थे, कहते हैं कि एक बार प्रियंका से मिलने वो दिल्ली तक आ धमके थे और गांव वापस पहुंचकर उन्होंने गांवभर में प्रियंका से अपनी मुलाक़ात के ख़ूब किस्से सुनाये. हालांकि वो प्रियंका से मिल पाए या नहीं ये वही जानते होंगे लेकिन गांव में अब सब लोग जान चुके थे कि ठकुरवा प्रियंका से प्यार करत है और शादी करेक ख़्वाब पाले बा.
बताने वाले सुरती मलते हुए यह भी बताते हैं कि एक बार अमेठी में ठाकुर साहब प्रियंका से हाथ मिलाने पहुँच गए थे और किस बदनाम शायर से प्रभावित होकर उन्होंने प्रियंका का हाथ देर तक दबाए रखा था। प्रियंका मुस्कुरा कर रह गयी लेकिन इस घटना पर ठाकुर साहब के लिए एनएसजी वालों की प्रतिक्रिया बहुत सम्मानजनक नहीं थी।
अपने इस प्यार को लेकर ठाकुर साहब जगहँसाई का पात्र बन चुके थे। स्कूली लड़के शुरू में उनके पीछे और कालांतर में सामने भी उनके मजे लेते थे। लेकिन बेपरवाह ठाकुर साहब सारा काम छोड़कर प्रियंका से मुलाक़ात की जुगत में लगे रहते थे इसके लिए उन्होंने हर संभव कोशिश भी की। जहाँ ज़रूरी लगा, घूस इत्यादि में भी निवेश किया। धीरे धीरे पूंजी और बाकी संसाधन लुटा दिए।
साल 1997 में प्रियंका गांधी रॉबर्ट वाड्रा से शादी के बंधन में बंध गई। इसके बाद भी ठाकुर साहब का सनकपन कम नहीं हुआ जिसकी वज़ह से उनका पूरा परिवार बिख़रने लगा।धन तो पहले ही लुटा चुके थे, जो थोड़ी-बहुत जमीन बाकी थी गांव वालों ने उनके सनकपन का फ़ायदा उठाकर अपने-अपने नाम करवा ली.
हालत यहाँ तक पहुँच गई कि कभी गांव का सबसे समृद्ध रहा ठाकुर परिवार भीख मांगने लगा।
ठाकुर साहब ने अफ़ीम की झौंक में अपनी काल्पनिक दुनिया बना ली और कभी कभी ये गाना गुनगुनाने लगे-
“इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं किस कदर चोट खाये हुये हैं
मौत ने हमको मारा है और हम ज़िन्दगी के सताये हुये हैं”
किसी फ़िल्मी कहानी की तरह इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स नहीं हैं। प्रियंका गांधी के प्रति ठाकुर साहब की दीवानगी ने उन्हें बर्बाद कर दिया। ऐसी दीवानगी पर नेता जन हाऊ क्यूट कहकर मुग्ध हो सकते हैं पर इसके ख़तरनाक परिणामों की ख़बर पता नहीं उन्हें मिलती भी होगी या नहीं। एक नेता के लिए उनके समर्थकों की बेपरवाह भक्तई क्या गुल खिला सकती है यह हम २०१४ के बाद से देख ही रहे हैं।
आप मानिए या ना मानिए लेकिन यूपी के रायबरेली-अमेठी-सुल्तानपुर-इलाहाबाद बेल्ट में गांधी परिवार से जुड़ी ऐसी कई सच्ची कहानियां है, जिसमें एक परिवार बर्बाद हुआ तो बहुत से परिवार आबाद भी हुए।
यहाँ के ब्रह्मण और ठाकुर बहुल गावों में गांधी परिवार के लिए एक भावनात्मक लगाव रहा है. बुज़ुर्गों में इंदिरा गांधी काफ़ी लोकप्रिय रही हैं और उनके पास उनसे जुड़ी कई कहानियाँ मौजूद हैं। आज भी बुज़ुर्ग राहुल और प्रियंका को इंदिरा के पोते-पोती और राजीव गांधी के बेटे-बेटी के रूप में ही ज़्यादा जानते-मानते हैं.
प्रियंका गांधी अब राजनीति में आ गयी है। आते है बड़े भाई राहुल गांधी ने उन्हें कांग्रेस की महासचिव बना कर 2019 लोकसभा चुनाव के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश की अहम जिम्मेदारी भी दे दी है। प्रियंका का इस तरह राजनीति में आना क्या कांग्रेस की किस्मत बदल पायेगा यह तो चुनाव बाद ही पता चलेगा लेकिन लोकसभा के चुनाव में इसका क्या संभावित असर पड़ सकता है इस पर नज़र डालेंगे।
उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा क्षेत्रों में से 40 की ज़िम्मेदारी प्रियंका को दी गयी है । प्रियंका केवल प्रचार करेगी या चुनाव भी लड़ेगी यह अभी तय नहीं है लेकिन इन क्षेत्रों में एक आम राय है कि प्रियंका राहुल की तुलना में ज़्यादा असरदार है।अगर प्रियंका अपनी माँ की रायबरेली सीट या भाई की अमेठी सीट से चुनाव लड़ती हैं तो यक़ीनन वो जीत के अंतर को बढ़ाएगीं। प्रियंका के आने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है। कार्यकर्ताओं का बढ़ा मनोबल कांग्रेस के भविष्य पर क्या संभावित प्रभाव डालेगा .इस पर एक नज़र डालते हैं.
संभावना 1 :-
प्रियंका का चुनाव में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.
प्रियंका गांधी पिछले दो- तीन चुनावों से केवल अमेठी और रायबरेली की जिम्मेदारी संभाल रही है.1999 से लगातार दोनों जगह पर कांग्रेस जीतती रही है।
लोकसभा चुनावों के अलावा प्रियंका गांधी विधानसभा चुनावों में भी इन्हीं दो क्षेत्रों में प्रचार करती हुई दिखती हैं। लेकिन पिछले विधानसभा में जहां रायबरेली के पांच विधानसभावो में से केवल दो (रायबरेली सदर और हरचंदपुर) पर ही कांग्रेस प्रत्याशी जीत पाए वहीं अमेठी के पांच विधानसभा क्षेत्रों में कोई भी कांग्रेस विधायक नहीं है.
यानि अगर यह माना जाए कि प्रियंका के प्रचार का लोकसभा में असर डालता है तो विधानसभा में इस असर को क्या हो जाता है?
संभावना 2 :-
कांग्रेस को बड़ा फ़ायदा होगा।
पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश से केवल रायबरेली और अमेठी सीट ही मिली थी। उससे पहले वाले लोकसभा चुनाव मैं कांग्रेस ने २१ सीट्स पर सफलता प्राप्त की थी।
२०१९ के चुनाव मैं कांग्रेस अकेले लड़कर अपनी पुरानी सफलता को भी अगर दोहरा दे तो बड़ी बात होगी। प्रियंका के कमान संभालने से पार्टी के कार्यकताओं में जोश ज़रूर है लेकिन पार्टी को इससे कोई अप्रत्याशित परिणाम मिलने वाला है ऐसा नहीं लगता है। सपा+बसपा गठबंधन के बाद कांग्रेस की हालत और ख़राब है, वो अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही है। प्र
सम्भावना 3:-
भाजपा को फ़ायदा होगा।
उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठपन्धन के बाद भाजपा की चिंताएँ बढ़ गयी थी क्योंकि भाजपा विरोधी वोट एक मुश्त गठबंधन को मिल जाएँगे जिससे भाजपा गठबंधन को बढ़ा नुक़सान हो सकता है लेकिन अगर प्रियंका के आने से कांग्रेस की स्थिति मज़बूत होती है तो मुक़ाबला त्रिकोणीय हो जाएगा और इसका सीधा नुक़सान सपा-बसपा गठनबाँधन को होगा। सपा-बसपा को नुक़सान का सीधा फ़ायदा भाजपा गठबंधन को ही होगा।
सम्भावना 4:-
महागठबँधन को फ़ायदा और भाजपा गठबंधन को नुक़सान।
इस सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश की राजनीति जाति पर ही आधारित है। सवर्ण और ओबीसी जातियों के वोट भाजपा को मिलते हैं दलित अभी भी मायावती के साथ हैं, यादव अखिलेश के साथ और मुसलमान भाजपा को हराने वाले के साथ। एक थ्योरी यह भी कहती है कि प्रियंका के आने से कुछ सवर्ण वोट भाजपा से छिटककर कांग्रेस के हिस्से में जा सकते हैं जिससे भाजपा को नुक़सान होने की सम्भावना है।
राजनीति में किसी भी सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। अगर चुनाव से कांग्रेस २-४ सीट पर मान कर सपा+बसपा गठबंधन में शामिल हो जाती है तो शायद भाजपा को कड़ी चुनौती मिलेगी।ऐसी परिस्थिति में भाजपा गठबंधन का दहाई तक भी पहुँचना मुश्किल हो सकता है।
फिर कांग्रेस के पास यह नारा लगाने की असल वजह भी होगी।
“मोदी की लंका करो दहन
प्रियंका बहन प्रियंका बहन”
अगर विपक्ष अच्छा करता है तो प्रधानमंत्री कौन होगा इस पर तरह- तरह की अटकलें हैं लेकिन 2004 याद रखिये…कांग्रेस के पास प्रधानमंत्री उम्मीदवार के नाम पर कोई घोषित नाम नहीं था बावज़ूद इसके कांग्रेस ने जीत हासिल की थी।
पढ़िए, केंद्र सरकार का सवर्ण आरक्षण क्यों ग़रीब सवर्णों का नुकसान अधिक करेगा?
प्रधानमंत्री ने चुनाव से ठीक पहले सवर्ण आरक्षण का अप्रत्याशित कार्ड खेला है. फोटो: facebook.com/narendramodi
किसी चैनल की स्क्रीन पर देखा कि आज पांडे, मिश्रा, गुप्ता और श्रीवास्तव ख़ुश होंगे. वजह, केंद्र की मोदी सरकार ने ‘गरीब’ सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण वाला बिल संसद में पास हो गया है और राष्ट्रपति की मंज़ूरी के बाद कुछ राज्यों में लागू भी हो गया है.
पर यह अगड़ी जातियों के लिए हितकारी होगा, इस पर संशय के पर्याप्त कारण हैं. उस पर बात आगे, लेकिन पहले इस तथ्य की पड़ताल कि क्या यह एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व पहल है, जैसा सरकार समर्थक दावा कर रहे हैं.
अभूतपूर्व कैसे?
आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों को आरक्षण की पहली कोशिश प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हाराव की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने 1991 में की थी. लेकिन इंदिरा साहनी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इस फैसले को पलट दिया था. अदालत ने ग़रीब सवर्णों को आरक्षण दिए जाने का कोई संवैधानिक आधार नहीं पाया. हालांकि समय-समय पर कई नेता सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करते रहे जिसमें बसपा नेत्री मायावती भी शामिल हैं.
तो सौ बात में पहली बात, मोदी सरकार की यह कोशिश पहली और अनूठी कतई नहीं है.
संवैधानिक अड़चनें और अन्य चुनौतियाँ
उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तक ही निर्धारित की है (तमिलनाडु में 69 फीसदी को छोड़कर). राज्यों में जातिगत आरक्षण की अधिकतम सीमा अलग-अलग है क्योंकि हर राज्य में सामाजिक और शैक्षिक आधार पर पिछड़ेपन का पैमाना अलग-अलग है.
यह जानी हुई बात है कि संविधान में फिलहाल आर्थिक रूप से कमज़ोर होने को आरक्षण का आधार नहीं माना गया है. इसी आधार पर इसे सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी गई थी. इसके अलावा संविधान के कुछ दूसरे अनुच्छेदों से विरोधाभासी बताते हुए भी इसे न्यायिक चुनौती दी जा सकती है. बेवजह नहीं है कि सामाजिक न्याय मंत्री थावर सिंह गहलोत ने माना है कि अगर बिल के खिलाफ कोई कोर्ट जाता है तो सरकार के लिए यह ज़रूर एक चुनौती होगी.
ग़रीब कौन?
इस विधेयक का जो सबसे अजीबोग़रीब पहलू है, वह ‘गरीब’ सवर्णों का क्राइटेरिया है. इसमें गरीबी रेखा से नीचे के सवर्णों को रखने के बजाय 8 लाख सालाना आमदनी की सीमा रखी गई है.
अजीब बात है कि 8 लाख आमदनी वाला व्यक्ति 10 परसेंट इनकम टैक्स देता है लेकिन आरक्षण के नए मानक पर वह गरीब है. मांग उठती है कि ढाई लाख से ज्यादा सालाना आय वाले को क्रीमी लेयर माना जाए लेकिन 8 लाख वाला आर्थिक तौर पर कमज़ोर है. 1000 स्क्वायर फ़ीट मकान का मालिक प्रधानमंत्री आवास योजना का फ़ायदा नहीं ले सकता लेकिन वो सवर्ण आरक्षण का लाभ ले सकता है. 5 एकड़ तक ज़मीन का मालिक भी ग़रीब है.
इस हिसाब से मोदी सरकार के नए मानकों से अधिकतम सवर्ण ग़रीब होंगे.
क्या इससे सवर्णों को वाक़ई फ़ायदा होगा?
नए मानकों से अधिकतम सवर्ण आरक्षण के लिए एलिजिबल हो जाते हैं. 8 लाख सालाना आय, 1000 स्क्वायर मकान, 5 एकड़ जमीन. यानी ये सवर्ण जो पहले 50 फीसदी के हिस्सेदार थे वो अब 10 फीसदी में सिमट जाएंगे और बची हुई 40 फीसदी अनारक्षित सीटें परोक्ष रूप से 10 फीसदी समृद्ध सवर्णों के लिए आरक्षित हो जाएंगी.
फर्ज़ कीजिए कि आप ओबीसी हैं. आप जब कोई फॉर्म भरते हैं तो आप ओबीसी के आगे टिक करते हैं और तब आपका चयन ओबीसी के लिए तय कोटे के भीतर ही होगा. अब गरीब सवर्णों की बड़ी आबादी 10 फीसदी सीटों के लिए सीमित हो जाएगी जिसके लिए पहले परोक्ष रूप से 50 फीसदी का खुला मैदान होता था. यह बात आप जानते हैं कि जब आप आरक्षण के किसी कोटे से आवेदन करते हैं तो आप अनारक्षित सीटों के हकदार नहीं होते.
भारत के अलग-अलग राज्यों में जातिगत आरक्षण अलग-अलग है. उत्तर प्रदेश में ओबीसी कोटा 27 फीसदी है जबकि मध्य प्रदेश में 14 फीसदी है. जबकि दोनों राज्यों में ओबीसी आबादी में ज्यादा अंतर नहीं है. इसलिए कई बहुजनवादी राजनीतिक दल और सामाजिक कार्यकर्ता आबादी के हिसाब से आरक्षण के वक़ालत करते रहे हैं और ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा बुलंद करते रहे हैं. यहां से यह आंदोलन नए सिरे से आगे बढ़ सकता है.
कई अम्बेडकरवादी कहते हैं कि देश की 85 फीसदी आबादी को सिर्फ 50 प्रतिशत आरक्षण मिलता है और बाकी का 50 फीसदी कोटा 15 फीसदी लोगों के लिए सुरक्षित रख दिया है. ये दलील नई नहीं है कि अनारक्षित 50 फीसदी कोटा ही असली आरक्षण है, जिस पर सवर्णों का कब्ज़ा रहा है. यदि यह कब्जा रहा है तो मोदी सरकार की इस कोशिश से यह कब्जा बंटेगा. गरीब सवर्ण 10 फीसदी में सिमट जाएगा और 40 फीसदी का फायदा मिलेगा समृद्ध सवर्णों को.
यह मानने का कोई कारण नहीं कि सरकार के अनुभवी सूरमा इन तकनीकी पहलुओं से वाकिफ़ नहीं होंगे. संवैधानिक चुनौतियों से भी और भविष्य में इसके असर से भी.
ठगे जाने पर ताली बजाकर खुश न होइए. चुनावी लॉलीपॉप का मुहावरा बोरिंग लगे तो नौ मन तेल और राधा के नृत्य का मुहावरा जोड़ लीजिए. न तेल होगा, न नृत्य होगा. अभी जनवरी है, अप्रैल में चुनाव होगा.