
कोरोना वायरस का इनफ़ेक्शन अब काबू के बाहर हो रहा है तो इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? केन्द्र सरकार की या राज्य सरकारों की? किसकी ज़िम्मेदारी ज़्यादा बनती है. चलिए, कुछ दलीलों से होते हुए ज़िम्मेदारी तय करने की कोशिश करते हैं.
सामान्य सी बात है कि ज़िम्मेदारी ऊपर से तय होती है. तो ऊपर से ही बात शुरू करते हैं.
● देश में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को केरल में आया. कोरोना वायरस यहाँ पैदा नहीं हुआ, दूसरे देशों से आया है. दूसरे देश से आने का रास्ता देश के इंटरनेशल एयरपोर्ट्स हैं जो भारत सरकार के अधीन आते हैं. विदेश से सही समय पर आवाजाही रोकने की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की थी, जिसमें वो नाकाम रही.

● मार्च के दूसरे हफ़्ते तक केंद्र सरकार ने कोरोना वायरस को गंभीर समस्या नहीं माना. स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने कहा कि यह ‘हेल्थ इमरजेंसी’ नहीं है. राहुल गांधी समेत कुछ नेताओं ने सरकार को आने वाले ख़तरे के बारे में चेताया भी लेकिन सरकार समर्थकों ने उनकी खिल्ली उड़ाई. सामने खड़ी बड़ी समस्या की अनदेखी की जाती रही.

● हमारे सामने दुनिया भर के उदाहरण थे. WHO के दिशा-निर्देश थे. लेकिन फिर भी हम देर से जागे. जगाने का सबसे पहला अलार्म केंद्र सरकार को बजाना था क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और देशों से नॉलेज शेयरिंग का काम उसका था. मसलन, एयरपोर्ट्स पर कई दिनों तक थर्मल स्क्रीनिंग को ही काफ़ी माना गया. क्वारंटीन को अनिवार्य बनाने में हमने बहुत देर कर दी. जबकि इटली में दुनिया ने देखा था कि कैसे बिना लक्षण वाले लोग कोरोना कैरियर्स बन गए थे.
● कोरोना से जुड़े सभी शुरुआती बड़े फैसले प्रधानमंत्री ने स्वयं लिए. राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई. लॉकडाउन की गाइडलाइन्स भी केंद्र के स्तर से तय की गई. यहां तक कि जब शहरों को अलग-अलग जोन में बांटने की बारी आई तो शुरू में वह भी केंद्र के स्तर पर ही हुआ. दिल्ली में बैठा केंद्र सरकार का अधिकारी केरल के शहर की स्थिति भांप रहा था. तीन महीने के लॉकडाउन के बावजूद अगर हम दुनिया के चौथे सबसे संक्रमित देश हैं तो लॉकडाउन नाकाम रहा. इसकी ज़िम्मेदारी भी केंद्र की अधिक है.

● दुनियाभर में ऐसी मिसालें थीं कि अगर ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग करके कोरोना केस identify कर लिये जाए और उन्हें दूसरों से अलग रखा जाए तो इसे बढ़ने से रोका जा सकता है. भारत शुरुआत से ही टेस्टिंग में काफ़ी स्लो रहा. टेस्टिंग सेन्टर कम थे पर सरकार ने कभी ये बात नहीं स्वीकारी. आज हम दो लाख टेस्ट रोज़ कर रहे हैं, कभी दस हज़ार भी नहीं करते थे. राज्यों को टेस्टिंग किट मिलने में दिक्कतें पेश आईं. केंद्र सरकार के स्तर से यह काम बड़ा ही ढीला रहा.

● स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है. किसी भी बीमारी के इलाज की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की है. स्वास्थ्य बजट का 60 फीसदी से ज्यादा राज्य सरकारें तय करती हैं बाकी केंद्र सरकार. इसलिए कोरोना में उपचार की व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी राज्य की अधिक है. अगर वहाँ कमी होती है तो वो राज्य सरकार का फेलियर है.
दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है इसलिए इसका केस अलग है. दिल्ली में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं तीन स्तर पर हैं. एम्स, सफदरजंग, आरएमएल जैसे बड़े हॉस्पिटल्स केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन हैं. एलएनजेपी और जीटीबी जैसे हॉस्पिटल राज्य सरकार के अंतर्गत आते हैं जबकि कुछ छोटे हॉस्पिटल एमसीडी के अधीन काम करते हैं. सरकारी हॉस्पिटल्स के अलावा यहां सभी बड़े प्राइवेट हॉस्पिटल्स भी हैं. स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में दिल्ली कागज़ों पर बेहतर दिखती है लेकिन कोरोना काल में यहाँ की स्थिति भी ख़राब है.
केजरीवाल सरकार दावा कर रही है कि हमारे पास पर्याप्त बेड और वेंटिलेटर हैं लेकिन संक्रमित लोगों को हॉस्पिटल्स में एंट्री तक मिलना मुश्किल हो रहा है. जब दिल्ली का ये हाल है तो उन राज्यों का हाल क्या होगा जो हेल्थ इंडेक्स में बहुत नीचे हैं.

● राज्य सरकार के बाद सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी का नंबर हैं. इन पर व्यवस्थाओं को बनाने और लागू करने की जिम्मेदारी है. इनमें पुलिस, प्रशासन, स्वास्थ्य, खाद्य आपूर्ति आदि से जुड़े लोग शामिल हैं.

● जिम्मेदारी के इस क्रम में सबसे आख़िरी जिम्मेदारी देश के उन बेपरवाह नागरिकों की भी है जो ज़रूरी सावधानियों को नजरअंदाज कर रहे हैं.

एक सामान्य नियम से मैंने बात शुरू की थी, और अब एक सामान्य बात आखिर में.
अक्सर नाकामियों के लांछन से ख़ुद को बचाने के लिए सबसे ज़िम्मेदार आदमी, जिम्मेदारी का सारा बोझ ‘सबसे कम जिम्मेदार’ आदमी पर डाल कर निकल लेता है. ऐसा तो नहीं है कि कोरोना काल में भी ऐसा ही हो रहा हो?























भीलवाड़ा डीएम राजेन्द्र भट्ट
भीलवाड़ा एसपी हरेंद्र कुमार


















