
प्रेम… एक ऐसा शब्द, जिसे वक़्त ने अपनी हथेलियों पर सहेजा, और हर युग ने उसे नए रंगों में रंगा। कभी वह रूह की सरगम बना, तो कभी अधरों की मौन प्रार्थना।
तो आइए, लौटते हैं उन दौरों की ओर—एक यात्रा—संकोच से संवाद तक, इशारों से इमोजी तक। प्रेम के इन बदलते मौसमों में कुछ पुराने रंग तलाशें—एक-एक युग को खोलें, जैसे कोई पुराना एलबम।
स्वप्न युग: जब नींद ही सोशल मीडिया थी
इश्क़ के उस दौर की बात ही कुछ और थी, जब प्रेमलता जी की तरह मोहब्बत सादगी की ओढ़नी में लिपटी, लाज की चूनर ओढ़े आती थी। प्रेम एक मीठा संकोच था, जो नज़रों की चुप्पियों में धड़कता था, जहाँ कहने से ज़्यादा, महसूस करना अहमियत रखता था।
कौन पहले इज़हार करे—वो या मैं? ये सवाल दिल के गलियारे में यूँ भटकता रहता, जैसे सावन की बूँदें सूखी धरती से कहें — “तू बोले तो बरसूँ।” तब प्यार को हिचकियों की पुकार में सुना जाता था, जैसे दिल की डोर के दूसरे सिरे पर कोई याद का सुर बुन रहा हो। उधर उसे हिचकी आए तो समझो, इधर किसी ने नाम लेकर हवा से बात की है।

दीदार की प्यास हद से बढ़ जाती, तो चाँद को उसका चेहरा समझ कर देखा करते—जैसे आसमान का वो चाँद नहीं, उसकी मुस्कान की परछाई हो। और फिर एक गीत हवा में तैर जाता…“चौदहवीं का चाँद हो या आफ़ताब हो…
प्यार तब सपनों में होता था। रात के तीसरे पहर कोई हसीन चेहरा आता, दिल की घंटी बजती और बस… नींद टूटते ही इश्क़ evaporate! तकिये पर बस सलवटें बचती थीं, जो उस मुलाक़ात की खामोश गवाही देती थीं। कोई चैटबॉक्स नहीं, कोई टिक टिक नहीं—बस दिल की RAM और सपनों का लोकल सर्वर।
कबूतर काल: जब प्यार के पास पंख थे…
फिर दौर आया सुमन जी का…धीरे-धीरे इश्क़ पन्नों पर उतरने लगा। नीले पेन से लिखी हर पंक्ति जैसे दिल की नब्ज़ पर दर्ज होती थी—एक-एक अक्षर में सिहरन थी, हर विराम में इंतज़ार की तपिश।
उस ज़माने में दिल की डिलीवरी टेक्नोलॉजी से नहीं, भरोसे से होती थी। ‘कबूतर जी’ हमारे दिलों के पहले डिलीवरी बॉय बने। वो सूखी गुलाब की पंखुड़ियाँ, जिनके साथ पत्र भेजे जाते थे, कोई साधारण फूल नहीं थे—वो भावनाओं का एन्क्रिप्शन थीं, जिनकी सुगंध बस उसी के लिए होती थी, जिसके नाम की चिट्ठी होती थी और दिल की दीवारों पर फ़िल्मी गूँजें तैर जातीं—“कबूतर जा जा जा…” एक गीत, जो उस दौर के इश्क़ का एंथम बन गया था।

दोस्त-धोखा युग: जब इश्क़ का दुश्मन ‘अपना’ था
यह युग किरन जी का था—जहाँ इश्क़ की नाव अक्सर डूबती थी, मगर दरिया की लहरें नहीं, नाव में सुराख़ करने वाले ‘दोस्त ही उसे डुबोते थे। यह वो समय था जब “तेरा भाई संभाल लेगा” कहना दोस्ती का घोषणापत्र था। स्कूल-कॉलेज की पिछली बेंच शिक्षा का मंच नहीं, प्रेम-रणनीति का वॉर रूम हुआ करती थी। लव लेटर ऐसे बाँटे जाते थे जैसे नोट्स, और दोस्त ऐसे गिरते थे जैसे अल्पमत में आई सरकारें—अपनों की ही चालों से।
उस दौर के कीपैड वाले मोबाइल, रिश्तों की ऊर्जा के मीटर थे। बैलेंस खत्म होते ही, “I love you” अटक जाता था और “मैं नाराज़ हूँ” का समाधान, अगली validity तक टल जाता था। एक ओर महबूबा, दूसरी ओर “₹49 वाला टॉप-अप” और जब रात 12 बजे फ्री SMS शुरू होता, तो पूरे शहर के प्रेमियों का उत्साह देखते ही बनता था। कुछ तो इतने मैसेज करते कि मोबाइल भी थककर कह देता, “Inbox full!”
जैसे इश्क़ खुद कह रहा हो, “बस कर पगले, अब रुलाएगा क्या?”
पर असली कहानी में दोस्त ही खलनायक बन जाता था। धोखा वहीं से मिलता जहाँ भरोसे की सबसे ऊँची मीनार खड़ी होती थी। फिर केवल यही गाना बजता था–“दोस्त दोस्त न रहा, प्यार प्यार न रहा,
ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार न रहा।”

वैलेंटाइन युग: जहाँ प्यार पर भी टैक्स लगता है
ये दौर शिल्पी जी का है। अब इश्क़ वार्षिक कैलेंडर का एक फिक्स्ड इवेंट हो गया है। जैसे ही फरवरी शुरू होती है, बाज़ारों में गुलाबी बुख़ार चढ़ जाता है। “पहला नशा, पहला खुमार…” अब स्कूल की छत पर नहीं, Instagram रील के बैकग्राउंड म्यूज़िक में झूमता है। मोहब्बत की भाषा अब इमोजी में लिखी जाती है—दिल, आग, और चॉकलेट वाला इमोजी।
और हाँ, इश्क़ भी अब GST से बाहर नहीं रह गया है। अब Amazon और Flipkart के Valentine’s Sale से गुलाब, टेडी, चॉकलेट, गिफ्ट्स की खरीद ख़ूब हो रही है। GDP में इश्क़ का जितना योगदान है उतना शायद ही किसी और सरकारी योजना का हो।

ये वो युग है जहाँ टेडी बियर 999 का और ‘वक्त’ देने वाला कोई नहीं। जहाँ भावनाएँ Cloud में स्टोर होती हैं, और यादें—Google Photos में। अब प्यार, प्यार नहीं—Subscription Plan है। Trial चलता है, Auto-Renewal बंद रहता है।
वीडियो कॉल युग: जब दूरी नाम की चीज़ रह ही नहीं गई
ये दौर है मायरा जी का.. पहले इश्क़ खत में था, अब status में है। पहले “तुम्हें देखने की तलब है” लिखा जाता था, अब लिखा जाता है: “Typing…”
लड़कियाँ प्रोफाइल में लिखती हैं: “Looking for someone ambitious, emotionally mature, height 5’11+, annual package 30L+…”और लड़के लिखते हैं: “Gym rat, Crypto enthusiast, Dog lover, Swipe right for vibes.”-
मायरा जी के साथ ये दौर आरव जी का भी है जिनके इनबॉक्स में मायरा जी के अलावा “कविता HR”, “अनामिका Tuition”, और “Neha College” जैसे कई विभाग पहले से आवंटित थे। मायरा जी को लगा वो “Only One” हैं, जबकि आरव जी की मोबाइल स्क्रीन पर “Only This Week” वाली फिलॉसफी चल रही है। मायरा जी ने एक दिन पूछा, “तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो न?” और आरव जी ने कहीं से कॉपी किया गया डायलॉग बोल दिया–“बिलकुल जान, तुम तो मेरी फेवरेट नोटिफिकेशन हो।”

“आशिक बनाया आपने…” अब singular नहीं, plural अनुभव हो गया है। इश्क़ अब भी वहीं है…हाँ, वही धड़कनों के पीछे छुपा हुआ, कभी नयन झुका देता है, कभी रातें जगा देता है मगर अब वो इश्क़ हाथों में नहीं—हथेलियों में है, जहाँ उंगलियाँ स्क्रीन पर फिसलती हैं, और इमोशन्स—emojis में compress हो जाते हैं।
तो देवियों और सज्जनों! प्रेमलता जी शुरू हुआ इश्क़ मायरा जी पहुंचा ही था कि अब मुस्कान युग ने दस्तक दे दी है– जहाँ प्यार सिर्फ दिल तो नहीं, दिमाग और ड्रामा भी मांगने लगा है.
मुस्कान—नाम ऐसा कि सुनते ही चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ जानी चाहिए, लेकिन अब उस नाम से पहले ही माथे पर शिकन, दिल में खौफ़ और दिमाग में “क्राइम पेट्रोल” की वो थीम म्यूज़िक बजने लगती है। पति को पहले जीवनसाथी बनाया, फिर ‘पूर्व’ जीवनसाथी बना दिया—यानी पास्ट टेन्स! और वर्तमान प्रेमी के साथ मिलकर पति को ड्रम में पैक कर दिया गया—literally! शायद दिल से एक ही आवाज़ आई होगी: “जब दिल में नहीं समा रहा था… तो ड्रम में डाल दिया।”

अब यह ड्रम केवल ड्रम नहीं रहा। ये घरेलू हत्या का प्रतीक बन गया है। घर-घर में ड्रम को देख पत्नी की आँखों में ‘साइलेंट थ्रेट’ झलकती है, और पति बिना कारण ही कपड़े धोने, बर्तन साफ करने, यहाँ तक कि सब्ज़ी काटने में भी संजीदगी दिखाने लगा है। नीले ड्रम की बिक्री में गिरावट आई है। प्लास्टिक विक्रेता संघ का कहना है कि अब ग्राहक ड्रम के साथ पुलिस वेरिफिकेशन की डिमांड करने लगे हैं। कुछ दुकानदारों ने तो ‘ड्रम खरीदने हेतु आधार कार्ड अनिवार्य’ का बोर्ड भी टांग दिया है। ड्रम खरीदने वाला हर ग्राहक अब शक़ की नज़रों से देखा जाता है।
जहाँ पहले प्यार के हर मोड़ पर साज़ थे, अब वहाँ terms & conditions हैं। हर वादा अब scroll करके ‘Agree’ किया जाता है, हर एहसास—thumbs up से validate होता है। प्यार बदला नहीं है, बस उसका इंटरफेस बदल गया है। कभी कबूतर था, अब क्लाउड है। कभी गुलाब की पंखुड़ियाँ होती थीं, अब इंस्टा स्टोरीज़ हैं। कभी हिचकी थी संकेत, अब typing… लिखा दिखता है और फिर गायब हो जाता है। कभी खत जलाए जाते थे, अब chats delete होती हैं—permanently remove for both।

ज़माना बदला, ज़रिया बदला, पर मोहब्बत की तासीर नहीं बदली। कभी “तुझमें रब दिखता है” सुनते थे, अब Spotify playlist में “Tu hai to I’ll be alright” बजता है।
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