आज हम अपनी आज़ादी की सालगिरह मना रहे हैं। शुभकामनाएं उन सभी को जिन्होंने इस आज़ादी के लिए अपना खून-पसीना बहाया और बधाई उन महानुभावों को भी जो तब भी धार्मिक लड़ाई में फंसे थे और 78 साल बाद भी वहीं अटके हैं। सोचा इस मौके पर ‘विकास’ की बात कर ली जाए वो जादुई शब्द जो नेताओं के दिल के सबसे करीब होता है। सत्ता में हों तो विकास उनकी जेब में होता है और विपक्ष में हों तो उन्हें लगता है कि विकास देश छोड़कर भाग गया है। आम आदमी विकास ढूंढ रहा है। कुछ नेता दावा कर रहे हैं कि उनके शासन में विकास दौड़ रहा है तो कुछ दावे की हवा निकालने में लगे हैं।
चलिए गंभीरता से बात करते हैं। 1947 में जब आज़ादी मिली तो देश के पास बस आज़ादी थी पर संसाधन नहीं थे। उम्मीदें थीं, हौसला था और एक सपना था– एक मजबूत, आधुनिक, आत्मनिर्भर भारत का। तब मोबाइल या इंटरनेट की उम्मीद करना वैसा ही था जैसे कुएँ से WiFi माँगना।
विकास एक सतत (continuous) प्रक्रिया है जो पीढ़ियों में पनपता है। कल को उड़ने वाली बसें और रोबोटिक क्रांति भी आ जाएगी तो इसका मतलब है नहीं कि ये सब 1980 में क्यों नहीं हुआ? जो काम आज हो पा रहे हैं वो 1947 में संभव नहीं थे। हम समय के साथ बढ़ते हैं, सीखते हैं। मानव सभ्यताओं में इसे ही revolution नाम दिया गया है। सोचिए आज AI का जमाना है अब कोई ये कहे कि ये नेहरू ने क्यों नहीं किया तो उसे क्या ही कहा जायेगा।
सब बातों के इतर याद रखिये हमने 78 सालों के इस सफर में बहुत कुछ हासिल किया—
- संविधान मिला, जिसने हमें लोकतंत्र और समानता का आधार दिया। नियम, कानून बने और राजा की जगह हमने अपने प्रतिनिधि ख़ुद से चुनना शुरु किया।
- IIT, IIM, AIIMS जैसे संस्थान बने जो आज भी भारत की प्रतिभा की पहचान हैं।
- ISRO ने चांद, मंगल, सूर्य तक अपना झंडा गाड़ा वो भी कम बजट में जबकि दुनिया अरबों डॉलर खर्च करती रही।
- DRDO ने मिसाइल से लेकर रक्षा तकनीक तक आत्मनिर्भरता दी।
- नवोदय विद्यालय बने, जिससे गांव-कस्बे के बच्चों को भी अच्छी शिक्षा का मौका मिला।
- बड़े-बड़े डैम, पावर प्रोजेक्ट, पुल, सड़कें बनीं जिनको नेहरू ने ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा।
- पाकिस्तान की तरह किसी एक धर्म की सोच पर नहीं बल्कि सबको साथ लेकर बढ़ने का रास्ता चुना।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन में अगुवाई की, दुनिया में इज्ज़त कमाई…तब विदेश में शो और इवेंट करवाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
- 1965, 1971 और 1999 में देश की सेना ने दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया।
- अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की और 1974 में हम परमाणु सम्पन्न हुए।
- हरित क्रांति ने अनाज में आत्मनिर्भर बनाया, श्वेत क्रांति ने दूध में दुनिया में नंबर-1 कर दिया। सूचना क्रांति ने भारत को IT हब बनाया।
- 1991 के आर्थिक सुधारों ने विदेशी निवेश, रोजगार और व्यापार के नए दरवाजे खोले।
- मनमोहन सिंह के कार्यकाल (2004–2014) में GDP 700 अरब डॉलर से बढ़कर 2 ट्रिलियन डॉलर हो गई लगभग 185% वृद्धि, वह भी वैश्विक मंदी के बावजूद। मोदी सरकार के 10 साल (2014–2024) में GDP 2 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 3.7 ट्रिलियन डॉलर हुई–85% वृद्धि।

अब आज की स्तिथियों पर भी बात हो जाए—
➼ बेरोजगारी का नया कीर्तिमान
SSC, रेलवे, बैंक, आर्मी… सरकारी नौकरियों की भर्तियाँ ठप के बराबर हैं। गांव-कस्बे का युवा जो इनकी तैयारी करता था उसके पास अब लिमिटेड ऑप्शन हैं। ‘अग्निवीर योजना’ ने सेना में जाने का गर्व भी छीन लिया। और बाकी के लिए प्रधानमंत्री का जवाब ‘पकौड़े तलना भी रोजगार’ है।
➼ चुप्पी का स्वर्णिम नियम
मणिपुर जलता रहा, प्रधानमंत्री चुप रहे। चीन सीमा पर अतिक्रमण करता रहा लेकिन उनका नाम लेने से भी डर लगता है। लेकिन मुसलमान वाला एंगल मिलते ही मंच से आवाज़ गूंजती है और भीड़ तालियां बजाती है।
➼ वॉशिंग मशीन का कमाल
जो नेता कल तक “सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी” कहलाते थे, भाजपा में आते ही दूध से धुले हो जाते हैं। जनता ने इस तकनीक को ‘वॉशिंग मशीन’ का नाम दिया है।
➼ महंगाई का U-टर्न
2014 से पहले नारे थे- “बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार”। अब कहा जाता है- “बचत कीजिए।” मनमोहन सिंह महंगाई का ‘म’ नहीं बोलते थे और अब नरेंद्र जी ‘मणिपुर’ नहीं बोलते।
➼ पहले विरोध, अब गर्व
मनरेगा, आधार, GST, DBT ये सब 2014 से पहले की योजनाएं हैं। तब पश्चिम के एक राज्य के मुख्यमंत्री इनका विरोध करते थे, अब इन्हीं को अपनी उपलब्धि बताते हैं।
➼ जांच एजेंसियां: अब पालतू हथियार
CBI, ED, IT पहले ‘पिंजरे में तोते’ कहे जाते थे, अब विरोधियों को डराने का हथियार हैं। कांग्रेस हो, TMC हो या AAP जैसे ही केस बनता है अगर नेता भाजपा में आ जाए तो केस धुल जाता है।
➼चुनावी भाषण: झूठ और नफरत का कॉम्बो पैक
मंगलसूत्र छीन लेंगे, घर छीन लेंगे, गाड़ी छीन लेंगे ..ये बातें प्रधानमंत्री के भाषणों में सुनने को मिल रही हैं।
इस सब के लिए बीजेपी ने टाइगर राजा सिंह, साक्षी महाराज, गिरिराज जैसों को रखा है। कम से कम प्रधानमंत्री को पद की मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए। सोचिए….जो आदमी पुलवामा में शहीद हुए जवानों के नाम पर वोट मांग ले वो कितना निर्ज्जल हो सकता है (ये बात किसी भक्त को बताता हूँ तो वो पहले विश्वास नहीं करता लेकिन जब मैं उसे वीडियो भेज देता हूँ तो हकलाने लगता है, “मेले मोई जी ऐता नहीं बोल तकते”)
और हाँ… जो लोग व्हाट्सएप पर 70 साल का राग।अलापते-गुनगुनाते नहीं थकते, उनके लिए एक छोटी सी गणित क्लास भी हो जाए।।1947 में जब देश की अंतरिम सरकार बनी तो प्रधानमंत्री नेहरू थे पर उसमें कई गैर-कांग्रेसी मंत्री भी थे। बाकियों को छोड़ भी दें तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिंदू महासभा से थे।।फिर 1952 में पहले आम चुनाव हुए और कांग्रेस 1977 तक सत्ता में रही। 1977 में इंदिरा गांधी हारीं तो जनता पार्टी आई। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और सरकार में जनसंघ का समर्थन जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी मंत्री भी थे। फिर बीजेपी बनने के बाद अटल जी लगभग 6 साल प्रधानमंत्री रहे। अब 2014 से मोदी जी 11 साल से कुर्सी पर हैं। 78 साल की आज़ादी में ज़रा जोड़-घटाव कर लीजिए। कौन कितना राज कर चुका और ‘70 साल’ का जो तीर आप रोज़ छोड़ते हैं वो आखिर किसके कलेजे में लगता है, ये भी सोच लीजिए। इतिहास में “कांग्रेस का 70 साल” जितना हिस्सा है, उतना ही बीजेपी और उसके राजनीतिक पुरखों का भी नाम लिखा है। बाकी, गणित में फेल हैं तो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के एडमिशन फॉर्म भरे पड़े हैं।
ख़ैर… नफ़रत की अफ़ीम इस तरह चटा दी गयी है कि पढे़ लिखे लोग भी तर्क वितर्क पर बात नहीं करते। प्रधानमंत्री आते हैं और एक नया शिगूफा़ छोड़ते हैं और लोग आंख बंदकर उनपर विश्वास करते हैं। व्हाट्सएप पर हिन्दू अस्मिता, सनातन का गर्व दिखाकर ब्रेनवाश किया गया है। टीवी और व्हाट्सऐप अब नया संविधान हैं। किस पर हँसना है, किससे डरना है, किसे गाली देनी है…सब वहीं से तय होता है। हिंदू अस्मिता और सनातन गर्व के नाम पर दिमाग का वॉश हो चुका है। गली-मोहल्ले, पान की दुकान, फेसबुक-व्हाट्सऐप बहस के मुद्दे…. अब नेता नहीं, Algorithm तय करते हैं। हम चाहते तो गाजर खाना हैं लेकिन हमारे सामने जानबूझकर रोज कद्दू ही परोसा जा रहा है और हम मजे से रोज वही खा रहे हैं। किसी गाय-भैंस, भेड़ों की तरह हमें कोई शोर मचाकर हाँक रहा है और हम हंके चले जा रहे हैं।
हालात ऐसे हैं कि अगर भगवान राम भी आकर नरेंद्र जी की आलोचना कर दें और कहें-“मैं इन्हें नहीं, सबको लाया हूँ” तो लोग राम जी को भी देशद्रोही, पाकिस्तानी और एंटी-हिंदू कह देंगे।
निचोड़ यही है कि विकास किसी एक नेता या एक पार्टी की जागीर नहीं। ये पीढ़ियों की मेहनत का नतीजा है। लेकिन अगर हम हर उपलब्धि का श्रेय सिर्फ अपने पसंदीदा नेता को देंगे, हर असफलता का दोष दूसरों पर डालेंगे और तर्क के बजाय नफरत पर तालियां बजाते रहेंगे तो हम विकास नहीं, सिर्फ विभाजन को आगे बढ़ाएंगे।
देश तभी बदलेगा जब भक्त विचार करना शुरू करेंगे, Forward करना नहीं।
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