मैं कोई सेलिब्रिटी नहीं हूं. पेशे से इंजीनियर हूं. सैलरी ठीक-ठाक है. इतनी कि घर, गाड़ी, बिजली-पानी और अच्छा फोन चल सके. जिंदगी की चेकलिस्ट लगभग पूरी है. लेकिन…मनुष्य का अस्तित्व अकेले नहीं खिलता. उसे भीड़ चाहिए. कंधों की गर्माहट चाहिए. आँखों की नमी चाहिए. होंठों की मुस्कान चाहिए.
आज हमारी जेब में एक ऐसा डिवाइस है जो हमें पूरी दुनिया से जोड़ता है फिर भी हमारे आस-पास कोई नहीं होता जिससे हम मन खोलकर कह सकें–“आज मन उदास है… ”
Facebook के हज़ारों दोस्त, Instagram के हज़ारों फॉलोअर्स, WhatsApp के दर्जनों ग्रुप; हर तरफ कनेक्शन का भ्रम है. मैं कुछ लिखूँ तो लोग लाइक करते हैं, कमेंट करते हैं, कभी तारीफ़, कभी बहस, कभी मज़ाक भी करते हैं. जन्मदिन पर बधाइयों की बाढ़ आ जाती है. खुशी पर Congrats, दुख पर Stay Strong या Take Care.
वर्चुअल दुनिया पूरी सजधज के साथ यह यकीन दिलाती है कि मैं अकेला नहीं हूं लेकिन असली दिक्कत तब शुरू होती है जब स्क्रीन बंद होती है. जहाँ दोस्त के कंधे पर सिर रखकर मन हल्का होना चाहिए, वहाँ तकिया भीगा पड़ा है. जहाँ कोई सामने बैठकर कहे-“चल यार, चाय पीते हैं”…वहाँ सिर्फ़ मोबाइल स्क्रीन जलती है.
मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य ‘टच’ से जुड़ता है, ‘टेक्स्ट’ से नहीं. Emoji से नहीं आँखों से जुड़ता है. Comment से नहीं आवाज़ से जुड़ता है. Screen से नहीं साँसों से जुड़ता है. Digital interaction मस्तिष्क में उतना oxytocin नहीं छोड़ता जितना आमने-सामने की मुलाकात, हँसी, स्पर्श या आँखों का मिलना छोड़ता है. यही वजह है कि ऑनलाइन जुड़े होने के बावजूद हम भीतर से खाली महसूस करते हैं. हमने वर्चुअल रिश्तों को रियल का विकल्प मान लिया है. लेकिन सच यह है कि जब स्क्रीन बंद होती है तो सामने तन्हाई का खाली कमरा होता है.
हमारी प्राथमिकताएं बदल गई हैं. रिश्ते अब “टाइम मिलने पर” निभाए जाते हैं, जबकि असली दोस्ती तो वक्त निकालकर निभाई जाती थी. जब तक कोई आपके साथ चुपचाप बैठकर आपकी चाय में चीनी नहीं घोलता, तब तक दोस्ती पूरी नहीं होती. मन को अब भी दोस्त चाहिए. वो दोस्त जो बिना पूछे सब समझ जाए. जो आँसू भी देख ले और हंसी भी चुरा ले. जिसके साथ चुप्पी भी पूरी बातचीत बन जाए. Birthday से लेकर ब्रेकअप तक..हर मोड़ पर कोई चाहिए जो ‘पास’ हो.
मन उम्मीद रखता है कि शायद कल कोई पुराना दोस्त दरवाज़ा खटखटा दे. शायद किसी चौपाल पर कोई भूला हुआ यार मिल जाए. शायद बरसात में कोई साथ चाय पीने आ जाए. शायद मोबाइल से बाहर, असली दुनिया लौट आए.
क्योंकि दोस्ती जब तक ‘रियल’ न हो; सुख अधूरा है और दुःख बेहिसाब. परिवार चाहे कितना भी प्यारा हो, दोस्त का विकल्प नहीं हो सकता. और शायद दोस्त मिलें या न मिलें… उनकी तलाश ज़रूरी है. क्योंकि यही तलाश हमें इंसान बनाए रखती है..
आज हम अपनी आज़ादी की सालगिरह मना रहे हैं। शुभकामनाएं उन सभी को जिन्होंने इस आज़ादी के लिए अपना खून-पसीना बहाया और बधाई उन महानुभावों को भी जो तब भी धार्मिक लड़ाई में फंसे थे और 78 साल बाद भी वहीं अटके हैं। सोचा इस मौके पर ‘विकास’ की बात कर ली जाए वो जादुई शब्द जो नेताओं के दिल के सबसे करीब होता है। सत्ता में हों तो विकास उनकी जेब में होता है और विपक्ष में हों तो उन्हें लगता है कि विकास देश छोड़कर भाग गया है। आम आदमी विकास ढूंढ रहा है। कुछ नेता दावा कर रहे हैं कि उनके शासन में विकास दौड़ रहा है तो कुछ दावे की हवा निकालने में लगे हैं।
चलिए गंभीरता से बात करते हैं। 1947 में जब आज़ादी मिली तो देश के पास बस आज़ादी थी पर संसाधन नहीं थे। उम्मीदें थीं, हौसला था और एक सपना था– एक मजबूत, आधुनिक, आत्मनिर्भर भारत का। तब मोबाइल या इंटरनेट की उम्मीद करना वैसा ही था जैसे कुएँ से WiFi माँगना।
विकास एक सतत (continuous) प्रक्रिया है जो पीढ़ियों में पनपता है। कल को उड़ने वाली बसें और रोबोटिक क्रांति भी आ जाएगी तो इसका मतलब है नहीं कि ये सब 1980 में क्यों नहीं हुआ? जो काम आज हो पा रहे हैं वो 1947 में संभव नहीं थे। हम समय के साथ बढ़ते हैं, सीखते हैं। मानव सभ्यताओं में इसे ही revolution नाम दिया गया है। सोचिए आज AI का जमाना है अब कोई ये कहे कि ये नेहरू ने क्यों नहीं किया तो उसे क्या ही कहा जायेगा।
सब बातों के इतर याद रखिये हमने 78 सालों के इस सफर में बहुत कुछ हासिल किया—
संविधान मिला, जिसने हमें लोकतंत्र और समानता का आधार दिया। नियम, कानून बने और राजा की जगह हमने अपने प्रतिनिधि ख़ुद से चुनना शुरु किया।
IIT, IIM, AIIMS जैसे संस्थान बने जो आज भी भारत की प्रतिभा की पहचान हैं।
ISRO ने चांद, मंगल, सूर्य तक अपना झंडा गाड़ा वो भी कम बजट में जबकि दुनिया अरबों डॉलर खर्च करती रही।
DRDO ने मिसाइल से लेकर रक्षा तकनीक तक आत्मनिर्भरता दी।
नवोदय विद्यालय बने, जिससे गांव-कस्बे के बच्चों को भी अच्छी शिक्षा का मौका मिला।
बड़े-बड़े डैम, पावर प्रोजेक्ट, पुल, सड़कें बनीं जिनको नेहरू ने ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा।
पाकिस्तान की तरह किसी एक धर्म की सोच पर नहीं बल्कि सबको साथ लेकर बढ़ने का रास्ता चुना।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में अगुवाई की, दुनिया में इज्ज़त कमाई…तब विदेश में शो और इवेंट करवाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
1965, 1971 और 1999 में देश की सेना ने दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया।
अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की और 1974 में हम परमाणु सम्पन्न हुए।
हरित क्रांति ने अनाज में आत्मनिर्भर बनाया, श्वेत क्रांति ने दूध में दुनिया में नंबर-1 कर दिया। सूचना क्रांति ने भारत को IT हब बनाया।
1991 के आर्थिक सुधारों ने विदेशी निवेश, रोजगार और व्यापार के नए दरवाजे खोले।
मनमोहन सिंह के कार्यकाल (2004–2014) में GDP 700 अरब डॉलर से बढ़कर 2 ट्रिलियन डॉलर हो गई लगभग 185% वृद्धि, वह भी वैश्विक मंदी के बावजूद। मोदी सरकार के 10 साल (2014–2024) में GDP 2 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 3.7 ट्रिलियन डॉलर हुई–85% वृद्धि।
अब आज की स्तिथियों पर भी बात हो जाए—
➼ बेरोजगारी का नया कीर्तिमान SSC, रेलवे, बैंक, आर्मी… सरकारी नौकरियों की भर्तियाँ ठप के बराबर हैं। गांव-कस्बे का युवा जो इनकी तैयारी करता था उसके पास अब लिमिटेड ऑप्शन हैं। ‘अग्निवीर योजना’ ने सेना में जाने का गर्व भी छीन लिया। और बाकी के लिए प्रधानमंत्री का जवाब ‘पकौड़े तलना भी रोजगार’ है।
➼ चुप्पी का स्वर्णिम नियम मणिपुर जलता रहा, प्रधानमंत्री चुप रहे। चीन सीमा पर अतिक्रमण करता रहा लेकिन उनका नाम लेने से भी डर लगता है। लेकिन मुसलमान वाला एंगल मिलते ही मंच से आवाज़ गूंजती है और भीड़ तालियां बजाती है।
➼ वॉशिंग मशीन का कमाल जो नेता कल तक “सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी” कहलाते थे, भाजपा में आते ही दूध से धुले हो जाते हैं। जनता ने इस तकनीक को ‘वॉशिंग मशीन’ का नाम दिया है।
➼ महंगाई का U-टर्न 2014 से पहले नारे थे- “बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार”। अब कहा जाता है- “बचत कीजिए।” मनमोहन सिंह महंगाई का ‘म’ नहीं बोलते थे और अब नरेंद्र जी ‘मणिपुर’ नहीं बोलते।
➼ पहले विरोध, अब गर्व मनरेगा, आधार, GST, DBT ये सब 2014 से पहले की योजनाएं हैं। तब पश्चिम के एक राज्य के मुख्यमंत्री इनका विरोध करते थे, अब इन्हीं को अपनी उपलब्धि बताते हैं।
➼ जांच एजेंसियां: अब पालतू हथियार CBI, ED, IT पहले ‘पिंजरे में तोते’ कहे जाते थे, अब विरोधियों को डराने का हथियार हैं। कांग्रेस हो, TMC हो या AAP जैसे ही केस बनता है अगर नेता भाजपा में आ जाए तो केस धुल जाता है।
➼चुनावी भाषण: झूठ और नफरत का कॉम्बो पैक मंगलसूत्र छीन लेंगे, घर छीन लेंगे, गाड़ी छीन लेंगे ..ये बातें प्रधानमंत्री के भाषणों में सुनने को मिल रही हैं। इस सब के लिए बीजेपी ने टाइगर राजा सिंह, साक्षी महाराज, गिरिराज जैसों को रखा है। कम से कम प्रधानमंत्री को पद की मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए। सोचिए….जो आदमी पुलवामा में शहीद हुए जवानों के नाम पर वोट मांग ले वो कितना निर्ज्जल हो सकता है (ये बात किसी भक्त को बताता हूँ तो वो पहले विश्वास नहीं करता लेकिन जब मैं उसे वीडियो भेज देता हूँ तो हकलाने लगता है, “मेले मोई जी ऐता नहीं बोल तकते”)
और हाँ… जो लोग व्हाट्सएप पर 70 साल का राग।अलापते-गुनगुनाते नहीं थकते, उनके लिए एक छोटी सी गणित क्लास भी हो जाए।।1947 में जब देश की अंतरिम सरकार बनी तो प्रधानमंत्री नेहरू थे पर उसमें कई गैर-कांग्रेसी मंत्री भी थे। बाकियों को छोड़ भी दें तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिंदू महासभा से थे।।फिर 1952 में पहले आम चुनाव हुए और कांग्रेस 1977 तक सत्ता में रही। 1977 में इंदिरा गांधी हारीं तो जनता पार्टी आई। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और सरकार में जनसंघ का समर्थन जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी मंत्री भी थे। फिर बीजेपी बनने के बाद अटल जी लगभग 6 साल प्रधानमंत्री रहे। अब 2014 से मोदी जी 11 साल से कुर्सी पर हैं। 78 साल की आज़ादी में ज़रा जोड़-घटाव कर लीजिए। कौन कितना राज कर चुका और ‘70 साल’ का जो तीर आप रोज़ छोड़ते हैं वो आखिर किसके कलेजे में लगता है, ये भी सोच लीजिए। इतिहास में “कांग्रेस का 70 साल” जितना हिस्सा है, उतना ही बीजेपी और उसके राजनीतिक पुरखों का भी नाम लिखा है। बाकी, गणित में फेल हैं तो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के एडमिशन फॉर्म भरे पड़े हैं।
ख़ैर… नफ़रत की अफ़ीम इस तरह चटा दी गयी है कि पढे़ लिखे लोग भी तर्क वितर्क पर बात नहीं करते।प्रधानमंत्री आते हैं और एक नया शिगूफा़ छोड़ते हैं और लोग आंख बंदकर उनपर विश्वास करते हैं। व्हाट्सएप पर हिन्दू अस्मिता, सनातन का गर्व दिखाकर ब्रेनवाश किया गया है। टीवी और व्हाट्सऐप अब नया संविधान हैं। किस पर हँसना है, किससे डरना है, किसे गाली देनी है…सब वहीं से तय होता है। हिंदू अस्मिता और सनातन गर्व के नाम पर दिमाग का वॉश हो चुका है। गली-मोहल्ले, पान की दुकान, फेसबुक-व्हाट्सऐप बहस के मुद्दे…. अब नेता नहीं, Algorithm तय करते हैं। हम चाहते तो गाजर खाना हैं लेकिन हमारे सामने जानबूझकर रोज कद्दू ही परोसा जा रहा है और हम मजे से रोज वही खा रहे हैं। किसी गाय-भैंस, भेड़ों की तरह हमें कोई शोर मचाकर हाँक रहा है और हम हंके चले जा रहे हैं।
हालात ऐसे हैं कि अगर भगवान राम भी आकर नरेंद्र जी की आलोचना कर दें और कहें-“मैं इन्हें नहीं, सबको लाया हूँ” तो लोग राम जी को भी देशद्रोही, पाकिस्तानी और एंटी-हिंदू कह देंगे।
निचोड़ यही है कि विकास किसी एक नेता या एक पार्टी की जागीर नहीं। ये पीढ़ियों की मेहनत का नतीजा है। लेकिन अगर हम हर उपलब्धि का श्रेय सिर्फ अपने पसंदीदा नेता को देंगे, हर असफलता का दोष दूसरों पर डालेंगे और तर्क के बजाय नफरत पर तालियां बजाते रहेंगे तो हम विकास नहीं, सिर्फ विभाजन को आगे बढ़ाएंगे।
देश तभी बदलेगा जब भक्त विचार करना शुरू करेंगे, Forward करना नहीं।
शीरीन की माँ आज स्कूल की पीटीएम में आई थी। हल्के बादामी रंग का सूट पहने, सिर पर हल्की चुन्नी डाले, वह चुपचाप अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। उसका चेहरा उतरा हुआ था, आँखों में थकान थी, लेकिन सबसे ज़्यादा चिंता की लकीरें थीं—अपनी बच्ची शीरीन के लिए।
शीरीन दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। वह पढ़ाई में अच्छी थी, हमेशा टीचर की तारीफ पाती थी। लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसका चेहरा मुरझा गया था। वह पहले जैसी चहकती नहीं थी, दोस्तों से कम बात करती थी, और स्कूल से लौटते ही अक्सर कमरे में चुपचाप बैठ जाती थी। जब उसकी माँ ने पूछा तो बस इतना कहती, “कुछ नहीं अम्मी, सब ठीक है।”
लेकिन सब ठीक नहीं था।
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टीचर के सामने बैठते ही शीरीन की माँ ने धीमे स्वर में कहा,”मैडम, शीरीन को क्लास के कुछ बच्चे परेशान कर रहे हैं। उसे चिढ़ाते हैं… उसके धर्म को लेकर ताने मारते हैं। वह बहुत हिम्मती है, लेकिन अब सहन नहीं कर पा रही। मैं बस इतना चाहती हूँ कि आप उन बच्चों से कह दें—”शीरीन के पापा आर्मी में हैं। वह देश की रक्षा करते हैं। शायद तब वे उसे परेशान करना बंद कर दें।”
टीचर कुछ कहने ही वाली थीं कि अचानक क्लासरूम की दीवारों पर हल्की-हल्की दरारें उभरने लगीं। दरारों से काले धुएँ की लहरें उठने लगीं, जो धीरे-धीरे आकार लेने लगीं। इन आकृतियों के चेहरे विकृत थे—कुछ के माथे पर जाति की मोहर थी, कुछ की आँखों में धर्म की आग जल रही थी, और कुछ के होंठों पर रंग-रूप की भद्दी हँसी थी। वे फुसफुसा रहे थे—“बाँटो… जलाओ… तोड़ो…”उनके स्वर जहरीले थे, उनकी परछाइयाँ पूरी कक्षा में फैल रही थीं।
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शीरीन ने घबराकर अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया।मैडम अवाक् रह गईं। उन्होंने शीरीन की ओर देखा, जो बगल में खड़ी अपनी उंगलियों से दुपट्टे का कोना मरोड़ रही थी।
बचपन पर जहरीली विरासत
तीसरी कक्षा के बच्चों को धर्म का क्या पता? लेकिन उनके घरों में जो सुना, जो देखा, वही स्कूल की चारदीवारी के अंदर भी लाकर रख दिया। उनके मन में जहर किसने भरा? वे किसकी बातें दोहरा रहे थे? क्या उनके माता-पिता ने ही जाने-अनजाने उन्हें यह सिखाया था?
जिस उम्र में बच्चों के मन में वैज्ञानिक सोच विकसित होनी चाहिए, तर्क और जिज्ञासा के बीज बोए जाने चाहिए, उस उम्र में उनके दिलों में नफरत का जहर घोल दिया गया था।
यह सिर्फ शीरीन की समस्या नहीं थी। यह पूरे समाज का संकट था।नफरत अब सिर्फ बड़ों तक सीमित नहीं रही। अबोध बच्चों तक यह लपटें पहुँच चुकी थीं। यह एक खतरनाक संकेत था, एक भयावह भविष्य की चेतावनी।
टीचर ने शीरीन की माँ को दिलासा दिया, लेकिन उनके मन में भी एक सवाल उठ रहा था—क्या इतना कहना काफी होगा?क्या इस आग को रोका जा सकता है?या फिर यह आग और भड़केगी, और हमारे समाज को—हमारी आने वाली पीढ़ियों को—जलाकर राख कर देगी?
विचारधारा की आग और मासूमियत की राख
लेकिन यह आग यूँ ही नहीं भड़की, इसे सुलगाने वाले वही लोग हैं जो अपने बच्चों के कानों में जहर घोल रहे हैं। वे अपने पूर्वाग्रहों को संस्कार बताकर परोस रहे हैं, अपनी कुंठाओं को बच्चों के मासूम दिलों में भर रहे हैं।
बच्चे खाली स्लेट की तरह होते हैं, लेकिन हम ही हैं जो उन पर घृणा की इबारत लिख रहे हैं। क्या हम सच में यह चाहेंगे कि हमारे बच्चे सिर्फ धर्म, जाति और ऊँच-नीच का भेदभाव सीखें?
इन्हें पहचानना होगा। इन्हें रोकना होगा। वरना कल यही बच्चे बड़े होकर इस आग को और फैलाएंगे, और तब सिर्फ शीरीन नहीं, हमारा पूरा समाज जलकर राख हो जाएगा।
आखिर, यह कैसी विरासत हम अपने बच्चों को सौंप रहे हैं?
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के 18 साल पुराने भाषण की एक बार फिर से ख़ूब चर्चा हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र से लेकर पूरा ‘मोदी परिवार’ फिर से झूठ को बेच रहा है। दावा किया जा रहा कि इस भाषण में मनमोहन सिंह ने भारत के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला अधिकार है बतलाया था। नरेंद्र जी आदतन झूठ बोलते हैं इसलिए उनको छोड़ते हैं और एक आम आदमी के लिए इस दावे में कितना सच है कितना झूठ इसकी पड़ताल करते हैं.
9 दिसंबर 2006 को राष्ट्रीय विकास परिषद (National development council) की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संबोधन दिया। इस बैठक में कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल हुए। प्रधानमंत्री ने अंग्रेजी में भाषण दिया। जिस एक अंश यह था:-
“I believe our collective priorities are clear. Agriculture, irrigation and water resources, health, education, critical investment in rural infrastructure, and the essential public investment needs of general infrastructure, along with programmes for the upliftment of SC/STs, other backward classes, minorities and women and children. The component plans for Scheduled Castes and Scheduled Tribes will need to be revitalised. We will have to devise innovative plans to ensure that minorities, particularly the Muslim minority, are empowered to share equitably in the fruits of development. They must have the first claim on resources. The Centre has a myriad other responsibilities whose demands will have to be fitted within the over-all resource availability. The Planning Commission will of course undertake a thorough review of ongoing programmes to eliminate those which have outlived their original rationale, but we cannot escape from the fact that the Centre’s resources will be stretched in the immediate future and an increasing share of the responsibility will have to be shouldered by the states.”
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण का वीडियो
अंग्रेजी में दिए गए भाषण का हिंदी में अनुवाद करें तो कुछ इस तरह का होगा–
“मेरा मानना है कि हमारी सामूहिक प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं. कृषि, सिंचाई और जल संसाधन, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण निवेश और सामान्य बुनियादी ढांचे के लिए जरूरी सार्वजनिक निवेश. इसके साथ-साथ एससी/एसटी, अन्य पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं और बच्चों के उत्थान के लिए कार्यक्रम. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए घटक योजनाओं को पुनर्जीवित करने की जरूरत होगी.”हमें यह सुनिश्चित करने के लिए नई योजनाएं बनानी होंगी कि अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यकों को विकास के लाभों में समान रूप से अधिकार मिले. संसाधनों पर पहला हक उनका होना चाहिए. केंद्र के पास अनगिनत अन्य जिम्मेदारियां हैं. योजना आयोग उन कार्यक्रमों को खत्म करने के लिए गहन समीक्षा करेगा, जो अपने मूल काम को पूरा कर चुके हैं, लेकिन हम इस फैक्ट से भी नहीं बच सकते हैं कि आने वाले भविष्य में केंद्र के संसाधनों पर दबाव होगा और बढ़ी हुई जिम्मेदारी राज्यों को भी उठानी पड़ेगी.”
सारा विवाद केवल इस लाइन की वजह से है- ‘They must have the first claim on resources (संसाधनों पर पहला हक उनका होना चाहिए)। विरोधियों का कहना है प्रधानमंत्री का ‘उनका’ से मतलब केवल मुसलमानों से है लेकिन एक समझदार आदमी जब पूरा भाषण सुनेगा तो समझ सकता है कि यहाँ ‘उनका’ के जरिए सिर्फ मुस्लिमों या अल्पसंख्यकों की बात नहीं हो रही है, बल्कि इसमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं और बच्चों की बात की जा रही है।
ऐसा नहीं है कि डॉ मनमोहन सिंह के भाषण का गलत मतलब केवल विरोधियों ने निकाला। भाषण वाले दिन कई मीडिया संस्थानों ने उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया था। पूरे कंफ्यूज़न की एक बड़ी वजह इसलिए भी थी क्योंकि मनमोहन सिंह के भाषण में ‘उनका’ से ठीक पहले ‘खासतौर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों’ की बात की गयी थी।
एक बात तो तय है कि भाषण का ड्राफ़्ट ठीक तरह से नहीं किया गया जिसकी वजह से कंफ्यूज़न हुआ लेकिन बावजूद इसके जब भाषण को पूरा सुना जाता है तो पता चलता है कि पूर्व पीएम मनमोहन सिंह सिर्फ मुस्लिम समुदाय की बात नहीं कर रहे थे, बल्कि वह एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं और बच्चों की बात कर रहे थे।
एक और ज़रूरी और सोचने की बात यह है कि अगर मनमोहन सिंह देश के संसाधनों पर पहला हक़ केवल मुसलमानों का मानते थे और उसे बोलने में उन्हें कोई गुरेज़ नहीं था तो आगे भी वो अपने बयान पर क़ायम रहते लेकिन भाषण की ठीक अगले दिन 10 दिसंबर 2006 को प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने एक स्पष्टीकरण जारी किया। इसमें कहा गया कि मनमोहन सिंह के बयान को एनडीटीवी, पीटीआई और टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे मीडिया के कुछ सेक्शन के जरिए गलत तरीके से कोट किया गया. पीएमओ ने अपने स्पष्टीकरण में भाषण के जरूरी हिस्से का उल्लेख करते हुए कहा, “प्रधानमंत्री का ‘संसाधनों पर पहला हक’ होने की बात प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को लेकर है। इसमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं और बच्चों और अल्पसंख्यकों के उत्थान के कार्यक्रम शामिल हैं.” पीएमओ के बयान में इस विवाद को लेकर कहा गया कि प्रधानमंत्री ने जो कहा, उसकी जानबूझकर और खराब इरादे से गलत व्याख्या की गई.
PMO का स्पष्टीकरण (10 दिसम्बर 2006)
2006 के भाषण के फ़ैक्ट चेक के बाद बीजेपी की तरफ से मनमोहन सिंह का एक और वीडियो शेयर किया गया। यह विडियो अप्रैल 2009 के एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का वीडियो था जिसमें एक पत्रकार प्रधानमंत्री से उनके पुराने भाषण पर सवाल करता है।याद रखने की बात यह है कि मनमोहन सिंह देश के आख़िरी प्रधानमंत्री थे जो प्रेस कॉन्फ़्रेन्स करते थे इसलिए बीजेपी को यह विडियो मिल पाया।
April 2009: In the run up to Lok Sabha election, Dr Manmohan Singh, reiterated his statement that minorities, especially poor Muslims, should get priority when it comes to the nation’s resources. He categorically stated that he stood by his earlier assertion that Muslims should… pic.twitter.com/sNTYa5WSfM
ख़ैर X पर बीजेपी द्वारा शेयर किए विडियो में बड़ी चालाकी से पत्रकार द्वारा पूछे गये सवाल को काट दिया गया है। पत्रकार मनमोहन सिंह से उनके पुराने भाषण पर सवाल करता है कि क्या आपने कहा था कि मुसलमानों का इस देश के संसाधनों पर पहला हक़ होना चाहिए? सवाल के जवाब में प्रधानमंत्री कहते हैं: –
I did not say the same thing. I said minorities, particularly Muslim minorities, if they are poor, they have a prior claim on the resources of the nation. I used the word ‘all’ for all minorities and I added, particularly Muslim minorities, if they are poor, they have prior right to resources and I stand by it.”
हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह का है;-
“मैंने ऐसा नहीं कहा था। मैंने कहा था कि अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम अल्पसंख्यक, अगर वो ग़रीब हैं तो देश के संसाधनों पर उनका पहला दावा होना चाहिए। मैंने ‘सभी’ शब्द का प्रयोग सभी अल्पसंख्यक के लिए किया और मैंने विशेषकर मुस्लिम अल्पसंख्यक कह, अगर वो ग़रीब हैं तो देश के संसाधनों पर उनका पहला दावा होना चाहिए। मैं इस पर क़ायम हूँ।”
प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में प्रधानमंत्री से सवाल केवल मुस्लिम पर किया गया इसलिए जवाब में अल्पसंख्यक पर फ़ोकस रहा। जवाब की पहली लाइन इसी से शुरू होती है कि ‘मैंने ऐसा नहीं कहा था।‘ आगे वो सभी अल्पसंख्यक की बात करते हैं और ‘विशेषकर मुस्लिम’ अगर वो ग़रीब हैं, जोड़ते हैं।
‘विशेषकर मुस्लिम’ शब्द से बीजेपी की परेशानी समझी जा सकती है। बीजेपी इस को विवाद बना का पेश कर रही है. बीजेपी और बीजेपी समर्थक किसी आदमी से बात कर लीजिए, बात कुछ भी हो कुछ ही समय में वो मुसलमान पर पहुंच ही जाता है. मुसलमान से बीजेपी का ख़ास लगाव किसी से छिपा नहीं है। इसी ख़ास लगाव की वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ मुसलमान-मुसलमान कर रहे हैं. यह सब अनजाने में नहीं, सोच समझकर किया जा रहा है। कोशिश की जा रही है कि चुनाव को धर्म पर लाया जाए क्योंकि धर्म से रोल की गई पिच पर बीजेपी अच्छी बैटिंग कर सकती है।
यहाँ अमित शाह के हालिया भाषण का ज़िक्र करना ज़रूरी है। छत्तीसगढ़ में एक चुनावी रैली में शाह कहते हैं: “संसाधनों पर पहला अधिकार ग़रीबों, आदिवासियों,दलितों और पिछड़े समुदायों का है।“
शाह के कथन से मुस्लिम ही नहीं पूरा अल्पसंख्यक समाज बाहर हो जाता है और सब ठीक हो जाता है।
कुल जमा बात इतनी सी है कि नरेंद्र जी और उनकी पार्टी की विचारधारा मुसलमान से नफ़रत करती है। मुसलमान शब्द आ जाने भर से बिलबिला से उठते हैं। वो मुसलमान को इस देश में दोयम दर्जा का समझते हैं. पहला छोड़िए, देश के संसाधनों पर मुसलमानों का थोड़ा भी हक़ है, मोदी-शाह ये बोलकर नहीं दिखा सकते. बाकी चुनाव का समय है और इस समय नरेंद्र जी तक अलग ही तरह का माल सप्लाई होने लगता है। मंगलसूत्र, मुसलमान, मछली इसी माल का साइड इफ़ेक्ट है.
“2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद जब नरेंद्र मोदी संसद पहुंचे तो उन्होंने वहाँ मौजूद सावरकर के चित्र के आगे श्रद्धा से हाथ जोड़े लेकिन उनकी पीठ गांधी के चित्र की तरफ थी। ये अनजाने में हुआ होगा लेकिन दरअसल अगर आपको सावरकर को सम्मान देना है तो आपको गाँधी की विचारधारा की तरफ़ पूरी तरह से पीठ घुमानी ही पड़ेगी। गांधी को स्वीकारना है तो सावरकर को नकारना होगा।”~निरंजन तकले ( सावरकर पर शोध करने वाले)
विनायक दामोदर सावरकर को ‘वीर सावरकर’ कहकर पुकारा जाता हैऔर हिंदुत्व की विचारधारा के जनक के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है लेकिन इतिहास को केवल श्रद्धा से नहीं, विवेक से भी देखा जाना चाहिए। श्रद्धा स्मारक बनाती है, विवेक इतिहास। तो आइए, सावरकर के जीवन के उन पहलुओं को तथ्यों के आलोक में समझें जो अक्सर नारों और प्रचार की धुंध में छिप जाते हैं।
सावरकर और ‘Two Nation Theory’: विचारधारा की बुनियाद
भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के लिए आमतौर पर मोहम्मद अली जिन्ना को दोषी ठहराया जाता है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्य यह है कि ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ की पहली स्पष्ट घोषणा 1937 में सावरकर ने हिंदू महासभा के अधिवेशन में की थी…जिन्ना से तीन वर्ष पहले।
उन्होंने कहा: “भारत में दो राष्ट्र बसते हैं–एक हिंदू, दूसरा मुस्लिम।”
यह कथन महज़ भाषण नहीं था बल्कि उस विचारधारा का बीज था जिसमें धार्मिक पहचान को राष्ट्रीय पहचान से ऊपर रखा गया। यह विचार गाँधी के ‘राष्ट्र एक है’ सिद्धांत के एकदम विपरीत था।
स्वतंत्रता संग्राम और अंग्रेजों से क्षमायाचना
सावरकर 1910 में गिरफ़्तार हुए और उन्हें काले पानी की सज़ा हुई। इसमें कोई शक नहीं कि उनका आरंभिक योगदान क्रांतिकारी था लेकिन जो प्रश्न इतिहास बार-बार पूछता है, वह यह है कि क्या एक “वीर” बार-बार क्षमायाचना पत्र (Mercy Petitions) लिखता है?
अंडमान की जेल से 1911 में ही उन्होंने पहला माफ़ीनामा भेजा था जिसमें उन्होंने वादा किया कि भविष्य में वे ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहेंगे। इसके बाद भी उन्होंने कई बार दया याचिकाएँ भेजीं। वहीं, भगत सिंह, जिन्हें सावरकर के बाद अंग्रेजों ने पकड़ कर फाँसी दी, के पास भी क्षमायाचना का विकल्प था लेकिन उन्होंने विचारों से समझौता नहीं किया।
तो क्या सावरकर के आत्मसमर्पण को रणनीति कहा जाए या विचारधारा से पलायन?
महिलाओं को लेकर विचार: सभ्यता पर एक प्रश्न
सावरकर ने अपने लेखन में महिलाओं को लेकर कई बार ऐसी बातें लिखीं जिन्हें आज के मानदंडों पर ‘स्त्रीविरोधी’ और अमानवीय कहा जा सकता है। उदाहरणस्वरूप, उन्होंने यह विचार रखा था कि युद्ध में विजेता राष्ट्र को शत्रु राष्ट्र की महिलाओं को ‘लूटने’ का अधिकार होना चाहिए जैसा कि उन्होंने मुस्लिम आक्रांताओं के सन्दर्भ में कहा था। ऐसे विचार किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकते।
अंग्रेजों से पेंशन: सहयोग की कहानी?
यह तथ्य कम चर्चित है कि स्वतंत्रता के बाद नहीं बल्कि ब्रिटिश शासन काल में ही सावरकर को एक ‘पेंशन’ मिलती थी। यह पेंशन क्यों दी जाती थी? यह प्रश्न भी इतिहास के दस्तावेजों में दर्ज है लेकिन उसका उत्तर आज तक स्पष्ट नहीं हो सका।
क्या यह उनके द्वारा बार-बार माफ़ी माँगने का ‘इनाम’ था? या ब्रिटिश सरकार से सहयोग का संकेत?
गांधी हत्या और कपूर आयोग की रिपोर्ट
1948 में जब महात्मा गांधी की हत्या हुई, तो नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे के साथ सावरकर भी अभियुक्तों में थे। सबूतों के अभाव में वे अदालत से बरी हो गए। लेकिन स्वतंत्र भारत में बने कपूर आयोग ने 1967 में कहा:“ऐसा विश्वास करना कठिन है कि सावरकर की जानकारी के बिना गांधी की हत्या की योजना बनी।”
यानी न्यायिक तकनीक ने उन्हें छोड़ा, पर इतिहास की दृष्टि ने नहीं।
आज़ादी के बाद का जीवन: एक मौन अध्याय
1947 के बाद जब देश आज़ाद हुआ, सावरकर 19 वर्ष और जीवित रहे। प्रश्न है कि उन्होंने उस स्वतंत्र भारत के लिए क्या किया? न कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन, न कोई राजनीतिक योगदान, न कोई रचनात्मक साहित्यिक कार्य।
इतिहास के इस मौन काल से बड़ा कोई बयान नहीं होता।
आरएसएस और सावरकर: रणनीतिक दूरी
गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) ने स्वयं को सावरकर से अलग कर लिया था, ताकि बदनामी से बचा जा सके। यही कारण है कि 1950 के दशक में हिंदुत्व की राजनीति सावरकर के नाम से नहीं, बल्कि संघ के संगठनों के नाम से आगे बढ़ी।
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सावरकर के प्रारंभिक जीवन की क्रांतिकारिता और उनका बौद्धिक तेज निर्विवाद है। लेकिन वही तेज जब किसी विशेष धार्मिक पहचान की श्रेष्ठता का घोषणापत्र बन जाए तब वह राष्ट्रीयता नहीं, विभाजन का औज़ार बन जाता है।
इतिहास को श्रद्धांजलि देने की नहीं, उसका सामना करने की ज़रूरत होती है और अगर आपको सावरकर को पूरी श्रद्धा से देखना है तो गांधी की पूरी विचारधारा से पीठ मोड़नी ही पड़ेगी।
आंदोलनों का एक सैद्धांतिक आधार होता है लेकिन सैद्धांतिक आग्रह जीत की गारंटी नहीं लेते। जीत रणनीति से मिलती है और प्रभावी रणनीति के लिए कई बार मामूली विचलन जरूरी होता है।
सफल रणनीतिक विरोध प्रदर्शनों की सबसे ताज़ा मिसाल हॉन्ग कॉन्ग का है। वहाँ महीनों तक प्रदर्शन चले। आख़िरकार हॉन्गकॉन्ग के प्रशासक और चीनी सरकार के घोषित पिट्ठू कैरी लेम को प्रदर्शनकारियों के सामने झुकना पड़ा और विवादित प्रत्यपर्ण कानून वापस लेना पड़ा।
ये सब इसलिए संभव हो पाया क्योंकि प्रदर्शनकारियों ने अपनी रणनीति के दम पर ऐसी ताकत हासिल की कि न केवल सरकार को झुकना पड़ा बल्कि सरकार को हटाने की मांग को भी बल मिला।
हिंसा का पक्ष तो कोई क्या खाकर लेगा लेकिन याद रखना चाहिए कि हॉन्ग कॉन्ग में जब मौक़ा मिला, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की बर्बरता का जवाब तोड़-फोड़ से ही दिया। भारत में सत्ता पक्ष के गणमान्य लोगों को प्रदर्शन का यह हिंसात्मक पहलू भी ख़ूब भाया क्योंकि आंदोलन की मूल चेतना चीन विरोधी थी।
कहने का अर्थ यह कि भारत समेत सभी देश अपने हितों के मद्देनज़र पक्ष चुनते रहे हैं और अनेक बार वे हिंसक पक्षों के साथ खड़े मिले हैं। यह बात क्या किसी से छिपी है कि नेपाल की राजशाही के खिलाफ़ माओवादी आंदोलन को भारत का समर्थन था जबकि अपने ही देश में भारत माओवादियों के खिलाफ़ सख़्त अभियान चलाती रही है। इसलिए राजनीति में हिंसा का समर्थन या विरोध सापेक्षता के तहत देखा जाता है।हालांकि ये दलील स्वीकार की जा सकती है कि अपनेघर में हिंसा का मामला थोड़ा अलग है लेकिन उसमें भी सरकारों का नज़रिया और प्रतिक्रिया इस लिहाज़ से अलग रही है कि उन्हें अंजाम देने वाले प्रदर्शनकारी समूह कौन हैं। ख़ुद भारतीय जनता पार्टी का अपना राजनीतिक इतिहास हिंसा से सना रहा है। कभी दो सीट पाने वाली पार्टी आज राजनीति के शिखर पर है क्योंकि बाबरी मस्ज़िद और रथ वगैरह अभी ज़्यादा पुराने भी नहीं हुए हैं।
ख़ैर, वापस प्रदर्शन की रणनीति पर लौटता हूँ। हॉन्गकॉन्ग का ज़िक्र इसलिए किया क्योंकि वहां प्रदर्शन प्रभावी और रचनात्मक रणनीति पर आधारित थे। छाते लिए खड़े लोगों के हुजूम की विहंगम तस्वीर आपको याद ही होगी। ये भी याद होगा कि कैसे प्रदर्शनकारियों ने सर्वाइव करने के लिए मास्क का इस्तेमाल किया और तंग आकर सरकार को मास्क पर प्रतिबंध तक लगाना पड़ा।
भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ आक्रोश ने नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ़ अभूतपूर्व प्रदर्शनों का रूप ले लिया है लेकिन नेतृत्व और रणनीति के स्तर पर यह आन्दोलन हॉन्गकॉन्ग से कुछ बातें सीख सकता है। कुछ इसलिये क्योंकि भारत का संविधान हिंसक आंदोलनों की इजाज़त कतई नहीं देता है इसलिए हिंसा को दरकिनार कर देना चाहिए।
इसके आलावा मैं अपनी समझ से कुछ और मशविरे पेश कर रहा हूँ। आज़माकर देखे जा सकते हैं।
■प्रदर्शनों में तिरंगों की संख्या बढ़ जाए और हर व्यक्ति तिरंगा लेकर पहुंचे तो सरकार का ही नैरेटिव कमज़ोर होगा। साथ ही ये संदेश भी जाएगा कि हमें बेशक हमारे कपड़ों से पहचानकर अलगाइए लेकिन ये मुल्क हमारा है और बाशिंदे हम यहीं के हैं।
इंक़लाब ज़िंदाबाद के साथ जय हिन्द के नारे की फ्रीक्वेंसी बढ़ानी चाहिए। Public display of patriotism सामान्य दिनों में मुझे ख़ास पसंद नहीं है पर यहाँ यह रणनीतिक कदम होगा।सैद्धांतिक विचलन किसी को लगे तो लगता रहे।
■देख रहा हूं कि पुलिसकर्मियों को गुलाब देने से कुछ गर्म खून वाले नौजवान ख़फ़ा हैं। उनका कहना है कि ऐसी घटनाओं का ख़ास राजनीतिक महत्व नहीं होगा बल्कि लाठी मारने वालों को गुलाब देने से अपना ही पक्ष कमजोर होगा। लेकिन दुनिया भर के इकोसिस्टम में परसेप्शन की अहमियत बढ़ी है। तथ्य और कथ्य से अहम ये है कि जो घट रहा है वह नज़र कैसा आ रहा है। यह बहुत ख़राब शब्द है पर प्रदर्शनकारी इसे अपनी पीआर गतिविधि के तौर पर देख सकते हैं।इन प्रदर्शनों को जनसमर्थन की ज़रूरत है वो इससे बढ़ेगा और हिंसा के जो धब्बे लगे हैं उनका असर कुछ कम होगा।
■अपने बीच के कुछ नेता चुने जाने चाहिए जिनकी उम्र 30-35 वर्ष से अधिक न हो। अच्छा हो कि एक मुसलमान के साथ उन छह धर्मों के प्रतिनिधि हों, जिन्हें CAA की लाइफ जैकेट दी जाने वाली है। सक्रिय राजनीतिक दल का न हो तो और बेहतर होगा। यह आंदोलन गोल टोपी वालों का है के नैरेटिव को इससे बदलने में मदद मिलेगी।
■इन प्रदर्शनों का मज़बूत पहलू वे रचनात्मक प्लकार्डऔर बैनर हैं जो सोशल मीडिया पर तुरत-फुरत वायरल हो गए हैं लेकिन इस रचनात्मकता को दिल्ली की परिधि से बाहर ले जाने और हिंदी में बढ़ाने की ज़रूरत है।
■विपक्ष के राजनीतिक दलों को इस आंदोलन को टेकओवर करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए बल्कि छात्रों के नेतृत्व को बल देना चाहिए। इसमें उन्हीं का फ़ायदा है।
■प्रदर्शनकारियों के नेतृत्व को ग़ैर-बीजेपी शासित प्रदेशों के ज्यादा से ज्यादा मुख्यमंत्रियों को अपने पक्ष में रखने का प्रयास करना चाहिए।
■उन छोटे छोटे ग़ैर मुस्लिम समूहों को प्रदर्शनों में लाने का प्रयास करना चाहिए जो CAA और NRC से प्रभावित हो सकते हैं. कल्पना कीजिए, नागा साधुओं या छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की एक टोली दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल हो।अहा! क्या दृश्य होगा।
CAA पर लगातार सत्ता के समर्थकों की तरफ से दावा किया जा रहा है इस कानून से किसी को कोई परेशानी नहीं होगी। यह ‘नागरिकता’ देने का कानून है न कि नागरिकता छीनने का।
मेरे सीधे सवाल….
CAA में स्पष्ट रूप से केवल तीन पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है। अगर नागरिकता देने का आधार धार्मिक रूप से प्रताड़ना ही है तो भारत के पड़ोस में श्रीलंका है, जहां तमिल हिन्दू प्रताड़ना का शिकार हैं। चीन है, जहां से तिब्बती शरणार्थी भारत आते हैं। म्यामांर है, जहां से बड़ी संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी हैं। इन्हें अलग क्यों रखा गया है? केवल इस्लामिक देशों के हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई धर्म के लोगों को भारत की नागरिकता देने की बात कर अपने देश में हिन्दू-मुसलमान की डिबेट को बढ़ावा देना नहीं है??हमारा देश एक धर्म के आधार वाला देश नहीं है। सर्व धर्म समभाव वाला देश है। याद कीजिये, स्वामी विवेकानन्द का अमेरिका में दिया वो ऐतिहासिक भाषण जिसमें उन्होंने ज़ोर देकर कहा था कि उन्हें गर्व है कि वो ऐसे देश से आते हैं जिसने दुनिया भर के लोगों को बिना किसी धार्मिक भेदभाव के शरण दी है।तो क्या यह कानून ‘आईडिया ऑफ इंडिया’ के खिलाफ़ नहीं है? सरकारी पक्ष की तरफ से लगातार कहा जा रहा है कि यह कानून तीनों इस्लामिक देशों के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का भरोसा देता है लेकिन प्रताड़ना के नाम पर भारत की नागरिकता देने पर क्या अल्पसंख्यकों के साथ उनके देश में अत्याचार और नहीं बढेगा?जैसे हमारे देश में पाकिस्तान भेजने वाले लोग हैं वैसे ही उधर भी ‘भारत चले जाओ’ कहने वालों की संख्या में इजाफ़ा नहीं होगा? अमित शाह ने बिल पेश करते समय संसद के अंदर कहा की 31 दिसम्बर 2014 के पहले आये प्रताड़ित लोगों को नागरिकता दी जाएगी। अगर इन तीन देशों से 2014 से पहले आये गैर मुस्लिम की संख्या की बात करें तो वो कुछ हज़ारों में ही हैं, जो पहले से ही देश में रोजी-रोटी कमा रहे हैं। तो क्या महज़ 30 हज़ार लोगों के लिए देश भर की एकता ख़तरे में नहीं डाल दी गयी? अगर कल इस कानून के ज़रिये किसी ग़लत इंसान को नागरिकता मिल जाए और वो भारत के सरकारी महकमों में पहुंच कर भारत की सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा कर दे तो? अगर भविष्य में पाकिस्तान भी अपने देश में ऐसा कोई कानून बना दें और कहे कि भारत से प्रताड़ित मुसलमान का उनके देश में स्वागत है, उन्हें पाकिस्तान की नागरिकता दी जाएगी तो क्या भारत उसे स्वीकार कर पायेगा?
हमारा देश एक धर्म के आधार वाला देश नहीं है। सर्व धर्म समभाव वाला देश है। याद कीजिये, स्वामी विवेकानन्द का अमेरिका में दिया वो ऐतिहासिक भाषण जिसमें उन्होंने ज़ोर देकर कहा था कि उन्हें गर्व है कि वो ऐसे देश से आते हैं जिसने दुनिया भर के लोगों को बिना किसी धार्मिक भेदभाव के शरण दी है।तो क्या यह कानून ‘आईडिया ऑफ इंडिया’ के खिलाफ़ नहीं है?
सरकारी पक्ष की तरफ से लगातार कहा जा रहा है कि यह कानून तीनों इस्लामिक देशों के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का भरोसा देता है लेकिन प्रताड़ना के नाम पर भारत की नागरिकता देने पर क्या अल्पसंख्यकों के साथ उनके देश में अत्याचार और नहीं बढेगा?जैसे हमारे देश में पाकिस्तान भेजने वाले लोग हैं वैसे ही उधर भी ‘भारत चले जाओ’ कहने वालों की संख्या में इजाफ़ा नहीं होगा? अमित शाह ने बिल पेश करते समय संसद के अंदर कहा की 31 दिसम्बर 2014 के पहले आये प्रताड़ित लोगों को नागरिकता दी जाएगी। अगर इन तीन देशों से 2014 से पहले आये गैर मुस्लिम की संख्या की बात करें तो वो कुछ हज़ारों में ही हैं, जो पहले से ही देश में रोजी-रोटी कमा रहे हैं। तो क्या महज़ 30 हज़ार लोगों के लिए देश भर की एकता ख़तरे में नहीं डाल दी गयी? अगर कल इस कानून के ज़रिये किसी ग़लत इंसान को नागरिकता मिल जाए और वो भारत के सरकारी महकमों में पहुंच कर भारत की सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा कर दे तो? अगर भविष्य में पाकिस्तान भी अपने देश में ऐसा कोई कानून बना दें और कहे कि भारत से प्रताड़ित मुसलमान का उनके देश में स्वागत है, उन्हें पाकिस्तान की नागरिकता दी जाएगी तो क्या भारत उसे स्वीकार कर पायेगा?
CAA और NRC जुड़ जाते हैं तो?
अमित शाह में बिल पेश करते समय अपने संसदीय भाषण में कहा कि इस कानून के तहत 31 दिसम्बर 2014 से पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जो कि इस्लामिक देश हैं से आये हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई जो कि प्रताड़ित होकर भारत आये हैं उन्हें भारत की नागरिकता मिल जाएगी जिसके बाद भारत के नागरिक को मिलने वाली तमाम सुविधाओं के वो हक़दार होंगे। अपने इसी भाषण में अमित शाह ने कहा कि 19 जुलाई 1948 के बाद भारत आये घुसपैठिये की पहचान कर उसे एनआरसी के तहत बाहर किया जाएगा।
गृह मंत्री दो विरोधाभासी बातें लगातार कह रहे हैं। एक तरफ़ वो कह रहे हैं कि CAA और NRC को जोड़कर लोग अफ़वाह फ़ैला रहे हैं कि देश के मुसलमानों को देश से बाहर कर दिया जाएगा। दूसरी तरफ वो खुद कह चुके हैं पहले CAA आएगा फिर देशभर में NRC को लागू किया जाएगा और NRC की लिस्ट में जगह न बना पाने वाले हिंदुओं को नागरिकता दी जाएगी बाकियों को घुसपैठिया मान कर देश से निकाल दिया जाएगा। अपने एक पुराने इंटरवियू में शाह बंगाल चुनाव प्रचार के समय ममता बनर्जी को चुनौती देते हुए कहते हैं कि क्या वो नहीं चाहती कि बंगाली हिंदुओं को देश की नागरिकता मिलनी चाहिए।
एक तरफ़ शाह एक-एक घुसपैठिये को बाहर करने की बात करते हैं दूसरी तरफ NRC की लिस्ट में जगह न पाने वाले गैर मुस्लिम को नागरिकता देने की बात भी करते हैं। जिसका सीधा सा मतलब निकलता है कि अगर CAA और NRC को जोड़ दिया जाए तो इस देश के मुसलमानों की नागरिकता ख़तरे में पड़ सकती है। यही सबसे बड़ी वज़ह है इससे खिलाफ़ प्रदर्शन होने की।
आसाम में क्या हो रहा है?
आसाम में लगभग 19 लाख लोग NRC की लिस्ट में अपनी जगह नहीं बना पाए। जिसमें 13 लाख हिंदू और 6 लाख मुस्लिम/आदिवासी हैं। इन सभी के पास 1971 के पहले के जो डॉक्यूमेंट सबूत के तौर में मांगे गए थे, नहीं थे। उनसे मांगे गए डॉक्यूमेंट की लिस्ट देखेंगे तो हम सब भी चक्कर में पड़ जाएंगे। वोटर लिस्ट में ख़ुद का नाम, माता-पिता नाम,जमीन का रिकॉर्ड, रिफ्यूजी डॉक्यूमेंट, बैंक डॉक्यूमेंट, LIC पॉलिसी, स्कूल सर्टिफिकेट, पासपोर्ट आदि और सभी डॉक्यूमेंट 1971 के पहले के होने चाहिए। अगर ये डॉक्यूमेंट हमसे भी मांगे जाए तो कईओं को नहीं मिलेंगे। अमीर आदमी शायद जुगाड़ और पैसे के बल पर डॉक्यूमेंट बना लेगा लेकिन बहुत से बिना डॉक्यूमेंट के ही रह जाएंगे। अब सवाल यही कि जो बिना डॉक्यूमेंट के रह जाएगा और NRC की लिस्ट में अपनी जगह नहीं बना पायेगा उसका क्या होगा?? क्या हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई होने पर उसे नागरिकता दे दी जाएगी और मुसलमान को घुसपैठिया बता दिया जाएगा?
ये अभी केवल आसाम की बात है अगर पूरे देश में यह लागू होता है तो क्या होगा?
चलिए एक बार को मान लिया जाए कि CAA और NRC को नहीं जोड़ा जाना चाहिए तो क्या आसाम में 19 लाख लोग अपनी नागरिकता गँवा देंगे? सोचिये आसाम जैसे छोटे राज्य में संख्या इतनी बड़ी है तो देश भर में यह आंकड़ा कितना बड़ा होगा।
देशभर में NRC बनने, डॉक्यूमेंट जमा करने, अपील की प्रक्रिया पूरी होने तक, फिर नए क़ानून के तहत नागरिकता बहाल होने के बीच कई साल का फ़ासला होगा। इसमें काफ़ी पैसा खर्च होगा। आसाम में 6 साल और 1600 करोड़ रुपये पूरी प्रक्रिया में खर्च हो चुके हैं। देश भर में इस प्रक्रिया को पूरा होने में न जाने कितने साल और पैसा लग जाएगा।
कुल जमा CAA और NRC गांधी, पटेल, विवेकानन्द, अम्बेडकर, भगत सिंह के विचारों के खिलाफ़ है। अशफ़ाक़, सैयद हसन इमाम, अब्दुल गफ्फार खान, मोहम्मद अली जौहर से गद्दारी करता है। जो देश बिस्मिल और अशफ़ाक की दोस्ती की मिसालें देता हो वो देश कैसे ऐसा कानून बना सकता है?
यक़ीन मानिए CAA और NRC के समर्थक लोग इसलिए नहीं है कि उन्हें पाकिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदुओं से प्यार है। दरसलन उन्हें अपने ही देश के मुसलमान से नफ़रत है।
CAA के समर्थन में सारी बेतुकी दलील देते-देते ऐसे लोग इस बात को दबी जुबाँ से स्वीकार भी कर लेते हैं।जो सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते वो भी अगर दिल पर हाथ रख कर सोचेंगे तो उनको भी जवाब में यही मिलेगा कि उन्हें मुसलमान से नफ़रत है।
मैंने कईयों पर यह टेस्ट कर लिया है और अब तक 100% नतीज़ा मिला है।
अदम गोंडवी का एक शेर है कि
मुल्क जाए भाड़ में इससे उन्हें मतलब नहीं एक ही ख़्वाहिश है कि कुनबे में मुख्तारी रहे।
आर्टिकल 370 खत्म करना संघ फिर जनसंघ और अब की भाजपा का पुराना संकल्प था वो उन्होंने पूरा किया। उनकी विचारधारा से मेरी घनघोर असहमतियां हैं लेकिन इस विषय पर उनसे कोई गिला-शिकवा नहीं हैं। वो जो करना चाहते थे, उन्होंने किया। भले ही इसके लिए कोई भी रास्ता अपनाया हो।
मेरी आपत्तियां उनसे हैं जो कश्मीर के न होकर जश्न मना रहे हैं। उनसे हैं जो ‘जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है’ का नारा बुलंद करते थे लेकिन कह रहे हैं कि कश्मीर आज भारत का हिस्सा बना है। कश्मीर से बाहर रहने वाले ऐसे लोग इसलिए जश्न नहीं मना रहे हैं कि इससे उन्हें कुछ हासिल होगा वो जश्न के मूड में इसलिए हैं कि मुस्लिम बाहुल्य राज्य कश्मीर को मिल रहा स्पेशल स्टेटस का दर्जा खत्म हुआ।
जी हाँ, मुस्लिम बाहुल्य राज्य जो उनके अंदर पल रहे राष्ट्रवाद के जुनून को बढ़ावा देता है। उन भावनाओं को हवा मिलती जो उनके मन में संघ के बौद्धिक कार्यक्रमों में डाली गई है।
दरअसल ऐसी जमात कश्मीर को एक भूमि का टुकड़ा भर मानता है। इसलिए एक जमीन को जीतने के लिए एक राजा जो करता है वही उनके आराध्य ने किया। बंदूक के जोर से जमीन तो कब्जाई जाती है लेकिन लोगों के दिलों पर कब्जा करने के लिए उनके दिलों को जीतना पड़ता है। कश्मीर पर निर्णय लिया गया लेकिन निर्णय में एक भी कश्मीरी शामिल नहीं है।
रही बात हमारे जश्न में डूबने की तो हम भी जश्न मनाएंगे, जरूर मनाएंगे लेकिन तब जब इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली कश्मीर की अवाम जश्न मनाती दिखेगी। कश्मीर अभी बंद है। लोग घरों में कैद हैं। लोगों के कैद होने का जश्न आपको ही मुबारक़।
ये जश्न उन्हें मुबारक जिन्हें instrument of accession पर राजा हरि सिंह के हस्ताक्षर की कहानी का इतिहास नहीं पता। उन्हें मुबारक़ जो नहीं जानते कि आर्टिकल 370 लगाने में नेहरू से आगे सरदार पटेल थे। उन्हें मुबारक जो Kashmir Insurgency के बारे में नहीं जानते। जो नहीं जानते कि 19 जनवरी 1990 को कश्मीरी पंडितों के पलायन के समय जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था, जगमोहन मल्होत्रा राज्यपाल थे।देश में वीपी सिंह के सरकार थी और उसे बीजेपी का समर्थन प्राप्त था।
आर्टिकल 370 भारत को कश्मीर से एक एक पुल की तरह जोड़ता था। यह पुल अब टूट चुका है तो उसके क्या परिणाम होंगे यह भविष्य ही बतायेगा लेकिन उम्मीद करता हूँ जम्हूरियत, कश्मीरियत और इंसानियत तीनों बची रहे।
रही बात साहसिक और ऐतिहासिक कदम की तो नोटबन्दी भी एक साहसिक और ऐतिहासिक कदम था और इससे भी आतंकवाद की कमर टूट जाने वाली थी।
पढ़िए, केंद्र सरकार का सवर्ण आरक्षण क्यों ग़रीब सवर्णों का नुकसान अधिक करेगा?
प्रधानमंत्री ने चुनाव से ठीक पहले सवर्ण आरक्षण का अप्रत्याशित कार्ड खेला है. फोटो: facebook.com/narendramodi
किसी चैनल की स्क्रीन पर देखा कि आज पांडे, मिश्रा, गुप्ता और श्रीवास्तव ख़ुश होंगे. वजह, केंद्र की मोदी सरकार ने ‘गरीब’ सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण वाला बिल संसद में पास हो गया है और राष्ट्रपति की मंज़ूरी के बाद कुछ राज्यों में लागू भी हो गया है.
पर यह अगड़ी जातियों के लिए हितकारी होगा, इस पर संशय के पर्याप्त कारण हैं. उस पर बात आगे, लेकिन पहले इस तथ्य की पड़ताल कि क्या यह एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व पहल है, जैसा सरकार समर्थक दावा कर रहे हैं.
अभूतपूर्व कैसे?
आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों को आरक्षण की पहली कोशिश प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हाराव की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने 1991 में की थी. लेकिन इंदिरा साहनी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इस फैसले को पलट दिया था. अदालत ने ग़रीब सवर्णों को आरक्षण दिए जाने का कोई संवैधानिक आधार नहीं पाया. हालांकि समय-समय पर कई नेता सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करते रहे जिसमें बसपा नेत्री मायावती भी शामिल हैं.
तो सौ बात में पहली बात, मोदी सरकार की यह कोशिश पहली और अनूठी कतई नहीं है.
संवैधानिक अड़चनें और अन्य चुनौतियाँ
उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तक ही निर्धारित की है (तमिलनाडु में 69 फीसदी को छोड़कर). राज्यों में जातिगत आरक्षण की अधिकतम सीमा अलग-अलग है क्योंकि हर राज्य में सामाजिक और शैक्षिक आधार पर पिछड़ेपन का पैमाना अलग-अलग है.
यह जानी हुई बात है कि संविधान में फिलहाल आर्थिक रूप से कमज़ोर होने को आरक्षण का आधार नहीं माना गया है. इसी आधार पर इसे सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी गई थी. इसके अलावा संविधान के कुछ दूसरे अनुच्छेदों से विरोधाभासी बताते हुए भी इसे न्यायिक चुनौती दी जा सकती है. बेवजह नहीं है कि सामाजिक न्याय मंत्री थावर सिंह गहलोत ने माना है कि अगर बिल के खिलाफ कोई कोर्ट जाता है तो सरकार के लिए यह ज़रूर एक चुनौती होगी.
ग़रीब कौन?
इस विधेयक का जो सबसे अजीबोग़रीब पहलू है, वह ‘गरीब’ सवर्णों का क्राइटेरिया है. इसमें गरीबी रेखा से नीचे के सवर्णों को रखने के बजाय 8 लाख सालाना आमदनी की सीमा रखी गई है.
अजीब बात है कि 8 लाख आमदनी वाला व्यक्ति 10 परसेंट इनकम टैक्स देता है लेकिन आरक्षण के नए मानक पर वह गरीब है. मांग उठती है कि ढाई लाख से ज्यादा सालाना आय वाले को क्रीमी लेयर माना जाए लेकिन 8 लाख वाला आर्थिक तौर पर कमज़ोर है. 1000 स्क्वायर फ़ीट मकान का मालिक प्रधानमंत्री आवास योजना का फ़ायदा नहीं ले सकता लेकिन वो सवर्ण आरक्षण का लाभ ले सकता है. 5 एकड़ तक ज़मीन का मालिक भी ग़रीब है.
इस हिसाब से मोदी सरकार के नए मानकों से अधिकतम सवर्ण ग़रीब होंगे.
क्या इससे सवर्णों को वाक़ई फ़ायदा होगा?
नए मानकों से अधिकतम सवर्ण आरक्षण के लिए एलिजिबल हो जाते हैं. 8 लाख सालाना आय, 1000 स्क्वायर मकान, 5 एकड़ जमीन. यानी ये सवर्ण जो पहले 50 फीसदी के हिस्सेदार थे वो अब 10 फीसदी में सिमट जाएंगे और बची हुई 40 फीसदी अनारक्षित सीटें परोक्ष रूप से 10 फीसदी समृद्ध सवर्णों के लिए आरक्षित हो जाएंगी.
फर्ज़ कीजिए कि आप ओबीसी हैं. आप जब कोई फॉर्म भरते हैं तो आप ओबीसी के आगे टिक करते हैं और तब आपका चयन ओबीसी के लिए तय कोटे के भीतर ही होगा. अब गरीब सवर्णों की बड़ी आबादी 10 फीसदी सीटों के लिए सीमित हो जाएगी जिसके लिए पहले परोक्ष रूप से 50 फीसदी का खुला मैदान होता था. यह बात आप जानते हैं कि जब आप आरक्षण के किसी कोटे से आवेदन करते हैं तो आप अनारक्षित सीटों के हकदार नहीं होते.
भारत के अलग-अलग राज्यों में जातिगत आरक्षण अलग-अलग है. उत्तर प्रदेश में ओबीसी कोटा 27 फीसदी है जबकि मध्य प्रदेश में 14 फीसदी है. जबकि दोनों राज्यों में ओबीसी आबादी में ज्यादा अंतर नहीं है. इसलिए कई बहुजनवादी राजनीतिक दल और सामाजिक कार्यकर्ता आबादी के हिसाब से आरक्षण के वक़ालत करते रहे हैं और ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा बुलंद करते रहे हैं. यहां से यह आंदोलन नए सिरे से आगे बढ़ सकता है.
कई अम्बेडकरवादी कहते हैं कि देश की 85 फीसदी आबादी को सिर्फ 50 प्रतिशत आरक्षण मिलता है और बाकी का 50 फीसदी कोटा 15 फीसदी लोगों के लिए सुरक्षित रख दिया है. ये दलील नई नहीं है कि अनारक्षित 50 फीसदी कोटा ही असली आरक्षण है, जिस पर सवर्णों का कब्ज़ा रहा है. यदि यह कब्जा रहा है तो मोदी सरकार की इस कोशिश से यह कब्जा बंटेगा. गरीब सवर्ण 10 फीसदी में सिमट जाएगा और 40 फीसदी का फायदा मिलेगा समृद्ध सवर्णों को.
यह मानने का कोई कारण नहीं कि सरकार के अनुभवी सूरमा इन तकनीकी पहलुओं से वाकिफ़ नहीं होंगे. संवैधानिक चुनौतियों से भी और भविष्य में इसके असर से भी.
ठगे जाने पर ताली बजाकर खुश न होइए. चुनावी लॉलीपॉप का मुहावरा बोरिंग लगे तो नौ मन तेल और राधा के नृत्य का मुहावरा जोड़ लीजिए. न तेल होगा, न नृत्य होगा. अभी जनवरी है, अप्रैल में चुनाव होगा.