यह पुराण सूत्रों की महिमा, राजनीति, मीडिया और लोकतंत्र की मिलीभगत की एक कटाक्षपूर्ण कथा है। यह उन नायकों की गाथा है जो किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं होते पर ‘सूत्रों’ के नाम से हर स्क्रीन पर चमकते हैं।
“सूत्रों के हवाले से खबर है…” ये वाक्य अब किसी चैनल की जरूरत नहीं उसकी धार्मिकता बन गयी है। जैसे मंदिर में घंटा बजाना जरूरी होता है वैसे ही हर न्यूज़रूम में सूत्रों का जाप अनिवार्य है।
सूत्र कौन हैं? कहां रहते हैं? क्या खाते हैं? किस मंत्रालय में टिके हैं? ये रहस्य अब राष्ट्रीय सुरक्षा से बड़ा है। हो सकता है सूत्र वही चपरासी हो जो चाय देते वक्त फाइल के कोने से कुछ रंग पहचान लेते हों या वो ड्राइवर जो मंत्रियों की गाड़ी में बैठकर मौन की भाषा समझ गया हो।
सूत्र अब व्यक्ति नहीं रहे,संस्था बन चुके हैं। सूत्र अब गुप्तचर नहीं, कथावाचक हैं। सबसे बड़ी बात सूत्र अब कभी गलत नहीं होते, बस अधूरे होते हैं। कोई कह नहीं सकता कि सूत्र किस जाति के हैं, किस धर्म के हैं पर इतना तय है कि हर न्यूज़ चैनल में इनकी हिस्सेदारी है। सूत्र वो अलौकिक शक्ति है जो न दिखाई देती है, न पकड़ी जाती है, लेकिन हर बड़ी खबर की डोर उसी के हाथ में होती है।
“सूत्र कह रहे हैं”...ये वाक्य अब भारतीय लोकतंत्र की गीता है। सूत्रों के पास हर मंत्रालय की चाबी है। वो रक्षा मंत्रालय के ब्रीफकेस में झांक आते हैं, वित्त मंत्रालय की फाइलें स्कैन कर लेते हैं और विदेश मंत्रालय के बैठक में उठे भावनात्मक मुद्दों तक को महसूस कर लेते हैं। सूत्र इतने ताक़तवर हैं कि सरकार से पहले फैसला सुनाते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि सरकार सिर्फ रिट्वीट करने के लिए है, असली नीति तो सूत्रों की ही है। सरकार जो कह नही सकती वो सूत्रों से कहलवा देती है।
सूत्र अब केवल संवाददाता का साथी नहीं, संपादकीय नीति बन चुका है। पत्रकारिता में जो पहले ‘न्यूज़ वैलिडेशन’ था, अब उसकी जगह ‘सूत्र प्रमाणीकरण’ ने ले ली है और हद तो तब होती है जब सूत्रों के हवाले से सूत्रों की ही पुष्टि होने लगती है।
एक चैनल कहता है -“हमारे सूत्रों ने बताया…”
दूसरा कहता है -“हमारे सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है…”
तीसरा कहता है -“हमारे सूत्रों ने दोनों सूत्रों को झूठा बताया है…”
और चौथा कहता है -“सूत्रों में मतभेद की खबरें आ रही हैं…”
मतलब अब सूत्रों का भी विपक्ष और पक्ष बनने लगा है।
सोचिए, एक दिन ऐसा भी आएगा जब संसद में विपक्ष सवाल पूछेगा और सरकार जवाब देगी–“इस पर हमारे सूत्र ही कुछ कह सकते हैं।”
सूत्रों की यह महिमा अब इतनी बढ़ गई है कि न्यूज़रूम में देवताओं की मूर्तियाँ हटाकर सूत्र मूर्ति रख लेनी चाहिए। चलिए सूत्र पुराण शुरू करते हैं…पूजा में अगरबत्ती जलाइए और टीवी पर हाथ जोड़कर कहिए—“हे सूत्र देव, सत्य की वर्षा करो।”
सूत्रपुराण प्रथम अध्याय- सूत्रोत्पत्ति
इस अध्य्याय में सूत्रों की उत्पत्ति का वर्णन है। इनकी उत्पत्ति उस काल में हुई जब सत्ता मौन हो गई और समाचार को शोर की भूख लग गई। “सूत्रों के हवाले से खबर है” के नाम पर किसी भी ख़बर को बेचने की आज़ादी मिल गई।
न वेद न शास्त्र न ग्रन्थेषु वाक्यम्।
यत्र सूत्रोक्तं स्यात्, तत्रैव सत्यम्॥1।।
भावार्थ–सुनो हे जन! अब ज्ञान वेदों में नहीं, न ही नीति-शास्त्रों में है, जो कुछ भी सूत्रों ने कहा है वही अब अंतिम सत्य है।
न दृष्टं न साक्ष्यं न हस्ते लिखितम्।
सूत्रवाणी एव धर्मस्य प्रतीकं स्मृतम्॥2।।
भावार्थ–न देखा गया, न लिखा गया, न रिकॉर्ड में है पर सूत्रवाणी ही अब धर्म है।
सर्वत्र सन्ति सूत्राणि, दृश्यं नैव भवन्ति ते।
प्रश्नैः न लभ्यते कश्चित्, मौनमेव हि भाषणम्॥॥3।।
भावार्थ–सूत्र सर्वव्यापी हैं, हर ओर हैं पर पकड़े नहीं जाते। कोई पूछे भी तो मौन हो जाते हैं।
सूत्र से राजनयः चलति, युद्धशांति तय्यर्पिता।
नेता जी किं कुर्वन्ति? टी.वी. पश्यन्ति केवलं॥॥4।।
भावार्थ–राजनीति सूत्रों से ही चलती है । युद्ध हो या शांति सब उनके हवाले। नेता तो बस टीवी पर देखते हैं कि अब क्या नीति बनी है।
गूढ़बैठक भवनमध्ये जातं, किंचिद् गुप्तमिव।
परंतु सर्वं प्रकटम, रात्री 9 भजनकाले॥॥5।।
भावार्थ–बैठकें गुप्त होती हैं , योजनाएं रहस्यपूर्ण होती हैं। परंतु सब खुलासा रात 9 बजे प्रकट हो जाता है, टीवी की आरती में।
सूत्रोहि न कर्मकांडी, न वामपंथी, न राष्ट्रवादी।
तथा रूपम धरेत, यथा चैनलवाणी इच्छति॥6।।
भावार्थ–सूत्र न तो कर्मकांडी हैं, न ही विचारधाराओं में बंधे, वो वही रूप धरते हैं जो चैनल चाहते हैं।
सूत्रं यो निन्दति करे, सः पापि पाकिस्तानी, देशद्रुहः।
न कारणं, न साक्ष्यं च, प्रश्नोsपि तत्र निषेध्यः॥7।।
भावार्थ–जो सूत्र पर प्रश्न करे, वो दोषी, वो देशद्रोही। क्यों? इसका उत्तर किसी के पास नहीं पर पूछना मना है।
न दृश्यते तथ्यं, न श्रूयते ज्ञानम्।
केवलं क्रन्दनं, क्रोधः, गेस्टमर्दनम च।
एवं न्यूज सूत्रं सृज्यते
‘जय बकवासाय’ इति उद्घघोषम सह॥8।।
भावार्थ-न कोई तथ्य दिखता है, न कोई ज्ञान सुनाई देता है। बस चीखना, गुस्सा और पैनलिस्ट का अपमान होता है। इस तरह का समाचार सूत्र बनाया जाता है और ऊपर से नारा होता है -जय बकवासाय!
सूत्राष्टकं इदं पुण्यं, जो पढ़े, वो चैनल पर वरिष्ठ कहलाए।
जो न माने, उसका रिमोट छीन लिया जाए।
सूत्रपुराणं प्रथमध्यायः समाप्तम्।
सूत्रपुराण द्वितीय अध्याय: सूत्रावतारवर्णनम्
सूत्र अब राजनीतिक संकेत, गुप्त इरादों के दूत और नैरेटिव गढ़ने के औजार बन गए। टेबल पर रखी लाल-पीली फाइल देखकर टीवी वाले उस रणनीति का अनुमान लगा लेते हैं जो किसी बैठक में बनी भी नहीं। इस अध्य्याय में सूत्रों के विभिन्न अवतारों को प्रकट किया गया है।
एको नास्ति सूत्रो लोके, बहुविधास्ते विकल्पकाः।
प्रत्येकं चैनलाय साक्षात् अवतारो हि विशेषतः॥1।।
भावार्थ-सूत्र एक नहीं हैं, हर चैनल को उनका अपना ‘विशिष्ट सूत्र’ प्राप्त है जैसे इष्टदेवता उनका हो।
प्रथमः सूत्रो गुप्तवाणी- मन्त्रिमण्डलान्तःचरः।
न मन्त्रसु भागी सः, किन्तु दीवारां द्वारं श्रवति सदा॥2।।
भावार्थ-पहले अवतार हैं– गुप्तवाणी सूत्र जो मंत्रियों की बैठक में नहीं होते पर दीवारों से सुन लेते हैं। अद्भुत श्रवणशक्ति है इनकी।
द्वितीयः कक्षचालक सूत्रः, वाहनेन गच्छन् सर्वत्र।
सड़कस्य धूलितले सर्व निर्णयं शोधयति॥3।।
भावार्थ–दूसरे अवतार हैं ड्राइवर सूत्र। गाड़ी चलाते-चलाते मंत्री जी के मोबाइल की स्क्रीन से भी रणनीति पढ़ लेते हैं।
तृतीयः फाइलस्पर्शी सूत्रः, लिफाफे स्पर्शनकुशलः।
लालफाइलीं, हरितपत्रं-दृष्ट्वा जानाति गोप्यर्थम्॥4।।
भावार्थ-तीसरे हैं फाइल स्पर्शी सूत्र जिन्हें बस कागज़ का रंग और क्लिप का आकार देखकर पता चल जाता है कि अगला सर्जिकल स्ट्राइक कब होगा।
चतुर्थो कॉफ़ी सूत्रः, कैन्टीनमध्ये स्थितः सदा।
कर्मचारिभिः सह वार्तालापेन निर्णयं उद्घाटयति॥5।।
भावार्थ-चौथे हैं कॉफ़ी सूत्र जो मंत्रालय की कैन्टीन में बैठकर एक चाय और दो चुटकुलों में नीति लीक कर देते हैं।
पञ्चमः सी.सी.टी.वी सूत्रः, मूकदर्शी दृश्यदक्षः।
बैठकस्य mute चित्रं दृष्ट्वा, हावभावात् नीति चिन्तयति॥6।।
भावार्थ-पांचवे अवतार हैं CCTV सूत्र। केवल बैठकों के mute फुटेज से, चेहरों की झुर्रियों से पूरी रणनीति निकाल लेते हैं।
षष्ठः पूर्वसूचना सूत्रः, कालदर्शी भविष्यवक्ता।
“नेता कहेंगे क्या कल”, इति पूर्वसंध्या विज्ञापनं करोति॥7।।
भावार्थ-छठे सूत्र हैं भविष्यवक्ता सूत्र। नेता क्या कहने वाले हैं, इसका विज्ञापन चैनल पर एक दिन पहले ही चला देते हैं।
सप्तमः लीकवर्षी सूत्रः, यः दस्तावेजं प्लावयति।
PDF,DOC, PPT-सर्वं WhatsApp प्रसरति यथा जलधारा॥8।।
भावार्थ-सातवाँ अवतार लीकवर्षी सूत्र हैं। गोपनीय दस्तावेज़ सीधा व्हाट्सएप पर ऐसे लीक करते हैं जैसे बरसात में छत से पानी टपकता है।
जो इन सूत्रों की महिमा न माने, वो ‘डिबेट’ से बाहर कर दिया जाए।
सूत्रपुराणं द्वितीयअध्याय: समाप्तम्।
सूत्रपुराण तृतीय अध्याय:राजकीय सूत्रविज्ञानम्
सूत्र अब Leak बन चुके हैं। TRP घटे तो सूत्रों के अनुसार धमाका हो सकता है।सूत्रों का अपना समाज शास्त्र है, उन पर किसी कानून की बाध्यता नहीं है।
सूत्रः न केवलं संवाददाता सहचरः।
सः राजमान्यः, प्रशासकीयगूढ़विद्, यथार्थबोधकः च॥1।।
भावार्थ-सूत्र केवल पत्रकारों के मित्र नहीं वे शासनतंत्र के अनाधिकारिक प्रवक्ता, गूढ़ज्ञानी और रहस्य-प्रकाशक बन चुके हैं।
अस्ति अधिनियमः सूत्रान् प्रतिबन्धयितुं
न च न्यायालये साक्ष्यरूपेण प्रस्तुता स्तुतेः आवश्यकता॥2।।
भावार्थ-सूत्रों पर न कोई क़ानून लागू होता है न किसी कोर्ट में इनसे सवाल पूछे जाते हैं।
एते सूत्राः भवन्ति विशेषतः संवेदनशील विषय पर सरकार मौन है,
परंतु सूत्रों से खबर है.. — इत्युक्तिर्मूलमन्त्रः॥3।।
भावार्थ-जब सरकार चुप होती है तब सूत्र बोलते हैं और वही जनता का आखिरी संदर्भ बन जाता है।
पत्रकारः पृच्छति- “हे सूत्र! कुशलं ते?”
सूत्रः प्रत्याह-“चैनलप्रसन्नः स्यात्, तथाऽहमपि प्रसन्नः॥4।।
भावार्थ-पत्रकार पूछता है-हे सूत्र! सब ठीक? सूत्र कहता है-चैनल खुश मैं भी खुश।
पत्रकारः -“किं लेख्यं?”
सूत्रः- “यत् चैनलेषु चलिष्यति, तत् एव लिख्यताम्॥5।।
भावार्थ-पत्रकार-क्या लिखना है? सूत्र-जो स्क्रीन पर चल जाए, वही लिखो।
सूत्रसंधिता अपि अस्ति, यद्यपि अप्रकाशिता।
तस्य मुख्यं आदेशं- प्रकाशय गोपनीयं, किंतु विश्वसनीयं दर्शय॥6।।
भावार्थ-सूत्रों की अपनी संहिता होती है जो छापी नहीं जाती। उसका पहला नियम है कि गोपनीयता उजागर करो पर इस तरह कि विश्वसनीय लगे।
एवं सूत्रलोकस्य महिमा न समाप्त्यते।
यत्र यदा मौनं राज्यं, तदा तदा वाणीं दत्ते सूत्रम्॥7।।
भावार्थ-सूत्रलोक की महिमा अपरंपार है, जब-जब राज्य मौन होता है तब-तब सूत्र बोलते हैं।
जिन्हें यह पढ़ने में कठिनाई हो वे कृपया सूत्रों के हवाले से समझ लें।
सूत्रपुराणं तृतीयाध्यायः समाप्तम्।
सूत्रपुराण – चतुर्थ अध्याय:सूत्रजातिवर्णनं
सूत्रों का अपना कोई घोषित धर्म या जाति नहीं होती है लेकिन फिर भी वो स्वयं अघोषित रूप से एक वर्ण व्यवस्था में बंधे हुए हैं।
सूत्राः न केवलं एकवर्णीयाः
ते चतुर्वर्णा इव संप्रवर्तकाः
Breaking सूत्रः, Exclusive सूत्रः, Denial सूत्रः,
चतुर्थः-‘अभी पुष्टि नहीं’ सूत्रः॥1।।
भावार्थ-सूत्र भी वर्णव्यवस्था से अछूते नहीं। चार जातियाँ हैं-Breaking जो सबकुछ तोड़ते हैं। Exclusive जो एक ही चैनल को दिखते हैं। Denial जो बाद में खुद को झूठा बताते हैं। Pending जो कहते हैं -अभी पुष्टि नहीं हुई लेकिन एंकर बोलते हैं मानो ब्रह्मा का वचन हो।
Breaking सूत्रः क्रोधिनः
हर समय शीघ्रगामी च।
“अब से थोड़ी देर पहले…” इत्यादि वाक्यैः समारंभन्ते॥2।।
भावार्थ-Breaking सूत्र क्रोधी होते हैं, उन्हें कुछ देर शांत रखा जाए तो न्यूज़ चैनल को पसीना आ जाता है। हर ब्रेकिंग सूत्र की शुरुआत होती है: “अभी-अभी खबर आई है” जबकि खबर आई होती है -दोपहर में ही।
Exclusive सूत्रः अहंकारी च,
“केवल हमारे पास है ये खबर”
इत्युक्त्या सर्वज्ञः प्रतीतः॥3।।
भावार्थ-Exclusive सूत्र अभिमानी होते हैंवे, केवल एक चैनल पर प्रकट होते हैं, बाकी चैनलों को अज्ञानी मानते हैं।
Denial सूत्रः विषादग्रस्तः।
पूर्ववाक्यं नष्टं करोति सः।
“जो खबर पहले बताई थी, वह सूत्र की भूल थी”
इत्युक्तिं मौनं स्वीकृत्य चैनल चुपचित्तं भवति॥4।।
भावार्थ-Denial सूत्र जब प्रकट होते हैं, तो पुराने सभी वादे, दावे और हेडलाइंस का पिंडदान कर देते हैं। चैनल फिर मौन साध लेते हैं मानो कुछ हुआ ही न हो।
प्रायोजित सूत्राः च कपटी वणिजः समाना।
यदा TRP क्षीणं स्यात्, तदा “सूत्रों के हवाले से”
घोष्यते ‘बड़ा धमाका’, परंतु विस्फोटं न दृश्यते॥5।।
भावार्थ-Sponsored सूत्र व्यापारी होते हैं। जब टीआरपी गिरती है, तब ये ‘धमाका होने वाला है’ कहकर माहौल बनाते हैं और अंत में बम की जगह विशेष चर्चा निकलती है।
किंतु…यदा सूत्रः आत्मबोधं प्राप्नोति,
यदा सः जानेत्- “मम कथनं अब सत्यसे दूरं गच्छति”
तदा सः संन्यासं ग्रह्णाति॥6।।
भावार्थ-जब सूत्र को आत्मज्ञान होता है कि उसकी बात अब सिर्फ टीआरपी है सच्चाई नहीं, तो वह संन्यास ले लेता है।
संन्यस्त सूत्रः न मोबाईलं धारयति,
न कैमरा समीपे गच्छति।
सः हिमालयं गच्छति, परंतु वहां भी
मीडियायाः “विशेष सूत्र” पहुंचंति॥7।।
भावार्थ-संन्यस्त सूत्र मोबाइल त्याग देता है, टीवी से दूर चला जाता है पर चैनल फिर भी कहता है -“सूत्रों के अनुसार, वह अभी बद्रीनाथ के पास ध्यान में है।
जो समझ गए, वो अब “सूत्र” बनने की पात्रता पा चुके हैं।
जो नहीं समझे –उनके लिए शाम 9 बजे विशेष डिबेट है।
सूत्रपुराणं चतुर्थाध्यायः समाप्तम्।
सूत्रपुराण – पंचम अध्याय: सूत्रमोक्षमार्गः
अंततः सूत्र मौन धारण कर लेता है। जब कोई पूछता -“कौन सा सच था?” वह मुस्कुराता, आँखें मूंद लेता और मौन का प्रसाद बाँट देता। सूत्रोपनिषद् कहता है: “जो चिल्लाए नहीं, जो बिके नहीं, जो मौन में हो,वही सच्चा सूत्र है।”
यदा राष्ट्रं घोषयति -“अब हम पारदर्शी हैं”
तदा सूत्राः कम्पन्ते-“फिर हम क्या करेंगे?”
यदा सरकार स्वयं बताने लगे,
तदा सूत्रों का अस्तित्व संकट में पड़ जाए॥1।।
भावार्थ-जब सरकार पारदर्शिता की बात करने लगे और सवालों के जवाब खुद देने लगे तो सूत्र डर जाते हैं कि अब हमारी दुकान कैसे चलेगी?
सूत्र आत्मचिंतनमं करोति
यदा न हम पर हवाला दियते,
न हमारी खबर पर डिबेट होता,
तदा कियं वै मेरा जीवनम्?”
सूत्रः विषादे निमग्नः॥2।।
भावार्थ-सूत्र सोचता है कि अब न कोई हवाला देता है, न कोई मेरी खबर पर चिल्लाता है, मैं हूँ ही क्यों? और वो डिप्रेशन में चला जाता है।
परंतु एक महाज्ञानी सूत्र-आत्मसूत्र उपदेशं दत्तेः
हे बंधो! सत्यं त्यक्त्वा यदि केवल टीआरपी भोगे,
तो न मीडिया संतुष्टं, न आत्मा प्रसन्नं।
परमगोपनीयता में जो मौन है वही सत्य है॥3।।
भावार्थ-तभी एक आत्मसूत्र प्रकट होता है, जो कहता है कि अगर तुम सिर्फ टीआरपी के लिए झूठ को हवाले में लपेटते रहे तो न चैनल तृप्त होगा न आत्मा शांत। असली सूत्र मौन में है।
एवं सूत्रः सूत्रोपनिषद् पठति
न कंठे उद्घोषणं, न स्क्रीन पर अधिष्ठानम्।
सत्यं यत् न बोले, परंतु भीतर रहे
स एव साक्षात् परमसूत्रः॥4।।
भावार्थ-सूत्र उपनिषद कहता है कि जो चिल्लाए नहीं, स्क्रीन पर न हो, मौन में हो वही असली परमसूत्र है।
सूत्रः गमनं करोति हिमालयं,
माइक्रोफोन त्यजति, पेनड्राइव विसर्जयति।
Breaking news की गूंज को छोड़
वह मौन की साधना में प्रविष्टः॥5॥
भावार्थ-सूत्र अब हिमालय चला जाता है। माइक त्याग देता है, गोपनीय फाइलों की पेनड्राइव गंगा में विसर्जित कर देता है। और मौन को साध लेता है।)
यदा कोई पूछे – “हे महान सूत्र!
अंततः कौन सा सच था?”
सूत्रः स्मितं करोति, चक्षुषो निमीलनं
उत्तरं न दत्ते, केवलं मौनं वितरति॥6॥
भावार्थ-जब कोई उससे पूछता है कि अंत में कौन सा सच था? सूत्र मुस्कुराता है, आँखें बंद कर लेता है और मौन का उपहार देकर चला जाता है।
अब यदि किसी को कोई जानकारी चाहिए,तो “सूत्रों के हवाले से” नहीं, बल्कि स्वविवेक और सवालों के साहस से प्राप्त करनी होगी।
सूत्रपुराण पंचम अध्याय समाप्तम्।
सूत्र बाण
अतः सूत्रपुराणस्य समापनम न मौनम्,
अपितु उद्घोषः अस्तु
सूत्र नहीं, अब सवाल उठाइए।
सूत्र नहीं, अब साक्ष्य माँगिए।
सूत्र नहीं, अब सत्य देखिए।
इति सूत्रपुराणं संपूर्णम्।
प्रणम्य स्वविवेकं,
विचारयतु जनः
किसके हवाले है ये लोकतंत्र?
सूत्र देव की आरती-1
आरती उतारैं सूत्र बड़भागी,
बिन बोले चलावैं सबकी मनमानी।
ना अफ़सर जाने, ना मंत्री जाने,
सूत्र बिना ख़बर कहाँ ठाने?
झलक दिखावैं खबरिया झरोखा,
सूत्र देव कहैं-बात है पक्की लोका!
ना दाढ़ी, ना टोपी, ना चश्मा पहने,
फिर भी साँच झूठ के रथ पे बहने।
कहैं रिपोर्टर -‘सूत्रों ने बताया’,
बोलै एंकर-हमने सबसे पहले दिखाया!
ब्रेकिंग की रोटी, सूत्र बेलैं,
बहस के तवे पे न्यूज़ सेंकैलैं।
टीवी कहे-अब सूत्रों पे विश्वास करो
तथ्य-अफ़वाह में फर्क ना सोचो-गिनो।
दर्शन करैं चैनल के साधक,
टीआरपी के फेर में सब बाधक।
आरती कीजै ‘गुप्त नामधारी’
हर चैनल में इनकी हिस्सेदारी।
सूत्र की माया अपार रे भाई,
लोकतंत्र भी इनके भरोसे खाई!
आरती श्री सूत्र देव की-2
आरती उतारूँ सूत्र भगवान की
स्क्रीन सजी है कथा महान की।
TV मंदिर, माइक है माला
Breaking की झड़ी लगे हर साला।
Fact न कोई, बस भाव बतायें,
जो भी बोले,देश से जोड़ायें।
आरती उतारूँ…
पेज रंगे हैं खबरों के जाल से,
TRP बढ़े देश के हाल से।
सच्चाई की न पूछो बात,
सूत्र कहे -सबूत है WhatsApp साथ
आरती उतारूँ…
सूत्र बोले-हमसे न टकराना,
राजनीति का हम हैं खज़ाना।
जो ना माने, देशद्रोही कहाय,
जो पूछे सवाल, ग़द्दार बताय।
आरती उतारूँ…
सूत्र देव की लीला न्यारी,
छवि चमकाए, लाज संवारी।
Image-यज्ञ में सत्य जले,
PR-पुष्पों से खेल रचले।
आरती उतारूँ…
स्रोत वही जो सूचित हो
विरोध वही जो रचित हो।
जनता पूछे -सच कहाँ है?
सूत्र हँसे-जहाँ चैनल वहाँ है।
आरती उतारूँ…
सूत्र देवता की जय! (दोनों हाथ ऊपर उठाकर)
“जो देखे TV वही ज्ञानी,
जो न माने-उसकी कहानी?
सूत्र देव की जय बोलो,
मन में संशय न कुछ खोलो!”
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