“डूबकर इसमें जो मिलता है वो मज़ा ही मज़ा है मैं बर्फ़ का टुकड़ा हूँ तेरा इश्क़ रूह अफज़ा है”
दो-तीन साल ख़बर उड़ी कि रूह अफज़ा बनाने वाली कंपनी हमदर्द में हिंदुओं के लिए कोई जगह नहीं है। हमदर्द कंपनी सिर्फ मुसलमानों की हमदर्द है और वहाँ हिंदुओं को नौकरी पर नहीं रखा जाता है। पड़ताल शुरू हुई तो पता चला कि यह ज्ञान व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से आया है। इसमें कोई सच्चाई नहीं है। नफ़रती गैंग के द्वारा फैलाये गए दूसरे झूठों की तरह यह भी महज़ एक झूठ ही है।
हमदर्द की शुरुआत 1906 में हकीम अब्दुल मजीद ने की थी। अब्दुल मजीद 1883 में पीलीभीत में जन्मे थे। उन्होंने विख्यात यूनानी हकीम अजमल खान से ट्रेनिंग ली और गाजियाबाद में हमदर्द का काम शुरू किया। उनके व्यापार को गति तब मिली जब उन्होंने रूह अफज़ा बनाना शुरू किया।
रूह अफज़ा का नाम पंडित दया शंकर ‘नसीम’ की किताब ‘मसनवी गुलजार-ए-नसीम’ के एक पात्र से प्रभावित होकर रखा गया था। मिर्ज़ा नूर अहमद ने इसका रंग-बिरंगा लेबल तैयार किया जो शुरुआती दिनों में बॉम्बे में प्रिंट होता था।
हकीम अब्दुल मजीद के दो बेटे थे। अब्दुल हमीद और मोहम्मद सईद। दोनों पिता के इस व्यवसाय में हाथ बटाते थे। पिता के निधन के बाद दोनों भाई मिलकर हमदर्द के व्यापार को संभालते रहे। 1947 में देश के बंटवारे के समय मोहम्मद सईद ने पाकिस्तान को चुना और अब्दुल हमीद ने भारत को। सईद ने हमदर्द के नाम से ही कराची में काम शुरू किया और वहां भी रूह अफज़ा बनाया जाने लगा। 1971 से पहले तक रूह अफज़ा ईस्ट और वेस्ट पाकिस्तान में उतना ही लोकप्रिय था जितना भारत में। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद वहां की ब्रांच में काम करने वाले लोगों ने रूह अफज़ा को बंगलादेश का ब्रांड भी बना दिया।
इधर भारत में अब्दुल हमीद ने जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी की स्थापना की और पुरानी लैबोरेटरी को अपग्रेड किया। 1965 में उन्हें पदम श्री और 1991 में पदम भूषण सम्मान से नवाज़ा गया।
अब्दुल हमीद के दो बेटे हुए-अब्दुल मोईद और हम्माद अहमद। 1948 में हमदर्द कंपनी को वक्फ बना दिया गया और मुतवल्ली अब्दुल मोईद को बनाया गया जबकि हम्माद अहमद मार्केटिंग का काम देखने लगे। 1948 की वक्फ डीड थी लेकिन 1973 में एक संशोधन कर दिया और बड़े बेटे अब्दुल मोईद को चीफ मुतवल्ली बना दिया, जो वक्फ का फाइनेंस, अकाउंट, प्रोडक्शन सब कुछ देखने लगे। उन्होंने अपने बेटे अब्दुल माजिद को मुतवल्ली बना दिया। हम्माद ने भी अपने बेटे हमीद अहमद को बोर्ड में शामिल करा दिया। 2015 में अब्दुल मोईद के निधन के बाद बोर्ड की बागडोर अब्दुल माजिद ने सभाल ली। जिस पर हम्माद अहमद ने एतराज़ किया। 2017 में हम्माद अहमद ने इसको लेकर हाईकोर्ट में केस कर दिया। जिस पर कोर्ट ने हम्माद के पक्ष में फैसला सुनाया।
रूह अफज़ा के बारे में मशहूर उर्दू शायर साहिल देहलवी ने लिखा था—
जो रंग देखा तो दिलरुबा है मज़ा जो चक्खो तो जांफ़ज़ा है महक में फूलों से भी ज़ियादा असर में इकसिर-ए-बे-बहा है जो इसमें तफ़री-ओ-तौक़ीयत है ना उसकी ग़ायत न इंतिहा है ना रूह-अफज़ा सा कोई शरबत कभी बनेगा ना बन चुका है
दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल-3 के टॉयलेट में मेरे बगल में एक सज्जन आ कर खड़े हुए। उन्हें देखकर ऐसा लगा कि जैसे इन्हें मैंने कहीं देखा है। थोड़ा दिमाग पर ज़ोर डाला तो कुछ ही पल में उनका नाम याद आ गया। सज्जन थे अशोक गहलोत जो उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री नहीं बने थे। अशोक गहलोत से यह मेरी पहली और शायद आख़िरी मुलाकात थी।
अशोक गहलोत ने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव की सरकार में मंत्री पद संभाला बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। वो कांग्रेस के चुनिंदा पुराने नेताओं में से एक हैं जो कांग्रेस की गिरती छवि के बीच भी अपनी व्यक्तिगत छवि को ख़राब होने से बचा पाएं। वरना कपिल सिब्बल, दिग्विजय, चिदंबरम जैसे नेताओं का हाल तो हम देख ही रहे हैं।
गहलोत की बात इसलिए क्योंकि कोरोना की इस महामारी में आजकल राजस्थान के भीलवाड़ा मॉडल की ख़ूब चर्चा हो रही है। भीलवाड़ा शहर में एक प्राइवेट हॉस्पिटल में 6 कोरोना पॉजिटिव केस आने पर हड़कंप मच गया। राज्य सरकार ने सबसे पहले हॉस्पिटल को सील किया फिर 20 मार्च को पूरे शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। बाद में 3 अप्रैल को पूरे शहर में 10 दिन के लिए महाकर्फ्यू लगा दिया गया। शहर का बॉर्डर पूरी तरह से सील कर दिया गया। किसी को भी घर से निकलने की इजाज़त नहीं दी गयी।
भीलवाड़ा डीएम राजेन्द्र भट्ट
प्रशासन ने लगभग 16 हज़ार स्वास्थ्य कर्मियों की मदद से घर-घर जाकर करीब 18 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की। जिन्हें थोड़ा भी बुखार या खाँसी जैसे लक्षण थे, उन्हें बाकियों से अलग करके क्वारंटाइन किया गया। इसके लिए सरकार ने प्राइवेट हॉस्पिटल और होटलों को अपने अधिकार में लिया। 10 दिनों में 2 बार पूरे शहर को सेनेटाइज भी कराया गया
जिला प्रशासन की तरफ़ से यह सुनिश्चित किया गया कि ज़रूरत की चीजें लोगों के घर तक पहुंचे। जिला कलेक्टर राजेन्द्र भट्ट और उनकी पूरी टीम ने इस दौरान बड़ी जिम्मेदारी और लगन से रात-दिन काम किया। प्रशासन ने लगभग 16 हज़ार स्वास्थ्य कर्मियों की मदद से घर-घर जाकर करीब 18 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की। जिन्हें थोड़ा भी बुखार या खाँसी जैसे लक्षण थे, उन्हें बाकियों से अलग करके क्वारंटाइन किया गया। इसके लिए सरकार ने प्राइवेट हॉस्पिटल और होटलों को अपने अधिकार में लिया। 10 दिनों में 2 बार पूरे शहर को सेनेटाइज भी कराया गया।
भीलवाड़ा एसपी हरेंद्र कुमार
भीलवाड़ा से ही सीखते हुए उत्तर प्रदेश के 15 जिलों के कुछ इलाके, दिल्ली और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों को पूरी तरह से सील करने का फ़ैसला यहाँ की राज्य सरकारों ने लिया है।
जनवरी 1987 में पहली बार टीवी पर रामायण का प्रसारण शुरू हुआ तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था। कुल 78 एपिसोड थे लेकिन चार महीने बाधित होने की वजह से जुलाई 1988 में इसका पूरा प्रसारण खत्म हो पाया।
हालांकि रामायण का अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन से कोई लेना देना नहीं था लेकिन इसने मंदिर आंदोलन को नई ऊर्जा ज़रूर प्रदान की।1986 में मंदिर का ताला खुल चुका था और आंदोलन को गति मिल चुकी थी। रामायण की वज़ह से राम लोगों के मन में घर कर गए थे जिसका आंदोलन का नेतृत्व करने वाले संगठनों ने अच्छा इस्तेमाल किया। विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रमों में रामायण के क्लिप दिखाए जाने लगे थे।
भाजपा ने भी इसे अपने फ़ायदे में इस्तेमाल करने की हर संभव कोशिश की। सीता का किरदार निभाने वाली दीपिका छिकालिया को 1991 में वड़ोदरा से लोकसभा का टिकट दिया गया। दीपिका ने आसानी से चुनाव जीत लिया। रावण का किरदार निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी को भाजपा ने अपने कोटे से 1991 में राज्यसभा का सदस्य बनाया। कहा जाता है कि अरविंद त्रिवेदी की आडवाणी जी नज़दीकियां थी इसलिए उन्हें सांसद बनाया गया।राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने डोरे डालने की कोशिश की लेकिन उन्होंने एक्टिव पॉलिटिक्स में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। हां, अलग-अलग समय पर उनके भाजपा और कांग्रेस जॉइन करने की ख़बर उड़ती रही लेकिन ये सब केवल ख़बरों तक ही सीमित रही। हनुमान का किरदार निभाने वाले दारा सिंह को भी 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया और वो 2009 तक पूरे छह साल संसद सदस्य रहे।
जनवरी 1987 में शुरू हुआ रामायण उस दौर में टीवी-क्रांति ले कर आया। यह कार्यक्रम उम्मीद से कहीं ज्यादा कामयाब रहा। उस दौरान लाखों नए टेलीविजन खरीदे गए। हर रविवार सुबह-सुबह दूरदर्शन इसका प्रसारण होता था। शहरों की सड़के और गलियां रविवार की सुबह वीरान हो जाती थी। जिस समारोह या कार्यक्रम का रविवार के लिए विज्ञापन किया जाता था उसमें लिखा जाता था-‘रामायण के बाद’। जहां कहीं भी टेलीविजन होता था लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाती थी। रविवार की सुबह होटल, कारखानों और अस्पतालों में लोग बड़ी संख्या में छुट्टी पर होते थे। गांवों-देहातों में जहाँ बिजली की समस्या होती थी लोग रामायण के लिए बैट्री वगैरह का इंतज़ाम रखा करते थे। टीवी उस समय कुछ ही घरों में हुआ करता था इसलिए जहाँ भी टीवी होता था लोग कार्यक्रम शुरू होने से पहले जुट जाते थे। बड़े-बूढ़े, बच्चे, महिलाएं सब सुबह का काम निपटा कर रामायण का ही इंतज़ार करते थे।
हिंदुओं के लिए यह मनोरंजन से ज्यादा आस्था का विषय था। लोग सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर रामायण के लिए तैयार रहते थे। मजे की बात यह कि कई जगह रामायण आने से पहले टीवी को माला पहनाई जाती और चंदन का टीका तक लगाया जाता था। कार्यक्रम केवल हिंदुओं तक सीमित नहीं था। इस सीरियल ने समस्त धार्मिक बंधनों को तोड़ दिया था। मुस्लिम लोग कौतूहल और मनोरंजन के लिए देखते थे तो ईसाई दर्शकों की संख्या भी अच्छी-खासी थी। चर्च में रविवार सुबह के कार्यक्रम का समय रामायण की वज़ह से बदल दिया जाता था।
इस कार्यक्रम से हिंदुओं में नई सामूहिक चेतना का विकास हुआ। सबसे ख़ास बात रविंद जैन का संगीत था जिसने रामायण के किरदारों को जीवंत बना दिया। हिन्दू जो अभी तक राम को किताबों में ही पढ़ा करता था अब उनके लिए अरुण गोविल ही साक्षात राम थे। अरुण गोविल जहाँ कहीं जाते थे उन्हें राम की ही तरह लोग पूजते थे। उनके पैर छूने के लिए लोगों में होड़ लग जाती थी।
रामायण टीवी इतिहास का सबसे सफ़ल कार्यक्रम साबित हुआ।
मंदिर के लिए उत्साहित लोग संयम रख रहे हैं यह अच्छी बात है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर संघ प्रमुख ने भी फ़ैसले को किसी की हार जीत से न जोड़ने का संदेश दिया। ये भी जिम्मेदारी भरी बात है। संघ प्रमुख ने फ़ैसले के एक दिन पहले ही प्रेस वार्ता का समय तय कर दिया था, मानो अपने मनपसंद फ़ैसले का कोई दैवीय पूर्वाभास उन्हें हो गया था।
ख़ैर..देश को बधाई कि उसने फ़ैसले को शांति से स्वीकार किया और संयम का परिचय दिया। मुस्लिम पक्षकारों का विशेष रूप से साधुवाद कि उन्होंने असन्तुष्ट होने के बावज़ूद फ़ैसले को सहर्ष स्वीकार किया। इसका उलट फ़ैसला होता तो मालूम नहीं कि बहुसंख्यक हिंदूवाद इसे सहजता से स्वीकार कर पाता या नहीं।
देश भर की राजनीतिक पार्टियों का धन्यवाद। उन्होंने भी अपने मन के द्वेष और नफ़रत को कम से कम अपने बयानों में ज़ाहिर नहीं होने दिया। जिम्मेदारी से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार करने की नसीहत दी और आगे मिल-जुलकर मंदिर और मस्ज़िद बनाने की बात भी की।
याद रखिये फैसला सर्वसम्मति से हुआ है पांच जजों की खंडपीठ में एक मुस्लिम जज भी थे। ASI की रिपोर्ट ही मुख्य रूप से फ़ैसले का आधार बनी। ASI की टीम में कई मुसलमान थे जिसमें प्रमुख नाम केके मुहम्मद है जिन्होंने फ़ैसले के बाद ख़ुशी ज़ाहिर की है।बाबरी मस्जिद के पक्षकर हाशिम अंसारी और राम जन्मभूमि के पक्षकार महंत परमहंस रामचंद्र दास की दोस्ती तो हमेशा से मिसाल रही ही है। दोनों एक दूसरे को होली और ईद की बधाईयाँ दिया करते थे। एक ही तांगे से मुकदमें की पैरवी करने जाया करते थे फिर साथ ही लौटते थे। महंत परमहंस के देहांत के समय हाशिम पूरी रात उनके पास रहे और अगले दिन अंतिम संस्कार के बाद लौटे। लोग भले ही अयोध्या को लेकर लड़ते झगड़ते रहे हों लेकिन पक्षकारों में हमेशा से अच्छे रिश्ते रहे।
बस मामले में संघ और विहिप के जुड़ने के बाद से खटास लगातार बढ़ती रही। इस ऐतिहासिक फ़ैसले को संघ और उसकी विचारधारा के लोग जिस स्वीकार्यता से मानने की सीख दे रहे हैं क्या इसके उलट फ़ैसले में भी उनका यही रुख़ रहता? यक़ीनन नहीं।
‘मंदिर वही बनेगा, ‘सुन मौलाना मंदिर वही बनेगा’ चिल्लाने वाले आज शांति का संदेश दे रहे हैं। अच्छी बात है लेकिन इतिहास भी नहीं भूलना चाहिए।
जल्लीकट्टू पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पलट देने वाले लोग आज सुप्रीम कोर्ट की अवमानना न करने की हिदायत दे रहे हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष ही थे जिन्होंने धमकी भरे अंदाज में सबरीमाला के फैसले पर कोर्ट को बता दिया था कि कोर्ट को आस्था से जुड़े मामलों में फैसले सुनाने से बचना चाहिए। ऐसे आदेश नहीं देने चाहिए जो लोगों की आस्था का सम्मान नहीं कर सकें।
पुरानी बातों को भुला देना आसान नहीं होता और बड़ी बातों के साथ बारीकियों का ख़याल रखना भी ज़रूरी होता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में 1949 में मस्जिद के अंदर मूर्ति रखने और 6 दिसम्बर 1992 में मस्जिद ढहाने को कानूनन अपराध कहा है। उम्मीद करता हूँ कि उस काले दिन के अपराधियों को सजा जल्दी से जल्दी मिले। न्याय तो तभी पूरा होगा।
एक ऐसा मामला जिसका दंश देश ने लंबे समय तक झेला। अब वो खत्म हो जाना चाहिए। एक राजनीतिक पार्टी जिसने इस मसले पर ख़ूब राजनीति की अब उसे इसका ज़िक्र करना बंद कर देना चाहिए। देश उनका शुक्रगुज़ार होगा। फ़ैसले के बाद जश्न मनाने, पटाखे फोड़ने, मिठाई बांटने से बचिए। किसी रैली-रैला या सार्वजनिक रूप से ‘जय श्री राम’ के राजनीतिक उदघोष से बचिए। ‘राम राम’ करते रहिए। किसी मुल्ला-मौलवी के बहकावे में मत आइये।
कटियारों, गिरिराजों, महाराजों, ओवैसियों और कुरैशियों जैसे नफ़रत के सौदागरों से दूरी बनाइये। दंगाई और चिपछाप पत्रकारों को बायकॉट कर दीजिये वो ख़ुद ही आजकल कह रहे हैं कि नफ़रती लोगों को न सुनें इसलिए बेहतर है टीवी बंद कर दीजिये। नवाज़ देवबंदी को याद रखें: ‘ऐसी – वैसी बातों से तो अच्छा है ख़ामोश रहो या फिर ऐसी बात कहो जो ख़ामोशी से अच्छी हो’
देश की ख़ुशहाली अब हम सबके ही हाथों में है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार ज्यादा जरूरी मुद्दे हैं उन पर बात कीजिये। आख़िरी बात जो शायद कई लोगों को नागवार लगे लेकिन फिर भी कह देना चाहता हूँ। राम मेरे आराध्य हैं लेकिन बावज़ूद ऐसी बात जो हिंदुओं के ठेकेदारों ने तो कभी नहीं सुनी लेकिन मुसलमान के रहनुमाओं से अपील है कि पांच एकड़ जमीन पर मस्जिद बनाने से अच्छा है कि एक स्कूल या अस्पताल बनवा दीजिये। आप ज्यादा बड़े हो जाएंगे और अयोध्या को कुछ अच्छा हासिल होगा।
मेरे शहर सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) के मशहूर शायर और गंगा-जमुनी तहज़ीब के गीतकार अजमल सुल्तानपुरी साहब के दो प्रसिद्ध गीत….
[1】
मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मैं उसको ढूंढ रहा हूं मेरे बचपन का हिंदुस्तान न बंग्लादेश न पाकिस्तान मेरी आशा मेरा अरमान वो पूरा-पूरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं वो मेरा बचपन, वो स्कूल वो कच्ची सड़कें, उड़ती धूल लहकते बाग, महकते फूल वो मेरा खेत, मेरा खलिहान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं वो उर्दू गजलें, हिंदी गीत कहीं वो प्यार, कहीं वो प्रीत पहाड़ी गीतों के संगीत दिहाती लहरा, पुरबी तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मैं उसको ढूंढ रहा हूं वो उर्दू गजलें, हिंदी गीत कहीं वो प्यार, कहीं वो प्रीत पहाड़ी गीतों के संगीत दिहाती लहरा, पुरबी तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मैं उसको ढूंढ़ रहा हूं जहां के कृष्ण, जहां के राम जहां की श्याम सलोनी शाम जहां की सुबह बनारस धाम जहां भगवान करैं स्नान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं जहां थे तुलसी और कबीर जायसी जैसे पीर फकीर जहां थे मोमिन, गालिब, मीर जहां थे रहमत और रसखान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान वो मेरे पुरखों की जागीर कराची, लाहौर और कश्मीर वो बिल्कुल शेर की सी तस्वीर वो पूरा-पूरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं जहां की पाक-पवित्र जमीन जहां की मिट्टी खुल्दनशीन जहां महाराज मोईनुउद्दीन गरीब नवाज हिंदुस्तान मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं ये भूखा शायर, प्यासा कवि सिसकता चांद, सुलगता रवि ये भूखा शायर, प्यासा कवि सिसकता चांद, सुलगता रवि वो जिस मुद्रा में ऐसी छवि करा दे अजमल को जलपान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान
मैं तेरा शाहजहाँ तू मेरी मुमताज महल आ तुझे प्यार की अनमोल निशानी दे दूँ हाय ये नाज़ ये अंदाज़ ये ग़मजां ये गुरूर इसने पामाल किए कितने शहंशाहों के ताज नीमबाज़ आँखों में ये कैफ़ ये मस्ती ये शूरुर पेश करते हैं जिसे अहले नज़र दिल का खिराज ये तबस्सुम ये तकल्लुम ये सलीका ये शऊर शोख़ संजीदा है या दार हँसी सादामिजाज़ आ तेरे वास्ते तामील करूँ ताजमहल आ तुझे प्यार की अनमोल निशानी दे दूँ मैं तेरा शाहजहाँ तू मेरी मुमताज महल मोगरा, मोतियारा बेल-चमेली चम्पा सौसनों, यासमनो, नश्तरनो, सर्वसमन रातरानी, गुले मचकन, गुले नशरीं, सहरा फूल लब, फूल दहन, फूल जतन, फूल बदन मेरी सूरजमुखी, गुल चाँदनी, जूही, बेला हरसिंगारो गुल, कचनार औ गुलनार चमन मेरी नरगिस, मेरी गुल शब मेरी फूल कमल आ तुझे प्यार की अनमोल निशानी दे दूँ मैं तेरा शाहजहाँ तू मेरी मुमताज महल शमा, खुर्शीद, कमर बर्क, शरर, सैयारे है तेरे ही रुख़-ए-अनवार की इन सबमें चमक लाल याकूत शफ़क फूल है ना अंगारे है तेरे ही लब-ओ-रुख़सार की है इन सबमें झलक वही उड़ते हुए छींटे हैं ये जुगनू सारे तेरे सागर से अज़ल ही में गए थे वो छलक बादा-ए-हुस्न मेरे जाम-ए-शफ़क रंग में ढल आ तुझे प्यार की अनमोल निशानी दे दूँ मैं तेरा शाहजहाँ तू मेरी मुमताज महल
18 मई 2019, चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी हेलीकॉप्टर से केदारनाथ पहुंचे, भगवान शिव के दर्शन किये और फिर ख़बर आयी कि मोदी एक गुफ़ा के अंदर साधना करेंगे। थोड़ी ही देर में उनके एकांत साधना के तस्वीरें टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक फैल गयीं।
मोदी चालू आदमी है।
चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद केदारनाथ से फुटेज दे रहा है।टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक पर साहेब ‘काले बादल’ की तरह छा गए। बादल हैं तो राडार में नहीं आएंगे, बेनिफिट तो है ही।चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद भी प्रचार का बेनिफिट।
सूत्रों के हवाले से ख़बर है कि गुफा में मोदी की एकांत साधना से कल रात भगवान शिव प्रसन्न हुए और साक्षात प्रकट होकर बोले वत्स तुम्हें क्या वरदान चाहिए??कोई तीन वरदान मांग लो।
मोदी–भगवन! मुझे वरदान में ऐसी शक्ति दीजिये कि मैं कम से कम एक बार रवीश कुमार को इंटरव्यू दे सकूँ।
भगवान–नहीं, तुम ऐसा नहीं कर पाओगे कुछ और मांग लो।
मोदी–अच्छा भगवन मुझे शक्ति दो कि कम से कम एक बार मैं प्रेस कांफ्रेंस में बैठकर पत्रकारों के सवालों का सामना कर पाऊं।
भगवान–बेटा तुमसे ये भी नहीं हो पायेगा।कुछ और बोलो।
मोदी–अच्छा ठीक है फिर मुझे आशीर्वाद दीजिये कि मैं इंटरवियू में राडार, डिजिटल कैमरा, ईमेल वाली मूर्खता दुबारा न करूं।
भगवान–चलिए पुडुचेरी को वनक्कम।
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…
…..
……
और फिर भारत माता की जय बोलकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
हमारे सामने समस्या थी कि उस समय Weather अचानक खराब हो गया था,बहुत बारिश हुई थी,आपको याद होगा।
मैं हैरान हूं कि देश के इतने पंडित लोग मुझे इतनी गालियां देते हैं लेकिन उनका दिमाग यहाँ नहीं चलता है..तो 12 बजे..ये भी मैं पहली बार बोल रहा हूँ, हमारे अफ़सरों को क्या लगेगा (कुटिल हँसी) मुझे मालूम नहीं। एक पल हमारे मन में आया कि इस Weather में हम क्या करेंगे? इतना cloud है जा पाएंगे या नहीं जा पाएंगे तो By in large ये opinion आया experts का कि साहब डेट बदल दें क्या?
मेरे मन मे दो विषय आये एक secrecy अभी तक तो secret रहा है लेकिन अगर secrecy में कुछ looseness आयी तो हम कर ही नहीं सकते, हमें कुछ करना ही नहीं चाहिए।
दूसरा मैंने कहा.मैं…I am not a personally जो इन सारे विज्ञान को जानता हूँ…लेकिन मैंने कहा इतना क्लाउड है, बारिश है..तो एक बेनिफिट है कि हम राडार से बच सकते हैं cloud benefit भी कर सकता है। सब उलझन में थे कि क्या करें then Ultimately मैंने कहा ..ठीक है..क्लाउड है..जाईये …चल पड़े…
यह सारी बातें प्रधानमंत्री मोदी ने न्यूज नेशन को दिए गए अपने इंटरवियू में बालाकोट एयर स्ट्राइक के संदर्भ में कहीं)
इंटरव्यू का यह हिस्सा यहां देखें..
इन सबका एक गंभीर पहलू भी है।अगर देश की एयरफोर्स अपने एक्सपर्ट्स की बातों को नजरअंदाज करके मोदी की हवा-हवाई बातों के आधार पर पाकिस्तान पर हवाई हमलें करने गयी तो यह बेहद दुःखद है क्योंकि सेना ने जानबूझकर केवल मोदी के कहने से अपने पायलट्स की जान खतरें में डाल दी।
प्रधानमंत्री मोदी की ‘एक्सपर्ट्स सलाह’ की वज़ह से हमारा एक पायलट उनके कब्जे में आया। एक मिग-21 दुश्मन ने मार गिराया और एक मिग-21 कथित रूप से उन्होंने गिराया जिसमें 5-6 लोग मारे गए।
पिछले पाँच वर्ष में मोदी-सरकार में क्या काम हुए इस पर पूरे चुनाव-प्रचार में बहस कम ही हो रही है।काम का किसी को करना भी क्या है? पांच साल से मनोरंजन तो ख़ूब हो ही रहा है। इस मनोरंजन के दो फ़ायदे हैं। पहला लोग ख़ूब हँस रहे हैं जिससे उनका स्वास्थ्य अच्छा रह रहा है। दूसरा कॉमेडी के ज़रिए रोजी-रोटी चलाने वालों को जोक लिखने के लिए मशक्क़त नहीं करनी पड़ रही है, रोज़ाना नया माल मिल रहा है।ट्विटर पर क्रिएटिव लोगों ने इस अप्रत्याशित घटना क्रम के ख़ूब मजे लिए।
वरुण ग्रोवर ने अपने शो में एक बार कहा था कि हम लोग जिसे जोक समझते हैं वो अगले ही दिन सच हो जा रहा है और यह सब मोदी और उनके लोगों की वज़ह से ही हो रहा है।
‘गप्पू’ और ‘पप्पू’ दोनों ही नरेंद्र मोदी है।
देश का सौभाग्य है कि मोदी जैसे महान प्रधानमंत्री उसे मिला है।ऐसा प्रधानमंत्री न पहले कभी हुआ है और शायद आगे भी नहीं होगा।
धन्य है!
”मैं पहली बार मतदान करने वालों से कहना चाहता हूं कि क्या आपका पहला वोट वीर जवानों को समर्पित हो सकता है जिन्होंने पाकिस्तान में हवाई हमले किए?क्या आपका पहला वोट पुलवामा के वीर शहीदों के लिए हो सकता है?
प्रधानमंत्री मोदी ने 10 अप्रैल 2019 को महाराष्ट्र के लातूर के एक चुनावी भाषण में यही सब कहा था,जी हाँ देश के सबसे लोकप्रिय नेता और पिछले पांच सालों में विकास की गंगा बहा देने वाले प्रधानमंत्री ने आतंकी हमले में मारे गए जवानों के नाम पर अपने लिए वोट मांगा.
भाजपा राष्ट्रवाद को आगे कर 2019 का चुनाव लड़ रही है।
भाजपा के लोग जानते हैं कि अपनी सहूलियत के हिसाब से बनी पिच पर वो अच्छी बैटिंग करेंगे पर साथ ही भाजपा ने इसके लिए ख़ूब तैयारी भी की है और उनकी चुनावी तैयारी बाकी दलों की तुलना में काफ़ी बेहतर भी रहती है।
जब तक विपक्षी दलों के नेताओं ने AC कमरों में बैठकर चाय-समोसे का आनंद लेते हुए 2019 के चुनाव की योजना बनाना शुरू किया तब तक बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह देश के हर राज्य में घूम चुके थे। चुनाव खत्म होने के बाद 5 साल दूसरे दलों के नेता अपने निजी कामों में लग जाते हैं तो वहीं भाजपा अगले चुनाव की तैयारी शुरू कर देती है।
राज्य के हर लोकसभा, लोकसभा के हर विधानसभा, विधानसभा के हर गांव के जातिगत आंकड़े, वोटरों की कुल संख्या,यहां तक कि भाजपा को मिलने वाले संभावित वोटरों की संख्या का अंदाज़ा लगा लिया जाता है और उसके हिसाब से तैयारी की जाती है।अपने पन्ना प्रमुखों को एक एक वोट अपने पक्ष में दिलवाने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है।
जहां जातिगत आंकड़े पक्ष में नहीं दिख रहे होते हैं वहाँ काफ़ी समय पहले से ही धार्मिक ध्रुवीकरण का रास्ता तलाशना शुरू कर दिया जाता है।
हर छोटे-छोटे कार्यक्रम, सरकार की हर योजना को एक बड़ा इवेंट बना कर लोगों तक पहुंचाया जाता है।सरकार की विफलताओं को भी सफलता बना कर प्रचारित करने का हुनर इनमें है। पैसा तो मानों इनके लिए खेत में उग रहा है, कभी भी उसकी कमी नहीं होती है।
बड़ी-बड़ी जनसभाएं, विदेशों में बड़े-बड़े इंवेंट हर चीज़ इनके लिए संभव है।
2019 चुनाव भी लगभग इसी दिशा में बढ़ता हुआ दिख रहा है।राज्यवार भाजपा ने तैयारी की और अपने लिए एक टारगेट सेट किया है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की भाजपा में नैतिकता, मर्यादा, सच-झूठ सब किनारे वैसे भी ताक पर रख दिये गए हैं, चुनावी जीत अंतिम लक्ष्य है, चाहे वो किसी भी कीमत पर मिले।
उन्हें भी पता है कि चुनाव में जीत जाने पर केवल जीत की ही बात होगी बाकी सब भुला दिया जाएगा।
उत्तर प्रदेश जहां कहा जा रहा है कि सपा-बसपा गठबंधन से भाजपा को काफ़ी नुकसान होगा और भाजपा अपना पिछला प्रदर्शन नहीं दोहरा पाएगी वहाँ तमाम आशंकाओं के बावज़ूद भाजपा अच्छा चुनाव लड़ रही है। सपा-बसपा गठबंधन से बाहर रहकर कांग्रेस भाजपा को पर्याप्त फायदा दे रही है और जहां कांग्रेस के मजबूत उम्मीदवार हैं वहां गठबंधन के लिये ख़तरा पैदा हो रहा है।उदाहरण के लिए फतेहपुर सीकरी, बहराईच, सहारनपुर, मुरादाबाद, कुशीनगर,इलाहाबाद, प्रतापगढ़, बाराबंकी,धौरहरा कुछ ऐसी सीट हैं जहां कांग्रेस तीसरे नंबर पर भी रहकर भी भाजपा को जीतने का मौका दे रही है।
रायबरेली और अमेठी के अलावा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस किसी और सीट से जीत जाए तो यह उसके लिए सफलता ही होगी और इस सफलता का श्रेय प्रियंका गांधी को दे दीजियेगा।
उत्तर प्रदेश के अलावा पूर्व में बंगाल और उड़ीसा में भाजपा धमक के साथ चुनाव लड़ रही है। पिछली बार बंगाल में 2 सीट थी इस बार आंकड़ा बढ़ेगा ही ऐसी उम्मीद जताई जा रही है।यहाँ भाजपा बंगाली, गैर बंगाली और मुस्लिम के बीच की खाई बढ़ा कर चुनाव लड़ रही है। इस सब की तैयारी पिछले बंगाल-विधानसभा से ही शुरू कर दी गयी थी। लेफ्ट-दल बंगाल पर हासिये पर जा चुके हैं इसलिए भाजपा वोट ℅ के मामले में अब नंबर 2 पर जा पहुंची है, सीट कितनी जीत पाएगी वो 23 को ही पता चल पाएगा।
उड़ीसा में बंगाल जैसा माहौल बनाने की कोशिश है यहां बीजेपी नवीन पटनायक के पुराने वर्जस्व को तोड़ रही है।
दक्षिण में कर्नाटक के अलावा भाजपा लिए ज्यादा उम्मीद नहीं है। तमिलनाडु में AIDMK से शुरुआत में समझौता करके गठबंधन के लिए ‘कुछ का’ जुगाड़ कर लिया है। केरल में भाजपा कोई सीट भले ही न जीत पाए लेकिन सबरीमाला मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाकर भाजपाइयों ने वहाँ भी अपने लिए वोट प्रतिशत बढ़ाने का मौका बना लिया है।
पश्चिम वैसे भी बीजेपी का गढ़ रहा है।महाराष्ट्र में उद्धव की गालियाँ खा-खा कर भी अंत में हिन्दू-हिन्दू भाई का नारा लगाकर अपना साथी बना लिया। गुजरात और राजस्थान में पहले जैसा परिणाम लाना भाजपा के लिए चुनौती है।
दिल्ली, हरियाणा जैसे छोटे राज्यों में वोट काटने वाले दलों की बदौलत भाजपा आरामदायक स्थिति में है।
शायद 2019 चुनाव मोदी के लिए ठीकठाक चुनौती वाला होता लेकिन तब पुलवामा हुआ और उसके बाद बालकोट, जिसने सारे जरूरी मुद्दे किनारे कर भाजपा को अपनी पसंदीदा पिच पर खेलने का मौका दे दिया।मोदी अपने किसी भी चुनावी भाषण में नोटबन्दी और जीएसटी की बात नहीं कर रहे हैं,स्किल इंडिया,मेक इन इंडिया, स्मार्ट सिटी ये सब तो बहुत पहले ही खत्म कर दिए गए हैं।
अब पाकिस्तान का सहारा है।
मोदी और शाह की अगुवाई में देश के लोगों को बस यह यकीन दिलाने की कोशिश है कि मोदी के हाथों में ही देश सुरक्षित है, पाकिस्तान को केवल मोदी ही जवाब दे सकता है।
1947 से हमने पाकिस्तान से कई सैन्य लड़ाईयां लड़ी लेकिन कौन सी लड़ाई में वो हमें हरा पाया?
हर मोर्चे पर हमेशा भारत ही तो आगे रहा है।1971 में तो हमारी सेना के साहस के आगे पाकिस्तान दो अलग अलग टुकड़ों में बंट गया और उसने इस क़दर घुटने टेके कि उसके लगभग 90 हज़ार जवानों ने भारत के जनरल के सामने आत्मसमपर्ण तक करना पड़ा। तब मोदी और शाह छोटे थे इसलिए उन्हें यह सब याद नहीं होगा।
भारत को असली खतरा तो चीन से हैं,जो सैन्य ताकत में हमसे ज्यादा ताकतवर है, सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है लेकिन मोदी कभी भी पाकिस्तान की तरह चीन को नहीं धमकाते।ढोकलाम पर भी उनका रवैया ढुलमुल ही था। अपने भाषणों में वो चीन का नाम नहीं लेते हैं क्यों? क्योंकि चीन से उनके राष्ट्रवाद को हवा नहीं मिलेगी। चीन का नाम लेकर वो हिन्दू-मुसलमान नहीं कर पाएंगे। चीन का नाम लेकर वो मंदिर-मस्जिद नहीं कर पाएंगे। चीन का नाम लेकर वो श्मशान-क्रबिस्तान की बात नहीं कर पाएंगे। चीन का नाम लेकर ईद-दिवाली की बात नहीं कर पाएंगे लेकिन पाकिस्तान का नाम लेकर वो ये सब आसानी से कर पा रहे हैं।
देश के लिए पुलवामा एक कलंक है लेकिन भाजपा के लिए यह वरदान साबित हो रहा है।
पुलवामा में आतंकी हमला न हुआ होता तो चुनाव में बीजेपी की स्तिथि भी अच्छी न होती।
20 मई 2014 को पहली बार नरेंद्र दामोदरदास मोदी देश के प्रधानमंत्री के रूप में संसद पहुंचे थे। संसद में दाखिल होते समय उन्होंने संसद की सीढ़ियों पर माथा टेका और हाथ जोड़कर प्रणाम किया था।संसद को उन्होंने मंदिर बताया था और कहा था कि संसद को अपराधियों और दागियों से मुक्त करने के लिए जो भी ज़रूरी कदम उनकी सरकार उठा पाएगी, एक साल के अंदर उठाएगी।
2014 में लोकसभा में पहुंचे सबसे ज्यादा सांसद प्रधानमंत्री मोदी की अपनी पार्टी बीजेपी के थे और सबसे ज्यादा दागियों में भी उन्हीं की पार्टी टॉप पर थी।
2014 के बाद अब 2019 आ चुका हैं। देश में पुनः चुनाव चल रहे हैं और 23 मई तक नई सरकार भी आ जायेगी लेकिन मोदी का वो एक साल कब आएगा किसी को ख़बर नहीं।
मोदी सरकार ने दागी सांसद और विधायकों के केस के जल्दी निवारण के लिए भले ही कुछ न किया हो लेकिन उनके पास एक और मौका तब था जब उनकी पार्टी की केन्द्रीय कार्यसमिति लोकसभा-2019 के लिए प्रत्याशियों का चयन कर रही थी।प्रत्याशी चुनते समय वो दागियों को दूर रख सकते थे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मोदी और उनके पार्टी अध्यक्ष के लिए यह सब केवल भाषण के विषय भर है।
याद रहे जब अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे तब वो स्वंय एक आरोपी थे।गुजरात से उन्हें तड़ीपार किया गया था लेकिन बाद में वो सभी आरोपों से मुक्त हो गए।
2019 लोकसभा चुनाव लगभग खत्म होने को है लेकिन इस बार भी कई दागी अलग-अलग पार्टियों से संसद में पहुंचने की दहलीज पर हैं।तमाम दागियों के बीच भाजपा ने आतंकवाद की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को भी भोपाल से उम्मीदवार बना कर संसद पहुंचने का एक मौका दे दिया है।
संसद में पहले भी कई अलग-अलग पार्टियों से संगीन आरोपों वाले लोग पहुंचे हैं लेकिन अगर प्रज्ञा ठाकुर जीत कर संसद पहुंच जाती है तो शायद भारतीय संसद के इतिहास में पहली बार ऐसा होगा कि बम ब्लास्ट की एक आरोपी माननीय सांसद बन कर वहां बैठी होगी। वैसे भी मोदी जी को ‘पहली बार’ में ज्यादा रुचि रहती है तो उनके नाम पहली बार आतंक की आरोपी को संसद पहुंचाने का नया कीर्तिमान हो जाएगा।इससे भी ज्यादा हास्यस्पद क्या होगा कि प्रधानमंत्री मोदी फिर से उसी संसद की सीढ़ियों को सर झुका कर प्रणाम कर रहे होंगे, जिसमें प्रज्ञा ठाकुर सांसद होगी।
भोपाल से भाजपा प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर जमानत पर रिहा है।अदालत को तय करना है कि वो दोषी है या नहीं।
लेकिन अदालत का फैसला आने से पहले ही देश का प्रधानमंत्री और देश की सबसे बड़ी पॉलिटिकल पार्टी का मुखिया उसे निर्दोष बता रहा है। दोनों अपने चुनावी भाषणों में प्रज्ञा पर पुलसिया जुर्म का आरोप लगा रहे हैं और उस पर अन्याय होने की बात लगातार दोहरा रहे हैं।
जब देश का प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी उसे फैसले से पहले ही निर्दोष मानती है तो अदालत में उसके दोषी ठहराए जाने की कितनी संभावना होगी,यह बड़ा सवाल है। अगर प्रज्ञा ठाकुर जीतकर संसद में पहुंच जाती है तो यक़ीनी तौर पर सरकारी जांच एजेंसी जो केंद्र सरकार के अधीन काम करती है उसको दोषी ठहराने के लिए ठीक से काम नहीं ही करेगी।
2014 से पहले मालेगांव ब्लास्ट मामले में जांच एजेंसियों का रुख़ क्या था और 2014 में भाजपा सरकार आने के बाद अचानक से बिल्कुल विपरीत हो गया। इस पर इंडियन एक्सप्रेस ने सिलसिलेवार पड़ताल की है जिसे यहां पढ़ें।
इन सब से इतर एक और जरुरी बात, कोर्ट का फैसला कभी प्रज्ञा के खिलाफ़ भी आ जाये तब भी भाजपा, संघ और उसकी विचारधारा के समर्थक लोग प्रज्ञा को दोषी नहीं मानेंगे क्योंकि उनके हिसाब से प्रज्ञा का अगर मालेगांव ब्लास्ट में कोई हाथ है तो वो अच्छा ही है।
मालेगांव ब्लास्ट मारे गए लोग हिन्दू नहीं मुसलमान थे इसलिए इन लोगों के हिसाब से यह सब ठीक ही हुआ था। यह देशभर में हुए मुस्लिम आतंकवाद का एक रिएक्शन भर था। हमारे आसपास भाजपा के समर्थक तमाम लोग दबी जुबान से यही मानते हैं। जिन्हें मेरी बात पर थोड़ी सी भी शंका है वो नाथूराम गोडसे को याद कर लें।अदालत द्वारा फांसी की सज़ा दिए जाने के बावजूद गोडसे इनके लिए ‘हुतात्मा गोडसे’ है। गोडसे के किये को सही ठहराने के लिए इनके पास कई मूर्खतापूर्ण दलीलें हैं। गांधी पुण्य तिथि को हर साल देश भर में यही लोग गांधी वध के रूप में मनाते नज़र आते हैं। गोडसे जिनका हीरो है प्रज्ञा ठाकुर उनकी ‘शक्ति स्वरूपा’ बनेगी ही।
दाऊद इब्राहिम भी इनकी नज़र में आतंकवादी नहीं होता बशर्ते वो हिन्दू होता और मुम्बई ब्लास्ट में मरने वाले केवल मुसलमान होते।
गर्मी का मौसम है और देश में चुनावी सरगर्मी बढ़ गयी है। सत्ता में चाहे कोई भी आए लेकिन 23 मई को देश में गर्म हवाएँ अपने उफान पर होंगी। गर्म लू के थपेड़ों के बीच अगर ये तीन नौजवान चुनाव जीत कर लोकसभा में बैठते हैं तो यह किसी शीतल हवा जैसा ही होगा और सत्ता संतुलन के लिए भी सकारात्मक होगा ।
‘आज़ादी’ के इन नारों का मतलब तमाम पुरातनपंथी, सामंतवादी और दमनकारी व्यवथाओं से आज़ादी है। कन्हैया की भाषा में कहूँ, तो भारत से नहीं दोस्तों भारत में आज़ादी चाहिए।
जेएनयू कांड के बाद जब पहली बार कन्हैया जेल से लौटे तब जेएनयू में सैकड़ों छात्रों के बीच जोरदार भाषण दिया और उस ऐतिहासिक भाषण के बाद कन्हैया, आज के कन्हैया बन कर उभरे।इसी भाषण में कन्हैया ने मोदी को निशाने पर लिया और कहा-“प्रधानमंत्री जी अपने भाषण में स्टालिन की बात कर रहे थे मेरी इच्छा हुई कि मैं टीवी मैं घुस जाऊँ और उनसे कहूँ कि थोड़ा हिटलर की बात भी कीजिए थोड़ा मुसोलिनी की भी बात कीजिए जिसकी काली टोपी आप लगाते है।”उनके उस दिन के पूरे भाषण को यहाँ देखें।
कन्हैया की पहचान केवल आज़ादी के नारे ही नहीं हैं उनके पास विचार भी हैं वो अपने बेहतरीन भाषणों के लिए जाने जाते हैं। अपने भाषण में वो शब्दों के सहज चयन, व्यंग्य की तीखी मार के साथ कमाल कर देते हैं। उनके भाषण में प्रवाह है, अतिउत्साह है मगर असावधानी बिल्कुल नहीं है। भाषण में व्यंग्य है, तंज है, हाजिरजवाबी है लेकिन अभद्रता नहीं है। यही बात उन्हें इस दौर के सबसे अच्छे राजनीतिक भाषणबाज़ माने जाने वाले मोदी से अलग बनाती है।
कम्युनिस्ट विचारधारा जो अब केवल बंद कमरे में सिगरेट के धुएं के बीच बोझिल भाषा तक ही सीमित रह गयी है, उसे कन्हैया आगे एक नई दिशा दे सकते हैं।पूरे विपक्ष के पास हिंदी में कोई ऐसा आदमी नहीं है जिसकी रीच हो। कन्हैया के पास धर्म और जाति का बैरियर तोड़ कर सब जनों तक पहुँचने वाली आम भाषा है। सवर्ण वर्ग से आने वाले कन्हैया अंबेडकरवाद की बात करते हैं ।वो वामपंथ के क्रांति के रंग लाल को अंबेडकरवाद के नीले रंग से जोड़ने की बात पुरज़ोर तरीक़े से करते हैं।
कन्हैया की बेगुसराय में लड़ाई बहुत मुश्किल है।लोगों के मन उनके देशद्रोही होने की बात इस क़दर भर दी गयी है कि कुछ लोग उनसे नफ़रत करते हैं।साथ ही उन्हें भाजपा और गठबंधन के उम्मीदवार से भी पार पाना होगा जिनका पूरे क्षेत्र में मजबूत जनाधार है। भाजपा के गिरिराज सिंह और आरजेडी के तनवीर हसन राजनीति के पुराने और बड़े खिलाड़ी हैं।
कन्हैया को अपने लोगों की चुनौती से भी पार पाना होगा।बूढ़े नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टियां क्या एक नए लड़के को सहजता से स्वीकार कर पाएंगी? अंग्रेजियत वाले वामपंथी क्या एक हिंदी भाषी कन्हैया को अपना रोलमॉडल बनने देंगे? कन्हैया नीले और लाल रंग को एक साथ लाने की बात करता है, क्या वामपंथ के भद्रलोग इस पर व्यावहारिक सहमति देंगें ? क्या सारी वामपंथी पार्टियां देश को एकसूत्र में बांधने वाले तिरंगे को लाल झंडे से ऊपर रख पाएंगी? क्या वे जयहिंद बोलने में उसी गर्व का अनुभव कर पाएंगी जो लाल सलाम बोलने में उन्हें होता है? यह सारे सवाल हैं जिनका सामना कन्हैया को हमेशा करना पड़ेगा। मीडिया में उनकी अत्यधिक पॉपुलरटी उनके लिए दिल्ली में तो माहौल बना रही है लेकिन बेगूसराय में उनके लिए यह फ़ायदेमंद होगा इस पर संसय है ।
लड़ाई बहुत मुश्किल ना हो तो लड़ने का मज़ा ही क्या है? सरकार की विफलता और नरेंद्र मोदी की आलोचना को हिंदू विरोधी और देश विरोधी बतला कर प्रचारित किया जाता रहा है। कन्हैया कुमार जो अब तक इन सबका सामना बाहर कर रहे थे, संसद पहुंचेंगे तो इन सवालों पर बहुतों की आवाज़ बनेंगे।
मैं उस कल्पना मात्र से उत्साहित हूं कि कन्हैया संसद के निचले सदन में बैठा हो। उस सदन में, जहां मोदी उनके सामने हो।यक़ीन है कि संसद में कन्हैया के तथ्य और तर्क सबको प्रभावित जरूर करेंगे। २०१४ में हम ये दलील सुनते थे कि नया प्रधानमंत्री बोलता तो है, पिछले प्रधानमंत्री की तरह मौन तो नहीं रहता। यदि बोलने की कला इस देश में राजनीतिक कुशलता का पैमाना है तो क्यों न हम उसे सांसद चुनें, जो हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री से भी बेहतर और कहीं बेहतर बोलता है।
वामपंथ का युवा चेहरा सांसद बनने के बाद क्या करता है वो भी देखना अपने आप में अच्छा होने वाला होगा। कन्हैया ग़रीब घर से आते हैं।उनके भाई असली चौकीदार हैं ।उनकी मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। उनकी डिग्री असली है और अब वो डॉ कन्हैया कुमार हैं जिनकी देश को दरकार है।
नाम-आतिशी
लोकसभा क्षेत्र-पूर्वी दिल्ली
पार्टी-आम आदमी पार्टी
आतिशी मरलेना, कम्युनिस्ट माता-पिता ने मार्क्स+लेनिन के नाम को जोड़कर आतिशी के नाम में मरलेना जोड़ दिया। प्रत्याशी घोषित होने के बाद से ही आतिशी ने अपने नाम से मरलेना हटा लिया।कारण पूछने पर पार्टी के लोग बताते हैं कि ’मरलेना’ सरनेम की वजह से बीजेपी और संघ के लोगों ने उनके खिलाफ गैर हिन्दू होने का अभियान चलाना शुरू कर दिया था उन्हें ईसाई बतलाया जाने लगा। जिसके कारण से नाम से मरलेना हटाना पड़ा।
दिल्ली के सेंट स्टीफन्स कॉलेज से जिस साल आतिशी ने इतिहास में ग्रेजुएशन किया उस साल वो ही यूनिवर्सिटी की टॉपर थी।आगे की पढ़ाई उन्होंने ऑक्स्फ़र्ड से की।आतिशी आम आदमी पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी की सदस्य है और पार्टी की पॉलिसी निर्धारण में भी उनकी महत्वपूर्व भूमिका रहती है।आम आदमी पार्टी के शुरुआत से ही टीवी बहसों में पार्टी का पक्ष रखने वाली आतिशी के व्यक्तित्व में एक दुर्लभ संयम और सौम्यता है।आम आदमी ने भले ही योगेंद यादव को पार्टी से निकाल दिया हो लेकिन आतिशी की चर्चा लेडी योगेंद यादव की तरह ही होती रही है।
आतिशी का महत्वपूर्ण योगदान दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने में रहा है।’आप’ की सरकार आने के बाद दिल्ली के सरकारी विधालयों में हालात बहुत बेहतर हुए जिसकी तारीफ़ दबी ज़ुबान से विरोधी भी करते रहे हैं।भले ही इन सबका श्रेय शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को दिया जाता हो लेकिन बधाई की असली हक़दार आतिशी ही हैं। आतिशी, मनीष सिसोदिया के सलाहकार के तौर पर एक रुपए महीने के सांकेतिक वेतन पर काम कर रही थीं।
सरकारी स्कूल में बड़े स्तर पर टीचर्स-पेरेंट्स मीटिंग हो या हैप्पीनेस क्लासेस का नया आईडिया, सब आतिशी के दिमाग़ की ही उपज था।प्राइमरी स्कूल में इंफ्रास्ट्रक्चर पर क्या-क्या होना चाहिए उसे उन्होंने जाना और कमियों को दूर किया। कुल मिलाकर दिल्ली के सरकारी स्कूलों के हालात पिछले चार सालों में काफ़ी बेहतर हुए जिसका फ़ायदा पढ़ने वाले बच्चों और उनके अभिवावकों को भी हुआ। पहली बार देश में किसी सरकार ने अपने बजट का बड़ा हिस्सा शिक्षा को अलॉट किया और इसका सदुपयोग आतिशी और टीम ने बेख़ूबी किया।
पूर्वी दिल्ली से आतिशी की लड़ाई मुश्किल है।फ़िलहाल भाजपा और कोंग्रेस ने अपने उम्मीदवार नहीं घोषित किए हैं। आतिशी कई महीनों से प्रचार कर रही हैं जिसका फ़ायदा उन्हें हो सकता है लेकिन आख़िरी मौक़े पर वोटों के बिखराव का सीधा फ़ायदा भाजपा उठा सकती है।
आतिशी पढ़ी लिखी हैं। आतिशी हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में पकड़ रखती हैं। किसी राजनीतिक घराने से नहीं आती हैं।इतिहास की पढ़ाई की है और घर के माहौल के कारण उनके पास एक विचारधारा भी है।उनकी भाषा में किसी और राजनीतिक महिला की तरह अतिउत्साह जैसी बात भी नहीं है।सरल, सौम्य और यूँ कहूँ कि भाषाई मिठास वाली आतिशी अगर संसद में पहुँचेंगी तो न केवल अपनी पार्टी के लिए मददगार साबित होगी बल्कि अपने क्षेत्र के लिए भी कुछ नया और अच्छा कर पाएँगी। जब संसद में किसी एक महिला सांसद की बात आती है तो आतिशी एक सशक्त चेहरा नज़र आती हैं।
नाम-इमरान प्रतापगढ़ी
लोकसभा क्षेत्र-मुरादाबाद(उत्तर प्रदेश)
पार्टी-कांग्रेस
“प्यार की बड़ी इससे और मिसाल क्या होगी,
हम नमाज़ पढ़ते हैं गंगा में वज़ू करके…”
शायर, दोस्त, नौजवान और मजलूमों के मददग़ार इमरान प्रतापगढ़ी वैसे तो प्रतापगढ़ से हैं लेकिन चुनाव मुरादाबाद से लड़ रहे हैं।
जब लोग शायरी का मतलब महबूब की जुल्फ़े, आँचल, उसकी नीली आंखे, चांद-तारे और इश्क़ ही समझते हो तब इमरान प्रतापगढ़ी ने शायरी को एक नया मुक़ाम दिया और सामाजिक मुद्दों को अपनी शायरी के ज़रिए लोगों के बीच पहुँचाया। अपनी पहचान एक विद्रोही शायर के रूप बमें बनायी। इमरान ख़ुद कहते हैं कि वो ग़ालिब नहीं हबीब के वंशज हैं। इमरान ऐसा शायर हैं जो अपनी कलम के सहारे संघ और उसकी विचारधारा से लड़ता दिखता है।
समसामयिक मुद्दे पर इमरान त्वरित बात कह देते हैं।मोदी और उनके चेलों की खिंचाई करते हैं। हाज़िरजवाबी हैं, अच्छे वक्ता हैं।हिन्दू और उर्दू दोनों का बख़ूबी इस्तेमाल करते हैं।रामचरितमानस की चौपाइयां सुनाते हैं ।हिन्दू और मुसलमान दोनों के बीच लोकप्रिय हैं। जिस मुशायरे में उनका नाम होता है, भीड़ काफ़ी जुटती है।
शायर इमरान मज़लूम लोगों की मदद में भी आगे बढ़ते हैं।जेएनयू के गायब छात्र नजीब पर इमरान ने नज़्म पढ़ी और नज़ीब की माँ के दर्द को लोगों से कुछ यूँ साझा किया।
“सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली,
समंदर सी ख़ामोश गहरी है दिल्ली
मगर एक मॉं की सदा सुन ना पाये,
तो लगता है गूँगी है बहरी है दिल्ली
वो ऑंखों में अश्कों का दरिया समेटे,
वो उम्मीद का इक नज़रिया समेटे
यहॉं कह रही है वहॉं कह रही है,
तड़प करके ये एक मॉं कह रही है
नहीं पूछता हो कोई हाल मेरा
कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा”
पुलवामा हमले में उत्तरप्रदेश से शहीद सीआरपीएफ के जवान अवधेश के घर इमरान पहुंचे और अपनी ओर से परिवार को आर्थिक मदद की।मॉब लिंचिंग का शिकार हुए जुनैद, पहलू खान के परिवार की आर्थिक मदद की।मुसलमानों पर हो रहे लगातार हमले के विरोध में इमरान ने अपनी टीम के साथ दिल्ली के जंतर मंतर पर रक्तदान का कार्यक्रम किया जिसमें देश भर से लोग शरीक हुए।
इमरान लगातार अपने मुशायरें में कहते रहें हैं कि आज के हालात बहुत बुरे हैं। आने वाले दिनों के इरादे भी अच्छे नहीं लगते हैं। आपसी भाईचारा ख़तरे में है।नफ़रती ताकतों की देश में हुक़ूमत है। इन नफ़रत फैलाने वालों की संख्या बहुत कम है। ये सिर्फ़ चीखते और चिल्लाते हैं। अगर हम अमन पसंद लोगों को इकठ्ठा करने में कामयाब रहें तो कामयाबी मिल सकती है। समाज में अमन और शांति लाने का यही एक रास्ता है।
‘राह में ख़तरे भी हैं, लेकिन ठहरता कौन है,
मौत कल आती है, आज आ जाये डरता कौन है !
तेरी लश्कर के मुक़ाबिल मैं अकेला हूँ मैं मगर,
फ़ैसला मैदान में होगा कि मरता कौन है !’
मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी के शहर मुरादाबाद से शायर इमरान की चुनावी लड़ाई आसान बिलकुल नहीं हैं। मुक़ाबले में भाजपा के कुँवर सर्वेश और गठबंधन के डॉक्टर एसटी हसन हैं। दोनों मुरादाबाद के पुराने और चर्चित चेहरे हैं और इमरान मुरादाबाद के लिए नए हैं।वोटों का बिखराव यहाँ भाजपा को फ़ायदा पहुँचा दे इसका भी डर है।
लेकिन उम्मीद पर तो दुनिया क़ायम हैं। 2014 में मोदी लहर के बीच उत्तर प्रदेश से बीजेपी को उम्मीद से भी बेहतर सफलता मिली जिसके कारण एक भी मुस्लिम चेहरा संसद नहीं पहुंचा।इसलिए इस बार मुरादाबाद से एक मुसलमान चेहरा संसद पहुंचना चाहिए। सोने पर सुहागा हो, अगर वह मुसलमान नौजवान हो और इमरान हो।