
हमारे-तुम्हारे मन को युद्धरत और क़बीलाई बना देंगे, यही ख़ुदगर्ज़ मंसूबे हैं, सियासत के खेल अजूबे हैं।
चुनाव करीब है और कुछ लोग सेना जैसी दिखने वाली वर्दी पहनकर वोट मांगने निकले हैं। सत्ता का लालच देश के विचार से आगे बढ़ गया है। भारत पाकिस्तान के बहाने देशभक्त और देशद्रोह के प्रमाण पत्र बांटे जा रहे हैं। झूठ का ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि सच भी झूठा नज़र आने लगा है। तथ्य को पीछे छिपा दिया गया है और झूठ ख़ुद को देशभक्त बतलाकर सच को बेशर्मी से चिढ़ा रहा है।
सत्ता का यह दौर—जहाँ झूठ खुद को ‘देशभक्त’ और सच को ‘देशद्रोही’ कहकर आईने को धिक्कार देता है—अब संस्थाओं को नेस्तनाबूद करने की फेहरिस्त में सेना को आख़िरी मोहरा बना देना चाहता है।
एक-एक संस्था को ऐसे कुचला गया है जैसे यह देश नहीं, कोई कंपनी हो, और संस्थाएं बस ‘डिपार्टमेंट्स’ जिन्हें बंद या बदला जा सकता है।
देखिए एक-एक संस्थान का हाल:-

केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI)—‘तोते’ का गला भी घोंट दिया गया
फरवरी 2017 में आलोक वर्मा सीबीआई के प्रमुख नियुक्त किए गए। सीबीआई डायरेक्टर बनने से पहले वर्मा दिल्ली के पुलिस कमिश्नर, दिल्ली में जेलों के डीजीपी, मिज़ोरम के डीजीपी, पुडुचेरी के डीजीपी और अंडमान-निकोबार के आईजी थे। आलोक वर्मा सीबीआई के पहले निदेशक थे जिनके पास इस जांच एजेंसी का कोई अनुभव नहीं रहा था बावजूद इसके उन्हें चीफ़ बनाया गया। उनकी नियुकि से पहले राकेश अस्थाना को सीबीआई का स्पेशल डायरेक्टर नियुक्त किया गया था। राकेश अस्थाना वर्ष 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और स्पेशल डायरेक्टर बनने से पहले सीबीआई में कई भूमिकाओं में काम कर चुके थे।अस्थाना ने कई अहम मुक़दमों की जांच की थी जिनमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का चारा घोटाला भी शामिल था। गोधरा में ट्रेन जलाने की एसाआईटी जांच भी अस्थाना ने की थी इसलिए मोदी और शाह के पसंद के व्यक्ति थे। इनकी नियुक्ति भी विवादित थी क्योंकि इन्हें सीबीआई के नंबर दो अधिकारी आरके दत्ता के ऊपर वरीयता दी गयी थी।
जब आलोक वर्मा सीबीआई चीफ बने तो उन्होंने राकेश अस्थाना की नियुक्ति का न केवल विरोध किया बल्कि कई संगीन आरोप लगाये। जवाब में अस्थाना ने भी आलोक वर्मा पर घूस लेने का आरोप लगाया। हवाला और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में मीट कारोबारी मोईन क़ुरैशी को क्लीनचिट देने में कथित तौर पर घूस लेने के आरोप में सीबीआई ने अपने ही विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज किया। अस्थाना पर आरोप लगा कि उन्होंने मोईन क़ुरैशी मामले में हैदराबाद के एक व्यापारी से दो बिचौलियों के ज़रिये पांच करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी। जिसके बाद राकेश अस्थाना ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर भी इस मामले में आरोपी को बचाने के लिए दो करोड़ रुपये की घूस लेने का आरोप लगाया।दोनों अफसरों के बीच मची रार सार्वजनिक हो गई तो केंद्र सरकार ने दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया, साथ ही अस्थाना के ख़िलाफ़ जांच कर रहे 13 सीबीआई अफसरों का भी तबादला कर दिया गया।आलोक वर्मा सुप्रीम कोर्ट में गए जहां से उन्हें वापस सीबीआई में भेजा गया लेकिन सरकार ने उसी दिन उनका ट्रांसफर फायर सेफ्टी विभाग में कर दिया जिसके बाद उन्होंने स्वेच्छा से रिटायरमेन्ट ले लिया।
सीबीआई की ऐसी दशा पहली बार हुई जहां नंबर एक और दो की लड़ाई हुई और सरकार ने अपनी पसंद वाले को बचाने का भरपूर प्रयास किया।

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)—-
सरकार और आरबीआई के बीच विवाद इसलिए शुरु हुआ क्योंकि सरकार आरबीआई के कोष से 3.5 लाख करोड़ रुपये चाहती थी। शुरु में सरकार ने इस मसले पर आक्रामक रवैया अपनाया, यहां तक कि उसने आरबीआई एक्ट की धारा 7 तक के इस्तेमाल की सोच डाली।इस धारा का इस्तेमाल कर सरकार रिजर्व बैंक को निर्देश दे सकती है लेकिन रिजर्व बैंक के 83 साल के इतिहास में किसी भी सरकार ने इसका इस्तेमाल नहीं किया था। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने यह चेतावनी भी दे दी कि सरकार द्वारा आरबीआई की स्वायत्तता को कमज़ोर करना विनाशकारी हो सकता है। लेकिन सरकार अपने रुख़ पर कायम रही। परिणाम यह हुआ कि 61 सालों के इतिहास में पहली बार आरबीआई के गवर्नर ने इस तरह से इस्तीफा दे दिया।
इस्तीफा देने के बाद न ही उन्होंने प्रधानमंत्री और न ही वित्त मंत्री का धन्यवाद किया। उर्जित पटेल के इस्तीफा देने के बाद सरकार ने शशिकांत दास को नया गवर्नर नियुक्त किया जिनकी शिक्षा इतिहास विषय में हुई थी।

केन्द्रीय सतर्कता आयोग (CVC)—
मोदी सरकार ने केवी चौधरी को भारत का अगला सीवीसी नियुक्त किया गया। चौधरी काले धन के मामले में गठित विशेष जांच दल के सलाहकार भी थे।सीवीसी का पद परंपरागत तौर से किसी पूर्व आईएएस को ही मिलता रहा है लेकिन यह पहली बार ही हुआ जब किसी गैर-आईएएस को इस पद पर नियुक्त किया गया। इसके अलावा चौधरी पर कई आरोप भी थे।आरोप था कि चौधरी ने हवाला कारोबारी मोईन कुरैशी को क्लीन-चिट देकर पूर्व सीबीआई डायरेक्टर रंजीत सिन्हा की मुश्किलें आसान कीं, उधर सिन्हा ने उन्हें ‘स्टॉक-गुरु’ घोटाले से आरोपमुक्त कर दिया.
इसके अलावा भी चौधरी पर केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड का चीफ रहते हुए अपने पद का दुरुपयोग करने था अपराधियों को लाभ पहुंचाने के कई आरोप प्रसिद्ध वकील रामजेठमलानी और प्रशांत भूषण ने लगाए थे।

केंद्रीय सूचना आयोग (CIC)—-
केंद्रीय सूचना आयोग में लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने के लिए 20 दिसंबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में चयन समिति की हुई बैठक में चार लोगों को सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त करने की सिफारिश की गई थी। इसके बाद 1 जनवरी, 2019 को सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त होने वालों में पूर्व आईएफएस अधिकारी यशवर्द्धन कुमार सिन्हा, पूर्व आईएएस अधिकारी नीरज कुमार गुप्ता, पूर्व आईआरएस अधिकारी वनजा एन. सरना और पूर्व विधि सचिव सुरेश चंद्रा शामिल थे।
लेकिन आरोप लगा कि केंद्र की मोदी सरकार ने सुरेश चन्द्रा को बिना आवेदन किए ही नियुक्त कर दिया।कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) द्वारा वेबसाइट पर अपलोड की गई नियुक्ति की फाइलों से भी खुलासा हुआ है कि सुरेश चंद्रा ने इस पद के लिए आवेदन ही नहीं किया था। बाद में सुरेश चन्द्रा ने भी स्वीकार किया था कि उन्होंने इस पद के लिए आवेदन नहीं किया था। ध्यान देने वाली बात यह थी कि सुरेश चंद्रा वित्त मंत्री अरुण जेटली के निजी सचिव रह चुके थे और सूचना आयुक्त को चुनने वाली कमेटी में अरुण जेटली सदस्य भी थे।
भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान (FTII)—
फिल्म इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया जो कि पुणे में स्तिथ है में टेलीविजन कलाकार गजेन्द्र सिंह चौहान को सरकार ने नियुक्त किया जिनकी नियुक्ति को लेकर कई दिनों तक इंस्टीट्यूट में हंगामा होता रहा। इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षण ले रहे छात्र−छात्राएं हड़ताल पर चले गए।भाजपा और सरकार के लोगों ने हड़ताल कर रहे छात्र-छात्राओं को देशद्रोही तक बतला दिया.कई महीनों तक चले धरने, प्रदर्शन और प्रशिक्षण के बहिष्कार के बाद आखिरकार केंद्र सरकार को चौहान को हटाकर अभिनेता अनुपम खेर को अध्यक्ष नियुक्त करना पड़ा। फिलहाल खेर ने भी अपनी व्यस्तता के चलते इस्तीफा दे दिया है।

केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC)—-
यह संस्था भी केंद्र सरकार की वजह से विवादों में रही।केंद्र सरकार ने पहलाज निहलानी को इसका चेयरमैन नियुक्त किया। निहलानी जबरदस्त विवादों में घिर गए। निहलानी पर अनावश्यक रूप से फिल्मों को पास करने में अड़ंगे लगाए जाने के आरोप लगे।साथ ही निहलानी अपने स्तरहीन बयानों के लिए सरकार की किरकिरी कराने लगे। उनके कामकाज से खफा होकर फिल्म इंडस्ट्री में भी व्यापक असंतोष रहा।केंद्र सरकार पर बोर्ड के जरिए छिपे हुए एजेंडे के अनुरूप काम करने के आरोप लगे। सरकार की ज्यादा किरकिरी होने पर निहलानी को रूखसत होना पड़ा और फिर भाजपा के चुनावी गीत लिखने वाले गीतकार प्रसून जोशी की एंट्री हुई और उन्हें बोर्ड का नया चेयरमैन नियुक्त किया गया।

लोकपाल (Lokpal)—
लोकपाल तो याद ही होगा।हो सकता है हाथ में तिरंगा लेकर, सफेद टोपी पहनकर आप और हम इस आंदोलन का हिस्सा रहे हों। कांग्रेस सरकार ने जाते-जाते भारी दवाब में लोकपाल कानून संसद में पास कर दिया जिसे विपक्षी पार्टी भाजपा ने भी पूरा समर्थन दिया था। अब भाजपा सरकार में हैं और कार्यकाल खत्म होने को है लेकिन लोकपाल का अता पता नहीं है।सुप्रीम कोर्ट के दवाब के बाद सरकार ने 28 सितंबर 2018 को लोकपाल अध्यक्ष और उसके सदस्यों के नामों की सिफारिश करने के लिए आठ सदस्यीय एक समिति बनायी थी। समिति की अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई थी। लेकिन अभी तक इस पर कुछ फाइनल नहीं हो सका है।

चुनाव आयोग (ECI)—
2018 में चुनाव आयोग के मुखिया बने एके जोति.ल।
एके जोती गुजरात कैडर के अधिकारी रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी के भरोसेमंद अधिकारी माने जाते थे।
केंद्र सरकार ने राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग को कहीं ज़्यादा पारदर्शी बनाने के लिए जिस इलेक्ट्रॉल बांड्स का प्रस्ताव रखा था, उससे 2017 में चुनाव आयोग सहमत नहीं हुआ था लेकिन 2018 में मुख्य चुनाव आयुक्त एके जोती ने इस प्रस्ताव को सही दिशा का क़दम बताया।
08 अक्तूबर, 2018 को चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा वाली प्रेस कांफ्रेंस को तीन घंटे के लिए टाल दिया था।पहले पत्रकारों को साढ़े बारह बजे प्रेस कांफ्रेंस के लिए बुलाया गया था बाद में ये समय साढ़े तीन बजे किया गया।इस बीच दोपहर के एक बजे राजस्थान के अजमेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक रैली को संबोधित करना था। आरोप लगा कि चुनाव आयोग ने समय इसलिए बदला ताकि प्रधानमंत्री की रैली पर अचार संहिता लागू नहीं हो।
मीडिया —-खंभा नहीं, खोमचा बन गया है
भारत में मीडिया लगभग प्राइवेट हाथों में ही है।इसे लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में चौथा खम्भा, खम्भा नहीं बल्कि खोमचा बन गया।इस खोमचे में काम करने वाले पत्रकार भी इस पतन के लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं जितने खोमचे के मालिक. आज मीडिया पर बिक जाने के आरोप हैं। समूल्य खबर दिखाने एवं छापने के आरोप हैं। चुनिंदा ख़बरों को छुपाने के आरोप हैं।दलगत पक्षपात के आरोप हैं। ये वही सब आरोप हैं जो एक भ्रष्ट दलाल पर होते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि मीडिया मुंहजोर और बेशरम हो चुका है। अपराधी को बेगुनाह और बेगुनाह को अपराधी बनाने में लगा हुआ है।
याद कीजिये, यही मीडिया कांग्रेस सरकार के समय सरकार से सवाल करती थी लेकिन मोदी सरकार में विपक्ष से सवाल किया जा रहा है।जो मीडिया संस्थान या पत्रकार सवाल करने की हिम्मत जुटा पाते हैं उन्हें धमकियां मिल रही हैं, गालिया मिल रही हैं,उन्हें चैनल्स से निकलवा दिया जा रहा है।संस्थानों पर सरकारी छापे डाले जा रहे हैं।इस दौर में मीडिया का जितना पतन हुआ शायद ही कभी हुआ हो।

इतनी संस्थाओं को लोकतांत्रिक मूल्यों से तो डिगा ही दिया है हमारे प्रिय प्रधानमंत्री ने. बस सेना को बख़्श दीजिए. हिंदुस्तान और पाकिस्तान के निज़ाम में बुनियादी अंतर यही है कि हमारे यहां सेना सत्ता के खेल में साझेदार नहीं रही है. बख़्श दीजिए प्लीज़!






