रेशम की साड़ी, फौलाद का हौसला जब इंदिरा ने इतिहास को अपनी मुट्ठी में मोड़ लिया।
वो सर्द वाशिंगटन शाम थी। व्हाइट हाउस की झिलमिल रोशनी के बीच जब इंदिरा गांधी ने रेशमी साड़ी के आँचल में आत्मसम्मान लपेटा और अपने देश की गरिमा को ओढ़ लिया तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह वही स्त्री है जो कुछ वर्षों में एक भूगोल बदल देगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने विनम्रता से झुककर पूछा-
“क्या आप मेरे साथ डांस करेंगी?”
इंदिरा ने बिना एक लय हिले मुस्कराकर कहा–
“मुझे क्षमा कीजिए, मेरे देशवासी मुझे आपके साथ थिरकता देखना पसंद नहीं करेंगे।”
उस एक वाक्य में वर्षों की सभ्यता, एक राष्ट्र का स्वाभिमान और एक स्त्री की चुप्पी में छुपा शौर्य बोल उठा।
इंदिरा गांधी, राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन और उनकी पत्नी क्लॉडिअ टेलर जॉनसन (साल 1966)अमेरिकन राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन के साथ इंदिरा गांधी (साल 1968)
फिर आया रिचर्ड निक्सन, अमेरिका का अगला राष्ट्रपति। मगर ये आगमन राजनयिक नहीं था बल्कि वैमनस्य का एक अध्याय था। निक्सन ने इंदिरा को “चुड़ैल” कहा, भारतीयों को “बेवजह उलझाऊ”, और पाकिस्तानियों को “भोले मगर सच्चे” बताया। वो तानाशाह याह्या ख़ान के स्नेह में डूबे थे, और भारत से उन्हें चिढ़ थी।
इंदिरा गांधी से पहली बार मिलने भारत आए निक्सन और इंदिरा ने हँसते हुए हिंदी में अपने राजदूत से पूछा-
“कितनी देर और झेलना है इस आदमी को?”
राजनीति में यह बोरियत नहीं, भविष्य की ललकार थी।
फिर आया साल 1971। इतिहास की वह रात जब ढाका के घरों में मातम पसरा था, गंगा के घाट तक पीड़ा की गूँज पहुँची थी। पूर्वी पाकिस्तान चीख रहा था और इंदिरा सुन रही थीं….. एक माँ की तरह, एक सिपाही की तरह।
भारत ने बंगाल देश की लड़ाई लड़ रही मुक्तिवाहिनी को छाया दी प्रशिक्षण दिया और एक मौन युद्ध की शुरुआत कर दी।
निक्सन ने धमकी दी, हेनरी किसिंजर को भेजा। हेनरी ने गालियों में लिपटी कूटनीति से भारत को डराना चाहा।
मगर इंदिरा ने सुन लिया, सह लिया पर झुकी नहीं।
वो सोवियत संघ गईं । वहाँ से सहमति की लाल मशाल लेकर लौटीं। अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर बोलीं-
“हम शांति चाहते हैं मगर शर्तों पर नहीं।”
हेनरी किसिंजर के साथ इंदिरा गांधी की मुलाक़ात
नवंबर 1971 में इंदिरा गांधी ने एक बार फिर अमेरिका की धरती पर कदम रखा। अब न रेशमी मुस्कान थी, न राजनयिक झुकाव , बस थी तो केवल देश की रगों में बहती चेतना। उन्होंने एक सभा में निक्सन को आईना दिखाया। निक्सन ने बदले में उन्हें घंटों इंतज़ार करवाया।
प्रेसिडेंट निक्सन उनकी पत्नी और इंदिरा गांधी वाइट हाउस में एक इवेंट के दौरान (4 नवंबर 1971)
पर इंदिरा वक़्त से बड़ी हो चुकी थीं। वो धैर्य से बैठीं रही और सही वक्त का इंतज़ार किया। फिर वही कहा जो इतिहास को सुनना था।
इंदिरा गांधी और रिचर्ड निक्सन स्वागत समारोह में (1971)
दिसंबर की ठंडी हवा जब सरहदों पर बमों की गर्मी लेकर आई, तब भारत की सेना पूर्वी मोर्चे पर गरज रही थी। अमेरिका ने भारत को रोकने के लिए सातवाँ बेड़ा भेजा। समुद्र कांपा, पर इंदिरा नहीं। चीन ने आँखें दिखाई। हिमालय साक्षी रहा, पर इंदिरा नहीं डिगीं।
और फिर वो तारीख आयी…16 दिसंबर 1971….-ढाका के रेसकोर्स मैदान में इतिहास ने करवट ली।93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया और जन्मा एक नया देश बांग्लादेश।
एक माँ के संकल्प से निकला राष्ट्र और एक औरत की जिद से बदला नक्शा।
लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने पाकिस्तानी जनरल नियाज़ी इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ सरेंडर पर साइन करते हुए (16 दिसम्बर 1971)
भारतीय सेना के जनरल मानेकशॉ मुस्कराए और बोले—
“याह्या कभी मुझसे मेरी बाइक खरीदकर पैसे नहीं चुकाए, आज उसने आधा देश लौटा दिया है शायद उधार चुका रहा है।”
जनरल सैम मानेकशॉ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ
इंदिरा गांधी… न तो युद्ध की देवी थीं, न राजनीति की कठपुतली। वो एक संकल्प थीं जो नारी देह में जन्मा था और राष्ट्र की आत्मा में रम गया था।रेशमी साड़ी पहनकर, युद्ध का नक्शा बदलकर।जब इतिहास गूंगा हो जाता है, तो कुछ स्त्रियाँ उसे बोलना सिखाती हैं।
युद्ध जितनी ऊंचाई पर लड़े जाएं, उतने मुश्किल होते हैं. लेह साढ़े 11 हज़ार की ऊंचाई पर है लेकिन आप सावधानी न रखें, थोड़ा भी दौड़-भाग लें तो शरीर में ऑक्सीजन का लेवल गिर जाता है और Altitude sickness की दवाइयां खानी पड़ती हैं.
अब लेह से दोगुनी ऊंचाई की कल्पना कीजिए. 21 हज़ार फीट. आज आपको ऐसे मिलिट्री ऑपरेशन के बारे में बताता हूं जो 21 हज़ार फीट की ऊंचाई पर लड़ा गया था. वो भारत ही नहीं, शायद दुनिया भर में सबसे ज़्यादा ऊंचाई पर लड़ी गई जंग थी और उस जंग का नायक था- सरदार बाना सिंह.
सरदार बाना सिंह के अदम्य साहस पर बात करने से पहले इस ऑपरेशन का बैकग्राउंड समझिए. कैसे इस लड़ाई की भूमिका तैयार हुई?
बात सियाचिन से जुड़ी है. सियाचिन का अर्थ होता है-गुलाबों की भरमार लेकिन सियाचिन के सन्दर्भ में गुलाब की सुगंध कम, काँटों की चुभन ज्यादा रही है. हज़ारों फ़ुट ऊँचे सफ़ेद पहाड़, दूर-दूर तक न कोई पशु- पक्षी, न कोई इंसान. बर्फ इतनी कि रहना, खाना सब दूभर. जब कभी धूप खिले तो उससे आँखें चौधियाने का खतरा. किसी ने सियाचिन को कुछ यूँ परिभाषित किया है–
सुदुर्गम दूर देश,पथ शून्य,तरु शून्य प्रांतर अशेष महापिपासा रंगभूमि.
1947 के बाद से भारत की सेना ने कई लड़ाइयाँ लड़ीं. कुछ लड़ाइयाँ आमने-सामने की थीं तो कुछ ऐसे मौक़े भी आए जब गुरिल्ला वार करना पड़ा. दोनों ही सूरतों में रणनीति अहम थी. आज़ाद भारत के इतिहास में कई ऐसे मौके आये जब हमारी सटीक रणनीति ने दुश्मन को हैरान कर दिया.
ये ऐसे ही एक मौके की कहानी है….
RAW ने झंडे गाड़ दिए
कहानी शुरू होती है 1980 में, कश्मीर के गुलमर्ग से. गुलमर्ग में हाई अल्टीट्यूड वॉरफेयर स्कूल है जहां सेना के जवानों को पहाड़ चढ़ने और पहाड़ी इलाकों में जंग लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है. उन दिनों इस स्कूल के प्रभारी थे कर्नल नरेंद्र कुमार ‘बुल’. कर्नल कुमार खुद भी पर्वतारोही मिशन पर जाते रहते थे. एक ऐसे ही मिशन के दौरान उनकी मुलाक़ात जर्मनी के एक पर्वतारोही से हुई, उसने उन्हें नॉर्थ कश्मीर का नक्शा दिखलाया जिसमें सियाचिन को पाकिस्तान के हिस्से में दिखाया गया था. कर्नल कुमार चाहते तो इसे नज़रअंदाज कर सकते थे लेकिन उन्होंने तत्काल इसकी जानकारी डायरेक्टर जनरल ऑफ़ मिलिट्री ऑपरेशन तक पहुंचाई.
फाइल फोटो: नरेंद्र कुमार ‘बुल’.
इस जानकारी का बड़ा फायदा हुआ. 1971 की जंग में पाकिस्तान जबरदस्त तरीके से शिकस्त खा चुका था. पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश नया मुल्क बन चुका था. पाकिस्तान की हार बड़ी थी. ज़ख्म बड़े थे. ज़ख्म भरने के लिए पाकिस्तान कुछ बड़ा करना चाहता था. कर्नल कुमार को मिली जानकारी से अब इस ‘बड़ी योजना’ का अंदेशा हो चुका था.
इसी बीच भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसी (RAW) को ख़बर मिली कि लंदन की एक कम्पनी जिससे भारतीय सेना अपने सैनिकों के लिए बर्फीले इलाकों वाले कपड़े और पीपीई किट लेती है उसी कम्पनी से पाकिस्तान भी अपने सैनिकों के लिए कपड़े और किट खरीद रहा है.एजेंसी के लोगों के बीच स्पष्ट सन्देश था-“Pakistanis were not buying snow clothing for picnic.” यानी पाकिस्तानी पिकनिक मनाने के लिए बर्फ में पहने जाने वाले कपड़े नहीं ख़रीद रहे.
साल 1983 में एजेंसी को एक और बड़ी कामयाबी मिली. उसे मालूम हुआ कि पाकिस्तान ने ‘बर्जिल फोर्सेज’ के नाम से एक टुकड़ी तैयार की है जिसे सियाचिन पर कब्जे की ट्रेनिंग दी जा रही है. इस इनपुट की डिटेल में खोजबीन करने पर एजेंसी को एक चौंकाने वाली बात मालूम हुई. ख़बर थी कि पाकिस्तान की सेना ने सियाचिन ग्लेशियर पर कब्ज़े की कोशिश के लिए दिन मुक़र्रर कर लिया है और वो दिन होगा -17 अप्रैल 1984.
भारतीय सेना का ऑपरेशन मेघदूत
सियाचिन पर भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी का इनपुट एक बड़ी कामयाबी थी लेकिन इतने भर से काम नहीं चलने वाला था. एजेंसी ने अपना काम कर दिया था अब बारी भारतीय सेना की थी. सियाचिन पर भारत का कब्जा सामरिक नज़रिये से बहुत ज़रूरी था. सियाचिन पर फतह आसान बिलकुल नहीं था. बर्फीले पहाड़ जहां पारा माइनस 40 डिग्री तक चला जाता हो, वहाँ पहुंचना, सर्वाइव करना और जंग लड़ना नामुमकिन लगता था. भारतीय सेना इसे मुमकिन कर दिखाने को तैयार थी.
समय कम था. काम मुश्किल था. इस मुश्किल काम की जिम्मेदारी दी गई लेफ्टिनेंट जनरल प्रेम नाथ हून को जो रणनीति बनाने में माहिर थे. तय हुआ कि पाकिस्तान की सेना के सियाचिन पहुँचने से चार दिन पहले यानी 13 अप्रैल को भारतीय सेना ग्लेशियर को अपने कब्जे में लेगी. उस दिन बैसाखी का त्यौहार होगा और पाकिस्तान की सेना को अंदेशा भी नहीं होगा कि भारत ऐसा कुछ कर सकता है.
लेफ्टिनेंट जनरल प्रेम नाथ हून
सियाचिन भारत के लिए क्यों ज़रूरी था?
1949 में भारत-पाकिस्तान के बीच कराची एग्रीमेंट हुआ था. इस एग्रीमेंट में सियाचिन के इलाक़े के पास कोई सीमा रेखा नहीं खींची गई थी. इस इलाके में भारत का आखिरी पॉइंट NJ9842 कहलाता था. बाद में शिमला समझौते में भी NJ9842 से आगे की सीमा पर चर्चा नहीं हुई. ग्लेशियर से भरे इस इलाके में न आबादी थी और न ही यहाँ पहुंचना आसान था लेकिन दुश्मन की निगरानी के लिए यह जगह भारत के लिए बहुत ज़रूरी थी. पाकिस्तान भलीभाँति जानता था कि अगर वो इस बर्फ़ीले पहाड़ पर पहुँच जाएगा तो भविष्य में इस इलाक़े में उसका पलड़ा भारी हो सकता है.
भारत के लिए सियाचिन पर कब्जा बरक़रार रखना, पाकिस्तान और चीन दोनों की निगरानी के लिए ज़रूरी था.
सियाचिन पर भारतीय सेना की फ़तह
जनरल हून के नेतृत्व में ऑपरेशन शुरू होता है. लक्ष्य बिल्कुल साफ़ था कि किसी भी हालत में सियाचिन की चोटियों पर भारत का तिरंगा फहराना है.
सबसे पहले कुमाऊं रेजिमेंट और लद्दाख स्काउट्स की यूनिट्स आगे बढ़ती हैं. इन्हें ऐसे बढ़ना था ताकि उनकी आहट तक दुश्मन न सुन सके. इसलिए आर्मी की ये यूनिट्स पैदल ही आगे बढ़ती हैं. भूगोल के लिहाज़ से हालात पहले से ही विकट थे, ऊपर से पैदल चलने की चुनौती थी लेकिन जवान बढ़ते चले गए. कैप्टन संजय कुलकर्णी की अगुवाई में एक यूनिट को बिलाफोंड ला पर क़ब्ज़े का काम दिया गया. उनकी यूनिट ने आगे बढ़कर सबसे पहले बिलाफोंड ला पर तिरंगा लहरा दिया.
साल्टोरो रिज पर कब्जे की ज़िम्मेदारी ब्रिगेडियर विजय चन्ना के हाथों में थी. ग्लेशियर की ऊंचाई वाली चोटियों पर तिरंगा लहराने का काम मेजर आर.एस.संधू की टीम को करना था. सब कुछ तय प्लान के हिसाब से हुआ. बिलफॉंड ला की सभी चोटियों पर भारत ने अपना तिरंगा फहरा दिया.
भारतीय फ़ौज की सभी यूनिट्स ने अपने काम को बख़ूबी अंजाम दिया. ऑपरेशन तय समय, 13 अप्रैल को पूरा हो गया. बर्फ की सफ़ेद चादर पर सफ़ेद कपड़े पहने भारतीय सैनिक जीत की हुंकार भर रहे थे. ग्लेशियर पर कंपकंपाती ठंड के बीच भारतीय सैनिक अपने लहू से जीत की गाथा लिख रहे थे. सियाचिन पर भारत की चौकियाँ बन चुकी थीं जिन पर तिरंगा गर्व के साथ लहरा रहा था. भारत के सैनिक वैसाखी वाला भांगड़ा इस बार सियाचिन पर कर रहे थे. ‘सत श्री अकाल’ का उद्घोष दूर तक सुनाई दे रहा था. उधर पाकिस्तान की सेना 17 अप्रैल का इंतज़ार ही करती रह गई. लेकिन कहानी अभी ख़त्म नहीं, शुरू हुई थी.
सियाचिन पर क़ब्ज़े के बाद
साल था 1987. सियाचीन की बर्फीली चोटियों पर निगरानी करते हुए भारतीय सेना को 3 साल बीत चुके थे. पाकिस्तान अब तक अपनी शिकस्त को भुला नहीं पाया था. भारतीय सेना ने एक कदम आगे बढ़कर उसे मात दी थी.
इस हार के बाद पाकिस्तान, सियाचिन को अपने क़ब्ज़े में लेने की कोशिशों में लगा हुआ था. इसी मक़सद से उसने ग्लेशियर की एक ऊँची चोटी पर अपनी चौकी बनायी. यह चौकी क़रीब 15 हज़ार की फीट की ऊँचाई पर थी. यह एक बंकरनुमा चौकी थी. इसके दोनों तरफ़ बर्फ़ की ऊँची दीवारें थीं. पाकिस्तान ने इसे ‘कायदे-आजम’ मोहम्मद अली जिन्ना के नाम पर ‘क़ायदे चौकी’ नाम दिया.
ज़ाहिर है कि भारत इससे असहज था. इतनी ऊँचाई से पाकिस्तान की सेना भारतीय सेना को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में थी. इसलिए पाकिस्तान की इस पोस्ट को तबाह करके उस पर किसी भी हालत में क़ब्ज़ा जमाना था.
भारतीय सेना ने ‘क़ायदे चौकी’ पर तिरंगा फहराने के लिए एक स्पेशल मिशन बनाया. मिशन को ‘ऑपरेशन राजीव’ नाम दिया गया. तय हुआ कि कुछ सैनिक पाकिस्तानी सैनिकों को उलझा कर रखेंगे और कुछ सैनिक बर्फ़ के पहाड़ पर धीरे-धीरे चढ़कर ऊपर जाएँगे. योजना तो ठीक लग रही थी लेकिन बर्फ़ की दीवार पर चढ़ना जोखिम भरा था. मुश्किल ये भी थी कि ये सब चुपचाप करना था ताकि दुश्मन को भनक न लगे. पहाड़ पर बैठे दुश्मन को इसकी ख़बर मिलने का एक ही मतलब था- शहादत.
पहाड़ पर चढ़कर दुश्मन की चौकी को तबाह करने की ज़िम्मेदारी नायब सूबेदार बाना सिंह को दी गई. बाना सिंह ने ख़ुद आगे बढ़कर इस काम को लिया था.
फ़ाइल फ़ोटो: नायब सूबेदार बाना सिंह
तारीख़ आ गई थी. 22 जून 1987, जब मिशन शुरू हुआ. इंडियन आर्मी की एक टुकड़ी ने पकिस्तान के चेक पोस्ट पर फायरिंग की. इस फ़ायरिंग के बीच बाना सिंह ने कुछ जवानों के साथ बर्फ़ीले पहाड़ पर चढ़ना शुरू दिया. दुश्मन को पता न लगे इसलिए उनकी टीम जो रास्ता चुनती है उसमें ज़्यादा ऊँचाई तय करनी थी. 21000 फुट की ऊंचाई, ऊपर से हड्डियों को गलाने वाली ठंड. दुर्गम रास्ते से होते हुए बाना सिंह और उनके साथी आगे बढ़ते रहे. रास्ते में टीम को कई सैनिकों की लाशें मिलीं. ये लाशें शायद उनकी थीं जिन्होनें कभी पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश की होगी. ये लाशें हौसला बढ़ाने वाली तो नहीं थीं लेकिन फिर भी जवानों की ये टुकड़ी पहाड़ चढ़ती रही.
एक तरफ़ बाना सिंह अपने साथियों के साथ आगे बढ़ रहे थे और दूसरी तरफ़ एक भारतीय टुकड़ी पाकिस्तान की सेना से सीधे भिड़ रही थी. गोलाबारी के बीच मौसम भी मारक था. इस दौरान भारतीय सेना के कुछ अफ़सर और जवान शहीद हो चुके थे. बाना सिंह की टीम के एक सदस्य ने भी पहाड़ चढ़ते हुए अपनी जान गँवा दी थी. भारतीय सेना को हो रहे नुक़सान को देखते हुए कई बार इस ऑपरेशन को बंद करने की सलाह दी गई लेकिन इससे असहमत लोगों का पक्ष था कि -“या तो जीत हासिल करके लौटो या लौटो ही मत.”
इस दूसरे पक्ष की बात का वज़न ज़्यादा था. मिशन में लगे सिपाहियों ने तय कर लिया था कि अब जीत कर ही लौटेंगे. बाना सिंह और टीम को चलते-चलते तीन दिन बीत चुके थे. बर्फ़ीले मौसम के साथ-साथ अब भूख भी परेशानी का सबब बन रही थी. बाना सिंह ने अपनी टीम को कह दिया कि अब क़ायदे चौकी पर पहुँचकर दुश्मन की हार से अपनी भूख शांत करेंगे. 27 जून को टीम अपनी मंज़िल तक पहुँच गयी. पहले से तय प्लान के हिसाब से बाना सिंह ने टीम को दो हिस्सों में बँटने को कहा. ”जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल” कहकर बाना सिंह दुश्मन पर क़हर बन कर टूटे पड़े. दो तरफ़ से पाकिस्तान के बंकर पर ग्रेनेड फेंके गए. कुछ ही पलों में चौकी पर मोर्चा सम्भाल रहे 6 पाकिस्तानी जवान ढेर हो गए. बंकर तबाह हो चुका था और चौकी पर तिरंगा फहरा रहा था.
इतनी ऊंचाई पर हाड़-माँस को गलाने वाली सर्दी में बिना खाए-पिए बाना सिंह की टीम ने क़ायदे चौकी पर क़ायदे से परचम लहरा दिया था. चार दिन से भूखे बाना सिंह ने अपने साथियों संग वहाँ पड़े स्टोव जलाए, पाकिस्तानी चावल पकाए और भर पेट खाना खाया.
इस जीत के छह महीने बाद 26 जनवरी 1988 को नायब सूबेदार बाना सिंह को उनके साहस व अद्वितीय नेतृत्व के लिए परमवीर चक्र का सम्मान दिया गया साथ ही उन्हें कैप्टन की मानद उपाधि भी दी गयी. कैप्टन बाना सिंह के इस अद्भुत युद्ध कौशल और साहस के चर्चे भारत में ही नहीं पाकिस्तान में भी ख़ूब रहे. पाकिस्तान डिफेंस रिव्यू में कहा गया कि अगर वो जट्ट सरदार ना होता तो हम क़ायदे चौकी कभी न गँवाते.
कारगिल की लड़ाई के बाद 1999 में क़ायदे चौकी का नाम बाना सिंह के नाम पर ‘बाना पोस्ट’ रख दिया गया.
इस लड़ाई को लगभग 33 साल बीत चुके हैं. सियाचिन की इतनी ऊँचाई पर उसके बाद कोई दूसरी लड़ाई नहीं लड़ी गई हालाँकि जवानों पर मौसम की मार की दुखद ख़बरें आती रहती हैं.
बाना सिंह ने न जाने वो कैसे किया. अब वो 71 साल के हैं और जम्मू कश्मीर में रहते हैं. पंजाब सरकार ने उन्हें ढाई लाख का इनाम, 15 हज़ार रुपये महीने का भत्ता और 25 एकड़ ज़मीन देने का प्रस्ताव दिया था पर शर्त थी कि वो पंजाब आकर रहने लगें. उन्होंने इसे ये कहते हुए ठुकरा दिया कि वो जम्मू कश्मीर के बाशिंदे हैं और वहीं रहेंगे.
बाना सिंह के पुत्र राजिंदर सिंह 2008 में 18 साल की उम्र से ही सेना में शामिल हो गए थे.
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पिछले सालों में टीवी पर और आम लोगों के बीच में बार-बार ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का ज़िक्र हुआ. नैरेटिव ऐसा सेट किया गया कि मानो इससे पहले भारतीय सेना हाथ बाँध कर बैठी थी. ख़ैर कोई कितना भी कह दे, किसी के कहने भर से भारतीय सेना का गौरवशाली इतिहास बदल नहीं जाएगा. झूठ के ख़िलाफ़ इतिहास गवाही देगा.
एक और बड़ा फ़र्क़ है जिस पर कितनों का ध्यान गया है, नहीं पता? राष्ट्रवाद की दुहायी देने वाले बार-बार 1962 का ज़िक्र करते हैं. तब भारत चीन के मुक़ाबले उन्नीस साबित हुआ था. इस हार का ज़िक्र करके वो नेहरु को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं लेकिन ऐसा करके जाने-अनजाने सेना के मनोबल को कम करते हैं. पहले के सैन्य ऑपरेशन में सरकार से ज़्यादा सेना को वाहवाही मिलती थी. हमें तब के कई सेनानायकों के नाम याद होंगे लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक में हमारे ज़ेहन में एक ही नाम आता है-मोदी. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे सामने यही एक नाम पेश किया जाता है.
लेफ़्टिनेंट जनरल सगत सिंह की कहानी के बाद मेरे ब्लॉग परभारतीय सैन्य ऑपरेशन की यह दूसरी किस्त है जो आगे भी जारी रहेगी. सगत सिंह की कहानी यहाँ पढ़ी जा सकती है………..
भारत के प्रधान-सेवक को मेरा शास्त्रांग दंडवत प्रणाम!
ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह पर आप जैसा लोकप्रिय, जननायक, दूरदर्शी शासक नहीं है. आप हैं, इसीलिए हम हैं. कोरोना की इस बेला में आप अपना बहुमूल्य जीवन मुश्किल में डालकर लगातार हम सबके बीच हैं, इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार.
दुनिया के तमाम विकसित देश जब कोरोना की महामारी से बुरी तरह जूझ रहे हैं तब आप की ही दूरदर्शिता का परिणाम है जिसके कारण हमारा देश इस बीमारी को लगातार मात दे रहा है. इसके लिए हम सब आपके कृतज्ञ हैं.
सबसे पहले ‘ताली-थाली’ के आपके अद्भुत प्रयोग ने देशवासियों के मन-मस्तिष्क में पनप रहे बीमारी के डर को कम किया. फिर ‘दिया-बाती’ कार्यक्रम आयोजित करके आपने न केवल भारत बल्कि सम्पूर्ण विश्व में उजाला कर दिया. एक ऐसी दिव्य ज्योति जिसके प्रज्वलित होने भर से आत्मीय शांति का सुखद एहसास हुआ. दुनिया जब बीमारी के तिमिर में अपना उत्साह खो रही थी तब आपके इन अथक प्रयासों से एक आलौकिक ऊर्जा का संचार हुआ. आपने देशवासियों को विश्वास दिलाया कि हम इस तरह के मदमस्त क्रियाकलापों से कोरोना को भ्रमित कर देंगे और हुआ भी वही. आज देश में लगातार कोरोना मरीजों की संख्या बढ़ रही है लेकिन हमारा डर लगातार कम हो रहा है. इस सबका श्रेय आपको ही जाता है.
हम सबका सौभाग्य है कि इस मुश्किल घड़ी में भी हमें लगातार आपका साथ मिल रहा है. टीवी पर आपके दर्शन का लाभ हमें 24 घंटे मिलता ही रहता है. आपके दर्शन मात्र से हमारे आधे दुख-दर्द खत्म हो जाते हैं. रात 8 बजे वाला आपका विशेष शो देखकर तो मेरे मुख से अनायास ही अहा! अदभुत! अविश्वसनीय! अकल्पनीय! जैसे शब्द निकल जाते हैं. टीवी पर आपको देखकर मैं आरती का घंटा हाथ में ले लेता हूँ और सिर्फ आपके श्रीमुख को ही निहारता रहता हूँ. कभी-कभी आरती भी गा लेता हूँ– “आरती कीजै नरेंद्र लला की. कोरोना दलन गुजरात कला की.”
आपके ‘मन की बात’ ऐसी कि मानो आप अपने नहीं, हम आम-जन के मन की बात कर रहे हो. समय-समय पर आपने नया-नया गमछा मुँह पर लपेट कर हमें संदेश दिया कि हर बार फेंकने से ही नहीं होता है कभी-कभी लपेटना भी होता है और इस बार हम सभी को मिलकर मुँह पर कपड़ा लपेटना है. जो कपड़ा न लपेटे उसे रोकना है, टोकना है और समझाना है.
इस कोरोना-काल में आप लगातार दुनिया भर के आर्थिक-सामाजिक क्षेत्रों की हस्तियों से सलाह-मशविरा करते हुए दिखते रहे. सब आप कर रहे थे लेकिन आपने कभी भी ख़ुद को कोई श्रेय नहीं दिया. दूसरों का श्रेय हड़पने की आदत, आप जैसे सरल आदमी की कभी नहीं रही.
झूठ-फ़रेब से तो आपका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है.
जिस दिन आपने सचिन, मैरीकॉम और सिंधू जैसे खिलाड़ियों से कोरोना की चर्चा की उस दिन मेरे मन में विचार आया कि इतना दूर तक आप के अलावा कोई ओर सोच ही नहीं सकता था. आप ही कहते रहे हैं कि परमात्मा ने आपको बनाते समय आपके मस्तिष्क में ऐसा सॉफ्टवेयर डाला है कि आप कभी छोटा नहीं सोच सकते हैं. आप सच ही कहते हैं.
मुझे यकीन है कि स्वर्ग लोक में बैठे नेहरू, जिन्हें आप अक्सर याद करते ही रहते हैं , आपके योगदान पर प्रफुल्लित हो रहे होंगे. देव-दानव ,सुर-असुर,गंधर्व, नाग, किन्नर,नर-नारी सभी आप पर आकाश से पुष्प वर्षा करते होंगे. आपके अतुलित बल, बुद्धि, विवेक को देखकर देवराज इंद्र का सिंहासन भी बार-बार हिल जाता होगा. ब्रह्मा जी अपने इसी अद्भुत शिल्प से कई बार फुले नहीं समाते होंगे, उन्होंने सॉफ्टवेयर ही नहीं हार्डवेयर भी मजबूत बनाया है.
मुझे ये भी यकीन है जब कभी कोई दुष्ट आत्मा आप पर आरोप लगाती है, आपका विरोध करती है तब क्षीरसागर में आराम कर रहे भगवान विष्णु अपनी निद्रा से जाग जाते होंगे. कैलाश पर्वत पर शिव जी अपना तीसरा नेत्र खोलकर तांडव शुरू कर देते होंगे.
कोरोना काल क्या, आपके सकल-जीवन काल के योगदान को हमारी सात पीढ़ियां याद रखेंगी और आपकी आभारी रहेंगी. सच पूछिए तो कभी -कभी आप पर इतना प्रेम आता है कि मन करता है कि आपके चरणों को धोकर पी जाऊं पर मुझ बदनसीब की किस्मत में ये कहाँ? इसलिए आपके फोटो को मैं अपने पर्स में रखता हूँ और जब-जब प्रेम उमड़ता है आपकी फोटो को चूम लेता हूँ.
आपका एक बार फिर कोटिशः धन्यवाद!
कोरोना काल में हमारे प्रधानमंत्री को किसी ने धन्यवाद नहीं दिया. उनके लिए किसी ने ताली-थाली नहीं बजायी. उन पर हेलीकाप्टर से फूल नहीं बरसाए गए. प्रधान सेवक पर साक्षात पुष्प वर्षा करने की अपनी हैसियत नहीं है इसलिए अपने शब्दों के पुष्प-सुमन अर्पित कर रहा हूँ.
नमस्कार! इस हफ़्ते के मुख्य मुख्य समाचार– ‘कैबिनेट मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि राजीव गांधी फाउंडेशन ने साल 2005-2006 में चीन से डोनेशन लिया था. उन्होंने सवाल किया कि सरकार की अनुमति के बिना जब इस तरह की फंडिंग को मंजूरी नहीं मिल सकती तो फाउंडेशन ने कैसे चीन से पैसे ले लिए.’
रविशंकर प्रसाद के आरोपों को उनकी पार्टी के वर्चुअल राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने आगे बढ़ाया. नड्डा ने आरोप लगाया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना में गहरे संबंध है.
मुख्य समाचार समाप्त. चलिए अब कुछ मनोरंजन जगत की बातें कर लेते हैं—
● साल 2014 में दिल्ली हाइकोर्ट ने बीजेपी और कांग्रेस को विदेशी चंदा नियमन कानून (FCRA) के उल्लंघन का दोषी माना. दोनों पार्टियों ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. फिर आया साल 2016. मोदी सरकार ने कानूनी पचड़े से बचने के लिए FCRA में एक संशोधन किया और जांच के खतरे से बाहर आ गयी लेकिन 2016 वाले संशोधन का कटऑफ 2010 था यानि अगर कोई 2010 से पहले का केस लेकर कोर्ट पहुँच जाता तो इन पार्टियों को मुसीबत होती. जल्द ही इसका भी हल निकाल लिया गया. मोदी सरकार ने FCRA में एक और बदलाव किया जिसने सभी राजनीतिक दलों के लिये विदेशी चंदा लेना आसान कर दिया गया. साथ ही इस बदलाव ने 1976 से पहले किसी भी राजनीतिक दल को मिले विदेशी चंदे की जांच से छूट भी दिला दी. कानून का यह संसोधन संसद में चुपचाप ध्वनि मत से पारित हो गया. बीजेपी ने ख़ुद को बचाया साथ ही दूसरी पार्टियों पर भी एहसान किया.
इस मास्टरस्ट्रोक से ‘चंदा कहीं से आये, धंधा मस्त चलना चाहिए’ उद्देश्य को गति मिली.
●नवंबर 2019 में एक खुलासा हुआ. तब खुलासा रविशंकर प्रसाद ने नहीं किया था लेकिन इस ख़ुलासे से उनकी पार्टी ज़रूर घेरे में आयी.खुलासा इतना मजेदार था कि आप दाँतों तले उंगली दबा लेंगे. जर्मन कंपनी RKW से बीजेपी ने 2014-15 में 10 करोड़ का चंदा लिया. इस कंपनी पर मुंबई बम धमाकों के अभियुक्त इकबाल मिर्ची से संपत्तियां खरीदने का आरोप था. जब बीजेपी ने चंदा लिया था उस समय कंपनी के आतंकवाद से कनेक्शन की जांच सरकारी एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय कर रहा था.
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ये रही चंदे की बात, अब एक नज़र डालते हैं इतिहास पर–
◆साल 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चीन की यात्रा की. उन्होंने चीन के तिब्बत पर क्लेम का समर्थन किया. इस बात पर भारत में उनका विरोध हुआ. विरोध केवल विपक्ष ने ही नहीं किया बल्कि आरसएस की पत्रिका ऑर्गेनाइजर के पूर्व संपादक शेषाद्रि चारी ने भी इस पर अटल बिहारी की ख़ूब आलोचना की. उन्होंने कहा कि भारत ने पहली बार तिब्बत को चीन का हिस्सा माना है और यह बड़ी ऐतिहासिक भूल है.
अटल बिहारी वाजपई (२००३ में अपनी चीन यात्रा के दौरान)
●भाजपा के बड़े नेता राजनाथ सिंह,नितिन गडकरी और राम माधव गैर आधिकारिक तौर पर चीन के राजदूतों और नेताओं से मिलते रहे हैं. 2016 का शिवराज सिंह का एक ट्वीट ख़ूब चर्चित है.शिवराज सिंह कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना और बीजेपी में काफी समानताएं हैं, दोनों ने समाज के लिए ख़ूब काम किये हैं.
इन बातों से मैं कोई निष्कर्ष नहीं निकाल रहा हूँ बस बता रहा हूँ ताकि सनद रहे. चीनी शासन में अगर तानाशाही का थोड़ा भी पुट है तो भारत में कौन उस पर प्रफुल्लित होता है.
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आगे बात करते हैं धंधे की—
●देश में चाइना के सामान के बहिष्कार की मुहिम बार-बार चलती रहती है लेकिन मोदी के गृहराज्य गुजरात में चीन का सबसे ज्यादा निवेश है. चीनी कंपनी टेबियन इलेक्ट्रिक एपरेटस देश में ऊर्जा से जुड़े भारी उपकरण बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी है, गुजरात में इस कंपनी ने ट्रांसफार्मर बनाने का प्लांट लगाया है. करीब 400 मिलियन डॉलर का निवेश किया है. साल 2014 में जब मोदी ने जिनपिंग को झूला झुलाया था तब इस कंपनी ने गुजरात में इंडस्ट्रियल पार्क बनाने की घोषणा की थी.
●चीन की बड़ी कंपनी CRRC भारत में रेलवे और मेट्रो के प्रोजेक्ट्स में हैं. 2015 के बाद से इस कंपनी की हिस्सेदारी भारत में काफ़ी बढ़ गयी है.
●एक और चीनी कंपनी शिंगशान होल्डिंग ने जॉइंट वेंचर के तहत गुजरात के धोलेरा इंडस्ट्रियल एरिया में एक स्टील प्लांट में 1 अरब डॉलर का निवेश किया है.
●ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी चीनी कंपनियों ने गुजरात में जमकर निवेश किया है. साल 2019 में शंघाई की ऑटोमोबाइल कंपनी एसएआईसी मोटर कॉरपोरेशन भारत पहुंची. कंपनी ने गुजरात के हलोल में जनरल मोटर्स के मैन्युफैक्चरिंग प्लांट में 2000 करोड़ रुपए के निवेश का ऐलान किया.
हमारे गुजरात के सहयोगी चंपक शाह ने हमें एक और महत्वपूर्ण जानकारी दी है..
● एक बार मोदी जी गए चीन. साथ में ले गए अपने अडानी जी को. क्योंकि ‘अपने तो अपने होते हैं’. वैसे अडानी जी मोदी जी के साथ कई विदेशी दौरे पर जाते रहते हैं लेकिन आजकल चीन-चीन चल रहा है इसलिए बात चीन की.
बात साल 2015 की है. 2015 में अपने चीन दौरे के दौरान अडानी ग्रुप ने कई चीनी कंपनियों के साथ करार किये. बताया गया कि एनर्जी, स्पेशल इकोनॉमिक जोन और इंडस्ट्रियल पार्क से जुड़े कई समझौते हुए हैं. गुजरात के मुंद्रा थर्मल पावर प्लांट के लिए भी करार हुआ.मुंद्रा पावर प्लांट से गुजरात राज्य की ऊर्जा विकास निगम बिजली खरीदती है. चंपक शाह बताते हैं कि साल 2018 में अडानी के इस प्रोजेक्ट के बैंक करप्ट होने की नौबत आ गयी. कंपनी कोर्ट में गयी और बिजली के दाम बढ़ाने की अपील की जिसे जिसे कोर्ट ने नहीं माना लेकिन कोर्ट के फैसले के अलग गुजरात सरकार ने मुंद्रा पावर प्रोजेक्ट के साथ हुए अपने पुराने एग्रीमेंट को खत्म कर नया एग्रीमेंट कर लिया. इस नए एग्रीमेंट में बिजली के दाम बढ़ाने में समझौता हो गया.राज्य के लोगों को महंगी बिजली के बदले अडानी का प्रोजेक्ट बच गया. चंपक शाह बताते हैं मुंद्रा पावर प्लांट और चीन के बीच समझौता इसीलिए किया गया ताकि इस प्रोजेक्ट को दिवालिया दिखा कर सरकारी रियायत ली जा सके.
चंपक शाह इससे आगे खुलकर बताने से डरते हैं क्योंकि वो अहमदाबाद के एक फेमस पार्क में रोज़ाना मॉर्निंग वॉक के लिए जाते हैं.
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आगे बढ़ते हैं. बीजेपी में नरेंद्र मोदी से आगे कोई नहीं, इसलिए मोदी पर ज़रा ठहरते हैं—
● नरेंद्र मोदी मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री 6 साल में 18 बार चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग से मुलाकात की है. इतनी मुलाकात के बाद दोनों के बीच संबंध अच्छे होने चाहिए पर बॉर्डर पर जो हुआ, उससे लगता तो नहीं है. 6 साल में 18 बार मुलाकात का सिला ये है तो ये कूटनीतिक विफलता नहीं है?
नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने कई बार चीन का टूर किया. हां, इसपर तर्क दिया जा सकता है कि उन्हें अमेरिका जैसे देश वीजा नहीं देते थे तो उनके पास ज्यादा घूमने के विकल्प नहीं थे.
●साल 2019 में मोदी ने जिनपिंग को भारत आने का न्योता दिया. अपने प्रिय मित्र को उन्होंने वादा किया था कि इस बार महाबलीपुरम में घुमाएंगे और समंदर के तट पर साथ में नारियल पानी पियेंगे. उन्होंने अपना वादा बख़ूबी निभाया.
●2019 में जिनपिंग के भारत आने से कुछ रोज पहले 26 अगस्त से 1 सितंबर के बीच बीजेपी का 11 सदस्यों का एक दल चीन गया. दल का नेतृत्व बीजेपी के महासचिव अरुण सिंह और विदेश मामलों का प्रमुख विजय चौथानीवाले कर रहे थे. यह सरकारी यात्रा नहीं, पार्टी की यात्रा थी. भाजपा का मानना था कि गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट इंटरेक्शन के साथ आज की जरूरत पार्टी से पार्टी को जोड़ने की भी है. यानी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना और बीजेपी को जोड़ने की बात हो रही थी.
बीजेपी का प्रतिनिधिमंडल जिसने अगस्त २०१९ में चीन का टूर किया
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ख़ैर..ये सब बीती बातें हैं. बीती बातों में क्या जीना? आज की बात करते हैं और लौटते हैं रविशंकर प्रसाद के ख़ुलासे पर. रविशंकर प्रसाद में कई बार यूपीए-2 के दौर के सलमान ख़ुर्शीद और कपिल सिब्बल की छवि दिख जाती है. आवाज़ में दंभ, नाक पर गुस्सा.
रविशंकर ने बढ़िया खुलासा किया है. वो अक्सर करते ही हैं. उनके ख़ुलासे 2014 से पहले भी करते थे और आज भी कर रहे हैं. वाड्रा पर तो उन्होंने कभी पूरी किताब तक लॉन्च कर दी थी.
मैं सोच ही रहा था कि रविशंकर जी की पार्टी जब सत्ता में आएगी तो इन ख़ुलासों पर ज़रूरी कार्यवाई करेगी..लेकिन किसी ने मुझ याद दिलाया कि पगले, अभी भी उनकी ही सरकार है.
मुझ पागल को अभी तक समझ नहीं आ रहा है कि जो पार्टी सरकार में है वो केवल ख़ुलासे ही करेगी या इन ख़ुलासों पर कोई कारवाई भी करेगी. कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि ये ख़ुलासे केवल इसलिए हो रहे हैं ताकि इनके पीछे छिपकर चीन सीमा पर अपनी नाकामी को छिपाया जा सके.
ख़ैर. इस बार एक अच्छी बात रही यह रही कि रविशंकर जी ने नेहरू पर लांछन नहीं लगाया. उन्होंने राजीव गांधी का नाम लिया और 2005 तक ही पहुँचे वरना बार-बार स्वर्ग में बैठे नेहरू को ही परेशान करते थे.
वो एक क़िस्सा सुना था कभी. एक चोर जब पकड़ा गया तो उसने जेब से बांसुरी निकालकर मंत्रमुग्ध करने देने वाली धुन बजाई और कहने लगा कि मैं तो कलाकार हूं, चोरी तो आठ साल पहले नन्नू हलवाई ने की थी. आप लोगों का असली दुश्मन वो है.
“सरसों का तेल नाक में डाल दें तो पूरी सांस नली में कहीं भी कोरोना हो तो वह पेट में चला जाएगा और वहां पेट के कैमिकल उसे मार देंगे. जैसे हैंड वॉश, सेनेटाइजर और साबुन का घोल कोरोना को मारता है. वैसे ही पेट के नैचुरल कैमिकल कोरोना को मार देंगे.’
यह दावा बाबा रामदेव ने 25 अप्रैल 2020 को आजतक न्यूज़ चैनल के एक कार्यक्रम में किया था.इसी कार्यक्रम में बाबा, बिना टेस्ट के कोरोना पता लगाने का तरीका बतलाते हैं. बाबा कहते हैं कि जिन्हें क्रोनिक हायपरटेंशन, दिल की बीमारी, डायबिटीज है और जो बुजुर्ग हैं वे अगर 30 सेकंड तक सांस रोक लें तो मान लेना चाहिए कि उन्हें कोरोना नहीं है. अगर यही काम कोई जवान एक मिनट कर ले तो उसके भी कोरोना नहीं होने की पुष्टि हो जायेगी.बाबा की इन तरीकों को अगर सरकार उपयोग में लाती तो कोरोना टेस्ट किट के लिए खर्च हो चुके करोड़ों रुपये बच जाते. साथ ही एक ही दिन में पूरे देश की आबादी का कोरोना परीक्षण हो जाता. कोरोना मरीजों के लिए सरसो के तेल का इस्तेमाल होता तो किसानों की भी चांदी कट जाती और सरकारी ताम-झाम में ख़र्च हो रहे पैसे की बचत होती.लेकिन सरकार को बाबा रामदेव जितनी समझ नहीं है.ख़ैर..बाबा रामदेव फिर चर्चा में लौटे हैं. उन्होंने अपने साथी आचार्य बालकृष्ण के साथ मिलकर कोरोना की दवा ‘कोरोनिल’ लॉन्च कर दी है. दवा पर बाबा के अपने दावे हैं. दावा है कि इससे कोरोना का मरीज 7 दिन 100% ठीक हो जाएगा.
पतंजलि के दावे में कितनी सच्चाई है?
कोरोना की इस आयुर्वेदिक दवा पर पतंजलि ने दावा किया है कि दवा को काफ़ी क्लिनिकल रिसर्च के बाद बनाया गया है. साथ ही यह भी दावा है कि इसे टेस्ट भी किया गया है. टेस्ट के रूप में पतंजलि ने रिपोर्ट भी दी है. पतंजलि के इन दावों की पड़ताल न्यूज़ लॉन्ड्री वेबसाइट ने की है. पड़ताल के बाद दावे और उनकी हक़ीक़त कुछ इस तरह हैं:-
★दावा– दावा है कि दवा से मेरठ के 70 डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ जो कोरोना मरीजों के संपर्क में आये थे, उन सभी की रिपोर्ट 5 से 7 दिनों में नेगेटिव पायी गयी.
◆सच–सिर्फ संपर्क में आने से ही कोई भी व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव नहीं हो जाता. कोई भी इंसान कोरोना पॉजिटिव है या नहीं, इसका पता कोरोना टेस्ट से ही होता है. इन 70 लोगों का दवा देने से पहले कोई टेस्ट किया गया, स्पष्ट नहीं हैं.
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★दावा–पतंजलि ने अपनी डिटेल रिपोर्ट में लिखा है कि मेरठ स्थित आनंद अस्पताल में स्टाफ के 45 क्वारंटीन कर्मचारियों के कोविड-19 से संक्रमित होने का शक था. आयुर्वेदिक इलाज के 14 दिन बाद उनकी टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आई है.
◆सच–क्वारंटीन में रहने वाले किसी आदमी को कोरोना हो ये ज़रूरी नहीं, क्वारंटीन सिर्फ एहतियातन उठाया गया कदम है. बिना जांच के कोरोना पॉजिटिव का पता नहीं चलता है.
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यह कोरोना की गंभीरता का मजाक नहीं तो क्या है?
● भारत के आधिकारिक आंकड़ो के हिसाब से हमारे यहां कोरोना के 50 फीसदी से ज्यादा मरीज ठीक हो चुके हैं. ज्यादातर ऐसे हैं जो घर में जरूरी सावधानी बरतकर ही ठीक हो जा रहे हैं. यानि कोरोना होने के बाद ठीक होने की गारंटी ज्यादा है. ऐसे में अगर पतंजलि ठीक होने वालों का श्रेय अपनी दवाई को देने लगे तो यह संदेहास्पद ही होगा.
● कोरोना की महामारी पूरी दुनिया के लिए संवेदनशील मामला है. सरकार की तरफ से इस पर समय-समय पर जरूरी दिशा निर्देश दिए जा रहे हैं. WHO रोज़ नई जानकारियां दे रहा है. कई तरह की दवाओं से कोरोना के ठीक होने की ख़बरें आती रही लेकिन सरकार ने अभी तक किसी को प्रामाणिक नहीं माना. सरकार और आईसीएमआर बिना डॉक्टर्स की सलाह के कोई दवा न लेने की सलाह देते रहे हैं.
● पतंजलि की दवा पर सरकार का क्या रुख़ है, यह दवा की लॉंचिंग तक स्पष्ट नहीं था. शुरुआत में सरकार और ICMR इस दवा की जानकारी होने से इंकार करते रहे लेकिन अब आयुष मंत्रालय ने पतंजलि की इस नयी दवा के प्रमोशन पर रोक लगा दी है और पतंजलि से दवा का पूरा ब्योरा माँगा है.
आयुष मंत्रालय की ओर से १ अप्रेल को कहा गया था कि आयुर्वेद, यूनानी या इलाज की दूसरी विधाओं के ऐसे विज्ञापन पर रोक लगायी जाए जिसमें कोरोना के इलाज का दावा किया जा रहा हो साथ ऐसा दावा करने वाले पर कार्यवाई करने की भी बात कही गयी.
लेकिन बाबा रामदेव ने बिना सरकार की जानकारी के एक मेगा इवेंट में कोरोना की दवा लॉंच कर दी. बाबा रामदेव की जगह कोई और होता तो उस पर आपराधिक मुक़दमा हो जाता लेकिन बाबा ठहरे सरकार के लोगों के ख़ास इसलिए उनसे केवल ब्योरा माँगा गया है. पतंजलि स्टोर में एक हफ़्ते में कोरोना की यह दवा मिलनी शुरू हो जाएगी और बाबा रामदेव ख़ूब नोट छाप चुके होंगे.
● देश में अभी कोरोना के करीब 1 लाख 80 हजार केस एक्टिव हैं. अगर सारे संदेह और सवाल बेकार हैं और बाबा रामदेव के दावे में सच्चाई है तो 15 दिनों में देश से कोरोना खत्म नहीं हो जाना चाहिए? नहीं होता तो उन पर भ्रामक जानकारी फैलाने का केस दर्ज होगा?
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बाबा रामदेव ने पहले भी ख़ूब दावे किए हैं. लोग भूल गए होंगे इसलिए याद दिला देता हूँ. बाबा रामदेव के हिसाब से भारत का 400 लाख करोड़ रुपए काला धन विदेश में है. उन्होंने लोगों को सपने दिखाए कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर यह पैसा वापस भारत आ जाएगा और पेट्रोल-डीजल के दाम 30-35 रुपए हो जाएँगे. पिछले कई दिन से हर रोज़ डीजल पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं. नोटबंदी पर भी बाबा ने ख़ूब सब्ज़बाग़ दिखाए थे. एक समय वो कहते थे कि बड़े नोट बंद करने चाहिए क्यूँकि उससे काला बाज़ार बढ़ता है और छोटे नोट होंगे तो घूसखोरी कम होगी क्योंकि घूस देने के लिए ट्रक में पैसा ले जाना होगा. बाबा के दावे के उलट सरकार ने 500 और 1000 के नोट बंद करके 2000 के नोट चला दिए. बाबा रामदेव अर्थव्यवस्था के भी एक्स्पर्ट हैं. टैक्स रिफ़ॉर्म पर उनके अपने दावे हैं.GST पर उनके दावे हैं. वो राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय पर भी जानकारी रखते हैं.
पर साइंटिफिक टेम्परामेंट का कोई भी व्यक्ति रामदेव के जादूगरी मंत्रों पर भरोसा नहीं करता.
मैं दिल से उम्मीद रखता हूं कि इस बार बाबा रामदेव के दावे सच हों. दुनिया से ये संताप मिटे.
लेकिन अगर ये बात भी उनके तमाम झूठों में एक कड़ी मात्र निकली और साबित हुआ कि वो आपदा में अपनी कंपनी के लिए आर्थिक अवसर देख रहे थे तो उनके गेरुआ वस्त्रों पर यह कभी न मिटने वाला काला धब्बा होगा.
साल था 1967. भारत स्थित चीन के दूतावास में एक नेता अपने समर्थकों के साथ भेड़ों का झुंड लेकर घुस गया. सुनकर बहुत अज़ीब लगता है लेकिन ऐसा हुआ था और ऐसा करने वाले नेता का नाम था अटल बिहारी वाजपेयी.
दरअसल यह अजीबो-ग़रीब काम एक विरोध प्रदर्शन का हिस्सा था. उन दिनों चीन ने भारत पर आरोप लगाया कि चीन-सीमा पर तैनात भारतीय फौज के जवान उसकी भेड़ों के झुंड को हांककर भारत ले गए हैं. चीन के इसी आरोप के जवाब में भारतीय जनसंघ ने चीनी दूतावास पर प्रदर्शन किया था जिसकी अगुवाई अटल बिहारी वाजपेयी कर रहे थे.
आज अगर कोई नेता ऐसा प्रदर्शन करे तो वो मूर्ख तो कहलाएगा ही साथ ही उस पर सरकारी डंडे भी पड़ेंगे लेकिन उस समय सरकारी पार्टी और विपक्ष की लड़ाई का स्तर आज की तरह लीचड़ नहीं था.
1962 के बाद से ही भारत-चीन की सीमा पर तनाव बना था. चीन वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहा था और भारत आत्मसम्मान की.
इस बीच साल 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया. युद्ध में पाकिस्तान की हालत जब ख़राब होने लगी तब पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने चीन पहुंचकर मदद की गुहार लगाई. चीन को जैसे भारत से भिड़ने का बहाना चाहिए था जो उसे अब मिल गया था. चीन ने तुरंत भारत को नाथूला और जेलेप-ला में अपनी सैनिक चौकियां खाली करने का फ़रमान जारी कर दिया.
भारत पहले से ही पाकिस्तान सीमा पर लड़ रहा था दूसरी तरफ चीन सीमा पर भी लड़ाई का फ्रंट नहीं खोलना चाहता था. भारतीय सेना के बड़े जनरल ने जेलेप-ला और नाथूला की जिम्मेदारी से संभाल रहे आर्मी डिवीजन के कमांडर को आदेश दिया कि चौकियां खाली कर दी जाएं.
भारत की तरफ से जेलेप-ला चौकी खाली कर दी गयी. खाली करते ही चीन के सैनिकों ने आगे बढ़कर उस पर तुरंत कब्ज़ाजमा लिया.
नाथूला का मामला जेलेप-ला से अलग था. नाथूला ऊँचाई पर है और वहाँ से भारतीय सैनिक चीनी क्षेत्र पर नज़र रख सकते हैं.नाथूला का भारत के हाथ से निकल जाना, बड़े ख़तरे को बढ़ावा देना था.
नाथूला की रक्षा की जिम्मेदारी 17 माउंटेन डिविजन की थी जिसकी कमान लेफ्टिनेंट मेजर जनरल सगत सिंह संभाल रहे थे. सगत सिंह तेजतर्रार थे.उन्होंने नाथूला को खाली करने के आदेश को मानने से इनकार कर दिया. उनका तर्क वाजिब था कि अगर नाथूला खाली करेंगे तो चीनी सैनिक सिक्किम तक आ धमकेंगे. सगत सिंह ने अपने अधिकारी के आदेश को नहीं माना और नाथूला सीमा पर चौकसी और बढ़ा दी.
बीच में लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह राठौर
नतीजा यह हुआ कि नाथूला में तनाव बढ़ गया.
दोनों देश के सैनिक आये दिन भिड़ते रहते थे. यह भिड़त अक्सर फिजिकल होती थी और शस्त्रों का इस्तेमाल नहीं होता था. बातों और लातों की यह लड़ाई अब आम हो चुकी थी. धक्का मुक्की की खबरें आती रहती थी. कई महीनों तक स्थिति ऐसी ही बनी रही. बस इंतज़ार था कि कब ये तनातनी लड़ाई में बदल जाए.
भारतीय पक्ष की ओर से तय किया गया कि नाथूला में हम कंटीले तारों की बाड़ लगाएंगे. कहा गया कि इससे हम अपनी सीमा को मार्क करेंगे और सीमा पर तनातनी भी कम होगी. लेकिन शायद भारतीय सेना भी जानती थी कि यह काम आसान नहीं होने वाला है इसलिए सेना के इंजीनियर्स की एक कंपनी को बाड़ लगाने का काम दिया गया तो दूसरी कंपनी को सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गयी.
जनरल सगत सिंह अपने सैनिकों के साथ
बाड़ लगाने का काम जैसे ही शुरू हुआ, चीन की और से उस पर ऐतराज किया गया. उस समय भारत की तरफ से बाड़ लगाने और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे थे लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव. राय सिंह को जनरल सगत सिंह का निर्देश था कि चीन बाड़ लगाने के काम को बन्द करने की अपील करेगा लेकिन हमें ऐसी किसी अपील को नहीं मानना है.
लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह ने अपने अधिकारी के निर्देश को मानते हुए चीन को दो टूक कह दिया कि हम अपनी सीमा पर बाड़ लगा रहे हैं, आप लोग इस काम में रुकावट पैदा न करें.
चीन भी कहां मानने वाला था. उसने भारत को बंदूक से जवाब दिया. चीन की तरफ से अंधाधुंध फायरिंग शुरू हो गयी. लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह खुले में थे उन्हें तीन गोलियां लगी. उनके साथ खुले में काम करने वाले कई और सैनिकों को गोली लगी. लगातार फायरिंग से भारतीय जवानों को संभलने का मौका नहीं मिला. कई जवान मौके पर ही शहीद हो गए.
लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव
बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों की कुर्बानी देखकर जनरल सगत सिंह ख़ुद ही मैदान में आ गए हैं. उन्होंने आव देखा न ताव चीन की ओर तोपों का मुँह तान दिया. तोपों से फायरिंग का आदेश मिलते ही भारतीय जवानों ने दनदनाते गोले बरसाने शुरू कर दिए.
तोप के गोले बरसाने का फैसला बहुत बड़ा फैसला था क्योंकि उस समय ऐसा आदेश केवल प्रधानमंत्री की तरफ से ही दिया जा सकता था लेकिन सगत सिंह अपने जवानों की लाशें देखकर किसी के आदेश का इंतज़ार नहीं करने वाले थे. चीनी सेना जो अब तक भारत पर हावी थी, तोप के फायर के बाद बैकफुट पर आ गयी.
तीन दिन बाद जब युद्ध विराम हुआ तो चीन के लगभग 300 जवान मारे जा चुके थे.
भारतीय सेना के अदम्य साहस से 1962 वाली बुरी यादें पीछे छूट गयीं. सेना का मनोबल अब सातवें आसमान पर था.
भारतीय सेना के इस जबरदस्त जवाब का भारत को दूरगामी अच्छा परिणाम मिला. 1971 में जब भारत की सेना पाकिस्तानी सेना से भिड़ रही थी तब भी पाकिस्तान की ओर से चीन से मदद मांगी गयी लेकिन इस बार चीन मदद देने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. चीन के लिए 1971 में स्थिति भी अच्छी थी क्योंकि तब भारत सरकार पर अमेरिका की सरकार का भी दवाब था. इतना सब होने के बावज़ूद चीन पाकिस्तान की मदद के लिए आगे नहीं बढ़ पाया.
सगत सिंह के तात्कालिक फैसलों ने न केवल भारतीय सैनिकों का मनोबल बढ़ाया बल्कि यह भी जता दिया कि 1962 में चीनी धोखे से हमारा ज़्यादा नुक़सान कर गए थे. हमारे हौसले न तब कम थे न आज कम हैं.
इस घटना के बाद जनरल सगत सिंह पर उच्च अधिकारियों का आदेश न मानने पर अनुशासनात्मक कार्यवाई की गयी और उनका तबादला कर दिया गया लेकिन यह कार्यवाई सेना के अनुशासन को बरक़रार रखने के लिए जरुरी दिखावा मात्र थी.
1971 की लड़ाई सगत सिंह फिर कमांडिंग पोजिशन में थे. बांग्लादेश की आजादी का श्रेय उन्हें ही जाता है. सेना की पूरी कारवाई उन्हीं की बनाई योजना के तहत हुई और उसमे बड़ी कामयाबी हासिल हुई.
और फिर आयी वो आइकोनिक फोटो जिसमें पाकिस्तानी जनरल नियाजी भारतीय जनरल जगदीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण के प्रपत्र पर हस्ताक्षर कर रहा है, और पीछे खड़े हैं-लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह.
लाल घेरे में लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह
1972 में जनरल सगत सिंह को पद्म भूषण सम्मान दिया गया.
साल 2018 में बॉलीवुड फिल्म पलटन 1967 के घटनाक्रम पर ही बनी है इसमें लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह के किरदार में जैकी श्रॉफ और लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव की भूमिका अर्जुन रामपाल ने निभाई है.
कोरोना वायरस का इनफ़ेक्शन अब काबू के बाहर हो रहा है तो इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? केन्द्र सरकार की या राज्य सरकारों की? किसकी ज़िम्मेदारी ज़्यादा बनती है. चलिए, कुछ दलीलों से होते हुए ज़िम्मेदारी तय करने की कोशिश करते हैं.
सामान्य सी बात है कि ज़िम्मेदारी ऊपर से तय होती है. तो ऊपर से ही बात शुरू करते हैं.
● देश में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को केरल में आया. कोरोना वायरस यहाँ पैदा नहीं हुआ, दूसरे देशों से आया है. दूसरे देश से आने का रास्ता देश के इंटरनेशल एयरपोर्ट्स हैं जो भारत सरकार के अधीन आते हैं. विदेश से सही समय पर आवाजाही रोकने की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की थी, जिसमें वो नाकाम रही.
● मार्च के दूसरे हफ़्ते तक केंद्र सरकार ने कोरोना वायरस को गंभीर समस्या नहीं माना. स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने कहा कि यह ‘हेल्थ इमरजेंसी’ नहीं है. राहुल गांधी समेत कुछ नेताओं ने सरकार को आने वाले ख़तरे के बारे में चेताया भी लेकिन सरकार समर्थकों ने उनकी खिल्ली उड़ाई. सामने खड़ी बड़ी समस्या की अनदेखी की जाती रही.
● हमारे सामने दुनिया भर के उदाहरण थे. WHO के दिशा-निर्देश थे. लेकिन फिर भी हम देर से जागे. जगाने का सबसे पहला अलार्म केंद्र सरकार को बजाना था क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और देशों से नॉलेज शेयरिंग का काम उसका था. मसलन, एयरपोर्ट्स पर कई दिनों तक थर्मल स्क्रीनिंग को ही काफ़ी माना गया. क्वारंटीन को अनिवार्य बनाने में हमने बहुत देर कर दी. जबकि इटली में दुनिया ने देखा था कि कैसे बिना लक्षण वाले लोग कोरोना कैरियर्स बन गए थे.
● कोरोना से जुड़े सभी शुरुआती बड़े फैसले प्रधानमंत्री ने स्वयं लिए. राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई. लॉकडाउन की गाइडलाइन्स भी केंद्र के स्तर से तय की गई. यहां तक कि जब शहरों को अलग-अलग जोन में बांटने की बारी आई तो शुरू में वह भी केंद्र के स्तर पर ही हुआ. दिल्ली में बैठा केंद्र सरकार का अधिकारी केरल के शहर की स्थिति भांप रहा था. तीन महीने के लॉकडाउन के बावजूद अगर हम दुनिया के चौथे सबसे संक्रमित देश हैं तो लॉकडाउन नाकाम रहा. इसकी ज़िम्मेदारी भी केंद्र की अधिक है.
● दुनियाभर में ऐसी मिसालें थीं कि अगर ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग करके कोरोना केस identify कर लिये जाए और उन्हें दूसरों से अलग रखा जाए तो इसे बढ़ने से रोका जा सकता है. भारत शुरुआत से ही टेस्टिंग में काफ़ी स्लो रहा. टेस्टिंग सेन्टर कम थे पर सरकार ने कभी ये बात नहीं स्वीकारी. आज हम दो लाख टेस्ट रोज़ कर रहे हैं, कभी दस हज़ार भी नहीं करते थे. राज्यों को टेस्टिंग किट मिलने में दिक्कतें पेश आईं. केंद्र सरकार के स्तर से यह काम बड़ा ही ढीला रहा.
● स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है. किसी भी बीमारी के इलाज की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की है. स्वास्थ्य बजट का 60 फीसदी से ज्यादा राज्य सरकारें तय करती हैं बाकी केंद्र सरकार. इसलिए कोरोना में उपचार की व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी राज्य की अधिक है. अगर वहाँ कमी होती है तो वो राज्य सरकार का फेलियर है.
दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है इसलिए इसका केस अलग है. दिल्ली में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं तीन स्तर पर हैं. एम्स, सफदरजंग, आरएमएल जैसे बड़े हॉस्पिटल्स केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन हैं. एलएनजेपी और जीटीबी जैसे हॉस्पिटल राज्य सरकार के अंतर्गत आते हैं जबकि कुछ छोटे हॉस्पिटल एमसीडी के अधीन काम करते हैं. सरकारी हॉस्पिटल्स के अलावा यहां सभी बड़े प्राइवेट हॉस्पिटल्स भी हैं. स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में दिल्ली कागज़ों पर बेहतर दिखती है लेकिन कोरोना काल में यहाँ की स्थिति भी ख़राब है.
केजरीवाल सरकार दावा कर रही है कि हमारे पास पर्याप्त बेड और वेंटिलेटर हैं लेकिन संक्रमित लोगों को हॉस्पिटल्स में एंट्री तक मिलना मुश्किल हो रहा है. जब दिल्ली का ये हाल है तो उन राज्यों का हाल क्या होगा जो हेल्थ इंडेक्स में बहुत नीचे हैं.
● राज्य सरकार के बाद सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी का नंबर हैं. इन पर व्यवस्थाओं को बनाने और लागू करने की जिम्मेदारी है. इनमें पुलिस, प्रशासन, स्वास्थ्य, खाद्य आपूर्ति आदि से जुड़े लोग शामिल हैं.
● जिम्मेदारी के इस क्रम में सबसे आख़िरी जिम्मेदारी देश के उन बेपरवाह नागरिकों की भी है जो ज़रूरी सावधानियों को नजरअंदाज कर रहे हैं.
एक सामान्य नियम से मैंने बात शुरू की थी, और अब एक सामान्य बात आखिर में.
अक्सर नाकामियों के लांछन से ख़ुद को बचाने के लिए सबसे ज़िम्मेदार आदमी, जिम्मेदारी का सारा बोझ ‘सबसे कम जिम्मेदार’ आदमी पर डाल कर निकल लेता है. ऐसा तो नहीं है कि कोरोना काल में भी ऐसा ही हो रहा हो?
पारले-जी भारत का सबसे जाना-माना बिस्किट ब्रांड. जानता हूं कि सही शब्द बिस्किट पर पारले जी मेरे लिए बिस्कुट ही है. बचपन से बिस्कुट और पारले जी, ये दोनों शब्द मेमरी के एक ही खांचे में रहते हैं. 4 रुपये के बिस्कुट का पैकेट हमारे जमाने में खूब लोकप्रिय था, इसमें कुल 16 बिस्किट होते थे और हम गिनकर खाया करते थे.
जीएसटी आने के बाद बिस्कुट पर टैक्स 12 फ़ीसदी से बढ़कर 18 फ़ीसदी हो गया जिसके चलते कंपनी ने पारले जी के पैकेट का दाम एक रुपए बढ़ा दिया और तीन बिस्कुट कम कर दिए. 4 रुपये वाला पैकेट अब 5 रुपए का हो गया और पैकेट में 16 की जगह 13 बिस्कुट कर दिए गए.
इससे पहले साल 2016 में ख़बर आयी कि मुंबई के विले पारले इलाके में स्थित ग्रुप की सबसे पुरानी फैक्ट्री पर ताला लग गया. ख़बर चौकाने वाली थी और कई लोगों को लगा कि अब उन्हें पारले-जी खाने को नहीं मिलेगा. ख़बर के बाद कंपनी ने कहा कि पारले प्रेमियों को चिंता करने की जरूरत नहीं है. सच तो यह है कि हम भारत की अनगिनत जगहों पर बरसों से बना रहे हैं और बनाते रहेंगे पारले-जी, एक ऐसा बिस्किट, जिसे चाहता है पूरा इंडिया।
पारले जी का इतिहास
पारले-जी की शुरुआत उन दिनों हुई जब देश में ब्रिटिश हुकूमत थी. उन दिनों भारतीय बाज़ार में ब्रिटिश कंपनियों की Candy ख़ूब प्रचलित थी लेकिन उसका दाम इतना था कि आम लोग चाहते हुए भी नहीं ले पाते थे.
उसी समय स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित एक भारतीय व्यापारी मोहनलाल दयाल ने ब्रिटिश candy के जवाब में भारतीय Candy लाने का मन बनाया. मोहनलाल रेशम का व्यापार करते थे और उनके लिए यह नया बिजनेस बिल्कुल भी आसान नहीं था लेकिन उन्होंने ठान लिया कि उन्हें करना है. वो जर्मनी गए वहाँ उन्होंने सबसे पहले Candy बनाने के गुर सीखे फिर कुछ हजार रुपये में मशीन भारत ले आए. मुंबई के विले पारले इलाके में एक पुरानी फैक्टरी ख़रीद कर उन्होंने कैंडी बनाने का काम शुरू किया.
शुरुआत में उनके परिवार के कुछ सदस्य ही फैक्टरी में काम करते थे. साल 1929 में उन्होंने पारले Candy बाजार में उतार दी. यह एक Orange Candy थी जो थोड़े ही समय में भारतीय बाजार में काफी पसंद की जाने लगी. इसके बाद कई और तरह की कैंडी बनाई जाने लगी. उस समय अंग्रेजी सरकार के लोग चाय के साथ बिस्किट खाते थे जो केवल पैसों वालों के खाने की चीज़ समझी जाती थी. तब मोहनलाल ने विचार किया कि क्यों ना भारत में कैंडी की तरह बिस्किट भी बनाया जाए और उन्होंने पहली बार साल 1939 में पारले-ग्लुको के नाम से बिस्किट बनाना शुरू किया. गेहूं से बना यह बिस्किट काफ़ी सस्ता था और इसे लोग आसानी से खरीद पाते थे. जल्द ही यह बिस्किट आम भारतीयों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया.
सेकंड वर्ल्ड-वार के बाद गेंहू की किल्लत की वजह से बिस्किट का काम ठप हो गया और आजादी के बाद तक स्थिति खराब रही. बाद में जब काम शुरू हुआ तब तक कई और ब्रांड मार्किट में आ गए. इन नए ब्रांड्स ने भी अपने नाम में Glucose जोड़ दिया जिससे पारले-ग्लूको की सेल पर असर हुआ. 1980 में Parle-Gluco की जगह Parle-G नाम रख दिया गया. कंपनी G का मतलब जीनियस बताती है.
सस्ता और स्वादिष्ट
Parle-G की सबसे ख़ास बात यह थी कि यह बिस्किट मार्किट में उपलब्ध दूसरे ब्रांड के बिस्किट से सस्ता है.आम आदमी तक इसकी पहुंच है.अपनी कम कीमत, उच्च गुणवत्ता और मज़बूत ब्रांड इमेज के कारण ही इसने अपने ग्राहकों के लिए उच्च मूल्य स्थापित किया है. 90 के दशकमें कंपनी ने पारले-जी की मार्केटिंग के लिए टीवी विज्ञापन दिए जो काफी लोकप्रिय हुए. “स्वाद भरे शक्ति भरे बरसो से” पारले जी के विज्ञापनों की टैग लाइन थी.
लगातार कई सालों तक बिस्किट का दाम नहीं बढ़ाया गया. साल 2011 में नील्सन द्वारा किए एक सर्वे के मुताबिक ये दुनिया में सबसे ज़्यादा बिकने वाला बिस्किट था.
पारले-जी से जुड़ी ताजा ख़बर आयी है कि कोरोना के चलते lockdown में इस बिस्किट की रिकॉर्ड बिक्री हुई है। इतनी कि उसने पिछले 82 सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. इसकी एक बड़ी वजह यह लगती है कि कोरोना काल में लोगों ने घर में बिस्किट का खूब इस्तेमाल किया, पारले-जी आसानी से उपलब्ध था और सस्ता था. दूसरी बड़ी वजह यह भी रही कि इस बीच ज़रूरतमंद लोगों के बीच इसे बांटा गया. सबकी पहली पसंद पारले जी बिस्किट रही.
“2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद जब नरेंद्र मोदी संसद पहुंचे तो उन्होंने वहाँ मौजूद सावरकर के चित्र के आगे श्रद्धा से हाथ जोड़े लेकिन उनकी पीठ गांधी के चित्र की तरफ थी। ये अनजाने में हुआ होगा लेकिन दरअसल अगर आपको सावरकर को सम्मान देना है तो आपको गाँधी की विचारधारा की तरफ़ पूरी तरह से पीठ घुमानी ही पड़ेगी। गांधी को स्वीकारना है तो सावरकर को नकारना होगा।”~निरंजन तकले ( सावरकर पर शोध करने वाले)
विनायक दामोदर सावरकर को ‘वीर सावरकर’ कहकर पुकारा जाता हैऔर हिंदुत्व की विचारधारा के जनक के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है लेकिन इतिहास को केवल श्रद्धा से नहीं, विवेक से भी देखा जाना चाहिए। श्रद्धा स्मारक बनाती है, विवेक इतिहास। तो आइए, सावरकर के जीवन के उन पहलुओं को तथ्यों के आलोक में समझें जो अक्सर नारों और प्रचार की धुंध में छिप जाते हैं।
सावरकर और ‘Two Nation Theory’: विचारधारा की बुनियाद
भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के लिए आमतौर पर मोहम्मद अली जिन्ना को दोषी ठहराया जाता है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्य यह है कि ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ की पहली स्पष्ट घोषणा 1937 में सावरकर ने हिंदू महासभा के अधिवेशन में की थी…जिन्ना से तीन वर्ष पहले।
उन्होंने कहा: “भारत में दो राष्ट्र बसते हैं–एक हिंदू, दूसरा मुस्लिम।”
यह कथन महज़ भाषण नहीं था बल्कि उस विचारधारा का बीज था जिसमें धार्मिक पहचान को राष्ट्रीय पहचान से ऊपर रखा गया। यह विचार गाँधी के ‘राष्ट्र एक है’ सिद्धांत के एकदम विपरीत था।
स्वतंत्रता संग्राम और अंग्रेजों से क्षमायाचना
सावरकर 1910 में गिरफ़्तार हुए और उन्हें काले पानी की सज़ा हुई। इसमें कोई शक नहीं कि उनका आरंभिक योगदान क्रांतिकारी था लेकिन जो प्रश्न इतिहास बार-बार पूछता है, वह यह है कि क्या एक “वीर” बार-बार क्षमायाचना पत्र (Mercy Petitions) लिखता है?
अंडमान की जेल से 1911 में ही उन्होंने पहला माफ़ीनामा भेजा था जिसमें उन्होंने वादा किया कि भविष्य में वे ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहेंगे। इसके बाद भी उन्होंने कई बार दया याचिकाएँ भेजीं। वहीं, भगत सिंह, जिन्हें सावरकर के बाद अंग्रेजों ने पकड़ कर फाँसी दी, के पास भी क्षमायाचना का विकल्प था लेकिन उन्होंने विचारों से समझौता नहीं किया।
तो क्या सावरकर के आत्मसमर्पण को रणनीति कहा जाए या विचारधारा से पलायन?
महिलाओं को लेकर विचार: सभ्यता पर एक प्रश्न
सावरकर ने अपने लेखन में महिलाओं को लेकर कई बार ऐसी बातें लिखीं जिन्हें आज के मानदंडों पर ‘स्त्रीविरोधी’ और अमानवीय कहा जा सकता है। उदाहरणस्वरूप, उन्होंने यह विचार रखा था कि युद्ध में विजेता राष्ट्र को शत्रु राष्ट्र की महिलाओं को ‘लूटने’ का अधिकार होना चाहिए जैसा कि उन्होंने मुस्लिम आक्रांताओं के सन्दर्भ में कहा था। ऐसे विचार किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकते।
अंग्रेजों से पेंशन: सहयोग की कहानी?
यह तथ्य कम चर्चित है कि स्वतंत्रता के बाद नहीं बल्कि ब्रिटिश शासन काल में ही सावरकर को एक ‘पेंशन’ मिलती थी। यह पेंशन क्यों दी जाती थी? यह प्रश्न भी इतिहास के दस्तावेजों में दर्ज है लेकिन उसका उत्तर आज तक स्पष्ट नहीं हो सका।
क्या यह उनके द्वारा बार-बार माफ़ी माँगने का ‘इनाम’ था? या ब्रिटिश सरकार से सहयोग का संकेत?
गांधी हत्या और कपूर आयोग की रिपोर्ट
1948 में जब महात्मा गांधी की हत्या हुई, तो नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे के साथ सावरकर भी अभियुक्तों में थे। सबूतों के अभाव में वे अदालत से बरी हो गए। लेकिन स्वतंत्र भारत में बने कपूर आयोग ने 1967 में कहा:“ऐसा विश्वास करना कठिन है कि सावरकर की जानकारी के बिना गांधी की हत्या की योजना बनी।”
यानी न्यायिक तकनीक ने उन्हें छोड़ा, पर इतिहास की दृष्टि ने नहीं।
आज़ादी के बाद का जीवन: एक मौन अध्याय
1947 के बाद जब देश आज़ाद हुआ, सावरकर 19 वर्ष और जीवित रहे। प्रश्न है कि उन्होंने उस स्वतंत्र भारत के लिए क्या किया? न कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन, न कोई राजनीतिक योगदान, न कोई रचनात्मक साहित्यिक कार्य।
इतिहास के इस मौन काल से बड़ा कोई बयान नहीं होता।
आरएसएस और सावरकर: रणनीतिक दूरी
गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) ने स्वयं को सावरकर से अलग कर लिया था, ताकि बदनामी से बचा जा सके। यही कारण है कि 1950 के दशक में हिंदुत्व की राजनीति सावरकर के नाम से नहीं, बल्कि संघ के संगठनों के नाम से आगे बढ़ी।
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सावरकर के प्रारंभिक जीवन की क्रांतिकारिता और उनका बौद्धिक तेज निर्विवाद है। लेकिन वही तेज जब किसी विशेष धार्मिक पहचान की श्रेष्ठता का घोषणापत्र बन जाए तब वह राष्ट्रीयता नहीं, विभाजन का औज़ार बन जाता है।
इतिहास को श्रद्धांजलि देने की नहीं, उसका सामना करने की ज़रूरत होती है और अगर आपको सावरकर को पूरी श्रद्धा से देखना है तो गांधी की पूरी विचारधारा से पीठ मोड़नी ही पड़ेगी।
“क्या करें? इस जिंदगी का अब क्या फ़ायदा? मैंने तो देश के लिए ज़िन्दगी कुर्बान करने की कसमें खाई थी लेकिन जिसके भरोसे ये कसम खाई थी उसने देश को ख़ुद ही बर्बाद कर दिया। अब मैं जी नहीं सकता। इस जीवन को समाप्त कर दूंगा लेकिन मैं तुमसे और अपने प्यारे बेटे से बहुत प्यार करता हूँ, तुम्हारी जिंदगी कैसे ले सकता हूँ?”
यह कहकर वो अपनी पत्नी के सामने रोने लगा।
ये कहानी उस भक्त की है जिसने अपना तन-मन-धन एक इंसान की व्यक्ति में लगा दिया क्योंकि उसे लगता था वो इंसान नहीं भगवान का अवतार है जो उसके देश का उद्धार करेगा, हर संकट से उबार देगा लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं और देश और ज़्यादा बर्बादी की कगार पर जा पहुंचा। सामाजिक, आर्थिक हर मोर्चे पर देश को शिकस्त खानी पड़ी। उसने देशवासियों को भरोसा दिया था कि देश के सम्मान की रक्षा करेगा, देश को बंटने नहीं देगा लेकिन नौबत ऐसी आयी कि देश के बीच में ही दीवार खड़ी हो गयी।भक्त की मन-स्थिति पर इसका ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसने पत्नी-बच्चे समेत अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय ले लिया। वो आत्मग्लानि से भर चुका था और यह सब अपनी पत्नी से बता रहा था लेकिन अपने मां-बाप की सारी बातें 11 साल के बेटे ने चुपके से सुन ली थी।
नाज़ी झंडे के साथ ख़ुश होते बच्चे
अगले दिन भक्त अपने बेटे के साथ उसके पसन्दीदा बाग़ में गया, उसके साथ ख़ूब खेला, पुराने गीत गाये, मस्ती की, पुरानी यादें ताजा की और शाम को थक-हार कर अपने बेटे को ख़ुद से लिपटा कर सो गया। अगले दिन भक्त दफ्तर गया और वहां उसने आत्महत्या कर ली। परिवार से इतना प्यार था कि वो अपनी पत्नी और बेटे को नहीं मार सका। भक्त के बच्चे के मन पर इसका इसका ऐसा प्रभाव पड़ा कि अगले कई सालों तक उसने मां का दिया हुआ खाना नहीं खाया, डर था कि कहीं उसकी माँ उसे मार न दे।
अब बात भक्त के भगवान की बात। था तो वो इंसान ही लेकिन अपने इर्द-गिर्द उसने ऐसा माहौल तैयार कर लिया था कि लोगों को लगता था कि वो कोई अवतार पुरुष हैं। लोग उसकी किसी भगवान की तरह ही पूजा करते थे। उसके हर फैसले को मास्टरस्ट्रोक समझते थे। वो ज़बरदस्त वक्ता था। ऐसा कि अपनी भाषण शैली से लोगों मंत्र-मुग्ध कर लेने की अद्भुत शक्ति उसके पास थी। उसके भाषणों में राष्ट्र को सम्मान लौटाने की स्वप्नगाथाएँ होती थीं। वो लोगों को रोजगार, नौजवानों को बेहतर भविष्य का सपना दिखाता था। पड़ोसी देशों का डर दिखाता था और विदेशी साजिशों को मुहंतोड़ जवाब का भरोसा देता था।
नाज़ी आर्मी
वो बड़ी बड़ी रैलियों, सभाओं को संबोधित करता था। जहॉं भक्तों की बड़ी फौज अग्रिम पंक्तियों में बैठकर ताली बजाने और शोर मंचन के लिए होती थी। इन रैलियों में ऐसा माहौल तैयार किया जाता था कि मानो सब उसके मुरीद हैं। प्रचार-प्रसार उसे ख़ूब पसंद था। उसके भक्त ऐसा प्रचार करते थे कि मुल्क की तबाही के दौर में उनके लिए किसी फरिश्ते ने अवतार लिया है। उसके आकर्षण का ऐसा ताना-बना रचा गया कि उसकी भव्य रैलियों में लाखों की भीड़ होती थी।
हे मोकंब्बो (नाज़ी प्रणाम)
बात गुज़रे दौर की है इसलिए इधर वाले भक्त दिल छोटा न करें। बच्चे का नाम हेलमुट था और उस महान भगवान का नाम एडोल्फ़ हिटलर।