CAA पर लगातार सत्ता के समर्थकों की तरफ से दावा किया जा रहा है इस कानून से किसी को कोई परेशानी नहीं होगी। यह ‘नागरिकता’ देने का कानून है न कि नागरिकता छीनने का।
मेरे सीधे सवाल….
CAA में स्पष्ट रूप से केवल तीन पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है। अगर नागरिकता देने का आधार धार्मिक रूप से प्रताड़ना ही है तो भारत के पड़ोस में श्रीलंका है, जहां तमिल हिन्दू प्रताड़ना का शिकार हैं। चीन है, जहां से तिब्बती शरणार्थी भारत आते हैं। म्यामांर है, जहां से बड़ी संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी हैं। इन्हें अलग क्यों रखा गया है? केवल इस्लामिक देशों के हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई धर्म के लोगों को भारत की नागरिकता देने की बात कर अपने देश में हिन्दू-मुसलमान की डिबेट को बढ़ावा देना नहीं है??हमारा देश एक धर्म के आधार वाला देश नहीं है। सर्व धर्म समभाव वाला देश है। याद कीजिये, स्वामी विवेकानन्द का अमेरिका में दिया वो ऐतिहासिक भाषण जिसमें उन्होंने ज़ोर देकर कहा था कि उन्हें गर्व है कि वो ऐसे देश से आते हैं जिसने दुनिया भर के लोगों को बिना किसी धार्मिक भेदभाव के शरण दी है।तो क्या यह कानून ‘आईडिया ऑफ इंडिया’ के खिलाफ़ नहीं है?
सरकारी पक्ष की तरफ से लगातार कहा जा रहा है कि यह कानून तीनों इस्लामिक देशों के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का भरोसा देता है लेकिन प्रताड़ना के नाम पर भारत की नागरिकता देने पर क्या अल्पसंख्यकों के साथ उनके देश में अत्याचार और नहीं बढेगा?जैसे हमारे देश में पाकिस्तान भेजने वाले लोग हैं वैसे ही उधर भी ‘भारत चले जाओ’ कहने वालों की संख्या में इजाफ़ा नहीं होगा?
अमित शाह ने बिल पेश करते समय संसद के अंदर कहा की 31 दिसम्बर 2014 के पहले आये प्रताड़ित लोगों को नागरिकता दी जाएगी। अगर इन तीन देशों से 2014 से पहले आये गैर मुस्लिम की संख्या की बात करें तो वो कुछ हज़ारों में ही हैं, जो पहले से ही देश में रोजी-रोटी कमा रहे हैं। तो क्या महज़ 30 हज़ार लोगों के लिए देश भर की एकता ख़तरे में नहीं डाल दी गयी?
अगर कल इस कानून के ज़रिये किसी ग़लत इंसान को नागरिकता मिल जाए और वो भारत के सरकारी महकमों में पहुंच कर भारत की सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा कर दे तो?
अगर भविष्य में पाकिस्तान भी अपने देश में ऐसा कोई कानून बना दें और कहे कि भारत से प्रताड़ित मुसलमान का उनके देश में स्वागत है, उन्हें पाकिस्तान की नागरिकता दी जाएगी तो क्या भारत उसे स्वीकार कर पायेगा?
हमारा देश एक धर्म के आधार वाला देश नहीं है। सर्व धर्म समभाव वाला देश है। याद कीजिये, स्वामी विवेकानन्द का अमेरिका में दिया वो ऐतिहासिक भाषण जिसमें उन्होंने ज़ोर देकर कहा था कि उन्हें गर्व है कि वो ऐसे देश से आते हैं जिसने दुनिया भर के लोगों को बिना किसी धार्मिक भेदभाव के शरण दी है।तो क्या यह कानून ‘आईडिया ऑफ इंडिया’ के खिलाफ़ नहीं है?

सरकारी पक्ष की तरफ से लगातार कहा जा रहा है कि यह कानून तीनों इस्लामिक देशों के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का भरोसा देता है लेकिन प्रताड़ना के नाम पर भारत की नागरिकता देने पर क्या अल्पसंख्यकों के साथ उनके देश में अत्याचार और नहीं बढेगा?जैसे हमारे देश में पाकिस्तान भेजने वाले लोग हैं वैसे ही उधर भी ‘भारत चले जाओ’ कहने वालों की संख्या में इजाफ़ा नहीं होगा?
अमित शाह ने बिल पेश करते समय संसद के अंदर कहा की 31 दिसम्बर 2014 के पहले आये प्रताड़ित लोगों को नागरिकता दी जाएगी। अगर इन तीन देशों से 2014 से पहले आये गैर मुस्लिम की संख्या की बात करें तो वो कुछ हज़ारों में ही हैं, जो पहले से ही देश में रोजी-रोटी कमा रहे हैं। तो क्या महज़ 30 हज़ार लोगों के लिए देश भर की एकता ख़तरे में नहीं डाल दी गयी?
अगर कल इस कानून के ज़रिये किसी ग़लत इंसान को नागरिकता मिल जाए और वो भारत के सरकारी महकमों में पहुंच कर भारत की सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा कर दे तो?
अगर भविष्य में पाकिस्तान भी अपने देश में ऐसा कोई कानून बना दें और कहे कि भारत से प्रताड़ित मुसलमान का उनके देश में स्वागत है, उन्हें पाकिस्तान की नागरिकता दी जाएगी तो क्या भारत उसे स्वीकार कर पायेगा?
CAA और NRC जुड़ जाते हैं तो?
अमित शाह में बिल पेश करते समय अपने संसदीय भाषण में कहा कि इस कानून के तहत 31 दिसम्बर 2014 से पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जो कि इस्लामिक देश हैं से आये हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई जो कि प्रताड़ित होकर भारत आये हैं उन्हें भारत की नागरिकता मिल जाएगी जिसके बाद भारत के नागरिक को मिलने वाली तमाम सुविधाओं के वो हक़दार होंगे। अपने इसी भाषण में अमित शाह ने कहा कि 19 जुलाई 1948 के बाद भारत आये घुसपैठिये की पहचान कर उसे एनआरसी के तहत बाहर किया जाएगा।
गृह मंत्री दो विरोधाभासी बातें लगातार कह रहे हैं। एक तरफ़ वो कह रहे हैं कि CAA और NRC को जोड़कर लोग अफ़वाह फ़ैला रहे हैं कि देश के मुसलमानों को देश से बाहर कर दिया जाएगा। दूसरी तरफ वो खुद कह चुके हैं पहले CAA आएगा फिर देशभर में NRC को लागू किया जाएगा और NRC की लिस्ट में जगह न बना पाने वाले हिंदुओं को नागरिकता दी जाएगी बाकियों को घुसपैठिया मान कर देश से निकाल दिया जाएगा।
अपने एक पुराने इंटरवियू में शाह बंगाल चुनाव प्रचार के समय ममता बनर्जी को चुनौती देते हुए कहते हैं कि क्या वो नहीं चाहती कि बंगाली हिंदुओं को देश की नागरिकता मिलनी चाहिए।
एक तरफ़ शाह एक-एक घुसपैठिये को बाहर करने की बात करते हैं दूसरी तरफ NRC की लिस्ट में जगह न पाने वाले गैर मुस्लिम को नागरिकता देने की बात भी करते हैं। जिसका सीधा सा मतलब निकलता है कि अगर CAA और NRC को जोड़ दिया जाए तो इस देश के मुसलमानों की नागरिकता ख़तरे में पड़ सकती है। यही सबसे बड़ी वज़ह है इससे खिलाफ़ प्रदर्शन होने की।
आसाम में क्या हो रहा है?
आसाम में लगभग 19 लाख लोग NRC की लिस्ट में अपनी जगह नहीं बना पाए। जिसमें 13 लाख हिंदू और 6 लाख मुस्लिम/आदिवासी हैं। इन सभी के पास 1971 के पहले के जो डॉक्यूमेंट सबूत के तौर में मांगे गए थे, नहीं थे।
उनसे मांगे गए डॉक्यूमेंट की लिस्ट देखेंगे तो हम सब भी चक्कर में पड़ जाएंगे। वोटर लिस्ट में ख़ुद का नाम, माता-पिता नाम,जमीन का रिकॉर्ड, रिफ्यूजी डॉक्यूमेंट, बैंक डॉक्यूमेंट, LIC पॉलिसी, स्कूल सर्टिफिकेट, पासपोर्ट आदि और सभी डॉक्यूमेंट 1971 के पहले के होने चाहिए।
अगर ये डॉक्यूमेंट हमसे भी मांगे जाए तो कईओं को नहीं मिलेंगे। अमीर आदमी शायद जुगाड़ और पैसे के बल पर डॉक्यूमेंट बना लेगा लेकिन बहुत से बिना डॉक्यूमेंट के ही रह जाएंगे। अब सवाल यही कि जो बिना डॉक्यूमेंट के रह जाएगा और NRC की लिस्ट में अपनी जगह नहीं बना पायेगा उसका क्या होगा??
क्या हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई होने पर उसे नागरिकता दे दी जाएगी और मुसलमान को घुसपैठिया बता दिया जाएगा?
ये अभी केवल आसाम की बात है अगर पूरे देश में यह लागू होता है तो क्या होगा?

चलिए एक बार को मान लिया जाए कि CAA और NRC को नहीं जोड़ा जाना चाहिए तो क्या आसाम में 19 लाख लोग अपनी नागरिकता गँवा देंगे? सोचिये आसाम जैसे छोटे राज्य में संख्या इतनी बड़ी है तो देश भर में यह आंकड़ा कितना बड़ा होगा।
देशभर में NRC बनने, डॉक्यूमेंट जमा करने, अपील की प्रक्रिया पूरी होने तक, फिर नए क़ानून के तहत नागरिकता बहाल होने के बीच कई साल का फ़ासला होगा। इसमें काफ़ी पैसा खर्च होगा। आसाम में 6 साल और 1600 करोड़ रुपये पूरी प्रक्रिया में खर्च हो चुके हैं। देश भर में इस प्रक्रिया को पूरा होने में न जाने कितने साल और पैसा लग जाएगा।
कुल जमा CAA और NRC गांधी, पटेल, विवेकानन्द, अम्बेडकर, भगत सिंह के विचारों के खिलाफ़ है। अशफ़ाक़, सैयद हसन इमाम, अब्दुल गफ्फार खान, मोहम्मद अली जौहर से गद्दारी करता है। जो देश बिस्मिल और अशफ़ाक की दोस्ती की मिसालें देता हो वो देश कैसे ऐसा कानून बना सकता है?

यक़ीन मानिए CAA और NRC के समर्थक लोग इसलिए नहीं है कि उन्हें पाकिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदुओं से प्यार है। दरसलन उन्हें अपने ही देश के मुसलमान से नफ़रत है।
CAA के समर्थन में सारी बेतुकी दलील देते-देते ऐसे लोग इस बात को दबी जुबाँ से स्वीकार भी कर लेते हैं।जो सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते वो भी अगर दिल पर हाथ रख कर सोचेंगे तो उनको भी जवाब में यही मिलेगा कि उन्हें मुसलमान से नफ़रत है।
मैंने कईयों पर यह टेस्ट कर लिया है और अब तक 100% नतीज़ा मिला है।
अदम गोंडवी का एक शेर है कि
मुल्क जाए भाड़ में इससे उन्हें मतलब नहीं
एक ही ख़्वाहिश है कि कुनबे में मुख्तारी रहे।