मेरे शहर सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) के मशहूर शायर और गंगा-जमुनी तहज़ीब के गीतकार अजमल सुल्तानपुरी साहब के दो प्रसिद्ध गीत….
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मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मैं उसको ढूंढ रहा हूं मेरे बचपन का हिंदुस्तान न बंग्लादेश न पाकिस्तान मेरी आशा मेरा अरमान वो पूरा-पूरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं वो मेरा बचपन, वो स्कूल वो कच्ची सड़कें, उड़ती धूल लहकते बाग, महकते फूल वो मेरा खेत, मेरा खलिहान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं वो उर्दू गजलें, हिंदी गीत कहीं वो प्यार, कहीं वो प्रीत पहाड़ी गीतों के संगीत दिहाती लहरा, पुरबी तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मैं उसको ढूंढ रहा हूं वो उर्दू गजलें, हिंदी गीत कहीं वो प्यार, कहीं वो प्रीत पहाड़ी गीतों के संगीत दिहाती लहरा, पुरबी तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मैं उसको ढूंढ़ रहा हूं जहां के कृष्ण, जहां के राम जहां की श्याम सलोनी शाम जहां की सुबह बनारस धाम जहां भगवान करैं स्नान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं जहां थे तुलसी और कबीर जायसी जैसे पीर फकीर जहां थे मोमिन, गालिब, मीर जहां थे रहमत और रसखान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान वो मेरे पुरखों की जागीर कराची, लाहौर और कश्मीर वो बिल्कुल शेर की सी तस्वीर वो पूरा-पूरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं जहां की पाक-पवित्र जमीन जहां की मिट्टी खुल्दनशीन जहां महाराज मोईनुउद्दीन गरीब नवाज हिंदुस्तान मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं ये भूखा शायर, प्यासा कवि सिसकता चांद, सुलगता रवि ये भूखा शायर, प्यासा कवि सिसकता चांद, सुलगता रवि वो जिस मुद्रा में ऐसी छवि करा दे अजमल को जलपान मैं उसको ढूंढ रहा हूं मुसलमां और हिंदू की जान कहां है मेरा हिंदुस्तान
मैं तेरा शाहजहाँ तू मेरी मुमताज महल आ तुझे प्यार की अनमोल निशानी दे दूँ हाय ये नाज़ ये अंदाज़ ये ग़मजां ये गुरूर इसने पामाल किए कितने शहंशाहों के ताज नीमबाज़ आँखों में ये कैफ़ ये मस्ती ये शूरुर पेश करते हैं जिसे अहले नज़र दिल का खिराज ये तबस्सुम ये तकल्लुम ये सलीका ये शऊर शोख़ संजीदा है या दार हँसी सादामिजाज़ आ तेरे वास्ते तामील करूँ ताजमहल आ तुझे प्यार की अनमोल निशानी दे दूँ मैं तेरा शाहजहाँ तू मेरी मुमताज महल मोगरा, मोतियारा बेल-चमेली चम्पा सौसनों, यासमनो, नश्तरनो, सर्वसमन रातरानी, गुले मचकन, गुले नशरीं, सहरा फूल लब, फूल दहन, फूल जतन, फूल बदन मेरी सूरजमुखी, गुल चाँदनी, जूही, बेला हरसिंगारो गुल, कचनार औ गुलनार चमन मेरी नरगिस, मेरी गुल शब मेरी फूल कमल आ तुझे प्यार की अनमोल निशानी दे दूँ मैं तेरा शाहजहाँ तू मेरी मुमताज महल शमा, खुर्शीद, कमर बर्क, शरर, सैयारे है तेरे ही रुख़-ए-अनवार की इन सबमें चमक लाल याकूत शफ़क फूल है ना अंगारे है तेरे ही लब-ओ-रुख़सार की है इन सबमें झलक वही उड़ते हुए छींटे हैं ये जुगनू सारे तेरे सागर से अज़ल ही में गए थे वो छलक बादा-ए-हुस्न मेरे जाम-ए-शफ़क रंग में ढल आ तुझे प्यार की अनमोल निशानी दे दूँ मैं तेरा शाहजहाँ तू मेरी मुमताज महल
18 मई 2019, चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी हेलीकॉप्टर से केदारनाथ पहुंचे, भगवान शिव के दर्शन किये और फिर ख़बर आयी कि मोदी एक गुफ़ा के अंदर साधना करेंगे। थोड़ी ही देर में उनके एकांत साधना के तस्वीरें टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक फैल गयीं।
मोदी चालू आदमी है।
चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद केदारनाथ से फुटेज दे रहा है।टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक पर साहेब ‘काले बादल’ की तरह छा गए। बादल हैं तो राडार में नहीं आएंगे, बेनिफिट तो है ही।चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद भी प्रचार का बेनिफिट।
सूत्रों के हवाले से ख़बर है कि गुफा में मोदी की एकांत साधना से कल रात भगवान शिव प्रसन्न हुए और साक्षात प्रकट होकर बोले वत्स तुम्हें क्या वरदान चाहिए??कोई तीन वरदान मांग लो।
मोदी–भगवन! मुझे वरदान में ऐसी शक्ति दीजिये कि मैं कम से कम एक बार रवीश कुमार को इंटरव्यू दे सकूँ।
भगवान–नहीं, तुम ऐसा नहीं कर पाओगे कुछ और मांग लो।
मोदी–अच्छा भगवन मुझे शक्ति दो कि कम से कम एक बार मैं प्रेस कांफ्रेंस में बैठकर पत्रकारों के सवालों का सामना कर पाऊं।
भगवान–बेटा तुमसे ये भी नहीं हो पायेगा।कुछ और बोलो।
मोदी–अच्छा ठीक है फिर मुझे आशीर्वाद दीजिये कि मैं इंटरवियू में राडार, डिजिटल कैमरा, ईमेल वाली मूर्खता दुबारा न करूं।
भगवान–चलिए पुडुचेरी को वनक्कम।
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और फिर भारत माता की जय बोलकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
वसीम बरेलवी साहब का शेर है– “वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीक़े से मैं ऐतबार न करता तो और क्या करता”
भारतीय राजनीति में यह आम राय है कि नेता और झूठ दोनों एक दूसरे के पर्याय होते हैं. आज के दौर के तमाम नेता इसी रास्ते पर चलते दिखाई देते हैं लेकिन देश के सबसे लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी इस मामले में सबको पीछे छोड़ रहे हैं. विपक्षियों को निशाने पर लेने के लिए, ख़ुद का गुणगान करने के लिए वो लगातार झूठ का सहारा लेते रहते हैं. झूठ और नरेंद्र मोदी एक दूसरे के पर्याय हो चुके हैं.
नरेन्द्र मोदी कथित तौर पर “Entire political Science में पोस्ट ग्रेजुएट हैं. उनकी इतिहास ज्ञान-शून्यता का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि लगातार अपने भाषणों में इतिहास की गलतियाँ करते आये हैं.
मैंने मोदी की कुछ चुनिंदा गलतियां यहाँ रेखांकित की हैं–
मोदी ने बिहार में एक चुनावी सभा में कह दिया था कि सिकंदर महान को गंगा नदी के तट पर बिहारियों ने हराया था जबकि सिकंदर कभी गंगा नदी पार नहीं कर पाया था.
मोदी ने बिहार के गौरवशाली इतिहास का बखान करते हुए प्रसिद्ध तक्षशिला विश्वविद्यालय को बिहार में बता दिया था जबकि तक्षशिला बिहार का में नहीं था.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी को विवेकानन्द से मुख़ातिब करवा दिया, जबकि विवेकानन्द की मृत्यु के समय श्यामा प्रसाद मुखर्जी महज़ कुछ महीनों के थे.
बंगलौर में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 15 अगस्त का प्रधानमंत्री का भाषण लाल दरवाज़े से होता है. लाल किले और लाल दरवाज़े में फ़र्क नहीं पता .
मोदी के अनुसार नेहरू कभी भगत सिंह से नहीं मिलने गए जबकि दस्तावेजों में दर्ज है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लाहौर जेल में 8 अगस्त, 1929 को भगत सिंह और उनके साथियों से मुलाकात की थी, जो प्रशासन के दुर्व्यवहार के खिलाफ जेल में भूख हड़ताल कर रहे थे.
2003 में मुंबई में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वर्ष 1960 से महाराष्ट्र में 26 मुख्यमंत्री हुए हैं जबकि 2003 तक सिर्फ़ 17 नेताओं ने 26 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है.
प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था कि अहमदाबाद नगरपालिका में महिलाओं के आरक्षण का प्रस्ताव सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 1919 में रखा था जबकि यह प्रस्ताव 1926 में दिया गया था.
दिसंबर 2013 में नरेंद्र मोदी ने जम्मू में एक रैली के दौरान कहा था कि मेजर सोमनाथ शर्मा को महावीर चक्र और ब्रिगेडियर रजिंदर सिंह को परमवीर चक्र मिला था जबकि तथ्य ये है कि मेजर सोमनाथ शर्मा को परमवीर चक्र और रजिंदर सिंह को महावीर चक्र मिला था.
नवंबर 2013 में खेड़ा में नरेंद्र मोदी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को गुजरात का बेटा कह दिया और ये भी कह दिया कि उन्होंने लंदन में इंडिया हाउस का गठन किया था. और उनकी मौत 1930 में हो गई थी. दरअसल श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म कोलकाता में हुआ था. उनकी मौत 1953 में हुई थी. दरअसल मोदी श्याम कृष्ण वर्मा की जगह श्यामा प्रसाद मुखर्जी बोल गए.
फरवरी 2014 में नरेंद्र मोदी ने मेरठ में कहा था कि कांग्रेस ने आज़ादी की पहली लड़ाई को कम कर के आँका था जबकि मेरठ में 1857 की क्रांति शुरू हुई थी और कांग्रेस की स्थापन 1885 में हुई थी. 1857 में कांग्रेस का कोई अता-पता नहीं था.
नरेंद्र मोदी ने एक बार कहा था कि जब हम गुप्त साम्राज्य की बात करते हैं कि हमें चंद्रगुप्त की राजनीति की याद आती. मोदी चंद्रगुप्त मौर्य की बात कर रहे थे जिनका गुप्त साम्राज्य से कोई लेना देना नहीं था.
एक रैली में महात्मा गांधी के बारे में चर्चा करते हुए उन्हें मोहनलाल करमचंद गांधी कह दिया.
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कुछ ख़ास मौकों पर मोदी जी झूठ भोलेपन में बोल देते हैं. नरेन्द्र मोदी अपनी सभाओं में, टीवी पर दिए इंटरव्यू में ऐसी कई बातें बोल जाते हैं जिसे उनकी नासमझी समझे, मूर्खता समझे या जल्दबाज़ी में की गई मानवीय गलती.. ऐसे कुछ उदाहरण नीचे दिए हैं (साथ में वीडियो लिंक भी)
(a+b)^2 से extra 2ab मिलता है ये एक्सट्रा 2ab कहाँ से आया? जब भारत और कनाडा मिलते हैं तो एक्स्ट्रा 2ab निकलता है. (16 अप्रैल 2015 कनाडा में मोदी ने अपने भाषण में कहा) https://youtu.be/PyiBdCdJ3h4
इंसान से बोलने में गलतियां होती रहती हैं और ये गलतियां माफ़ी लायक होती है लेकिन नरेंद्र मोदी गलतियों के साथ-साथ समझ-बूझकर झूठ बोलते हैं. झूठ मक्कारी के साथ बोलने में उन्हें महारत हासिल की है. कुछ झूठ उनकी बड़ी-बड़ी बातों का हिस्सा होते हैं मसलन आम भाषा में कहें तो डींग मारने के चक्कर में मोदी शेर और बकरी की दोस्ती तक करा देते हैं. मोदी हम और आप जैसे होते तो चल जाता लेकिन वो लगातार एक प्रदेश की मुख्यमंत्री रहे और अब देश के प्रधानमंत्री हैं. उनका झूठ उनके समर्थकों में उत्साह पैदा भले ही करता हो लेकिन देश का एक प्रधानमंत्री गंभीर बातों को लेकर लगातार झूठ बोलेगा तो वो बेहद चिंताजनक बात है. विरोधियों को खिल्ली उड़ाने का मौका अगर वो ख़ुद ही दे दें तो कोई क्या ही करें.
नरेन्द्र मोदी का झूठ उनकी अभिव्यक्तियों में झलक जाता है. कैमरा देखते ही उनकी भाव-भंगिमा में ख़ास कि़स्म का बदलाव आता है. चेहरे पर कई तरह के भाव आने लगते हैं उनके शरीर में सिहरन साफ झलकता हैं. बनावटी बातों को वो इतनी गंभीरता से कह देते हैं कि सामने वाला आत्ममुग्ध हो जाता है. उनके भाषणों में नाटकीयता होती है. विशेष आभा मण्डल बनाने के लिए कभी वो अलग ही अन्दाज़ में हाथों को उठा देते हैं, कभी मुक्का मारते हैं, कभी ताली पीटते हैं तो कभी भाषण देते-देते अचानक से रुक जाते हैं ताकि मोदी-मोदी का उदघोष उनके भाषण में चार चांद लगा दे योगा का उनका वीडियो, बच्चों के साथ उनका वार्तालाप, एग्जाम वारियर्स का प्रमोशन, फोटो स्टूडियो में घण्टों अलग-अलग अन्दाज़ में खिंचवाए हुए फ़ोटो, उनके चुनाव प्रचार का तरीका और उसकी भव्यता यह सब उनकी अलग राजनीति का हिस्सा है. यह सब उनके झूठ और आत्ममुग्धता की बुनियाद पर खड़ी की गई है. उनके झूठ की फ़ेहरिस्त इतनी लम्बी है कि झूठों की एक लंबी लिस्ट बन सकती है और एक मोटी किताब लिखी जा सकती है.
हमारे सामने समस्या थी कि उस समय Weather अचानक खराब हो गया था,बहुत बारिश हुई थी,आपको याद होगा।
मैं हैरान हूं कि देश के इतने पंडित लोग मुझे इतनी गालियां देते हैं लेकिन उनका दिमाग यहाँ नहीं चलता है..तो 12 बजे..ये भी मैं पहली बार बोल रहा हूँ, हमारे अफ़सरों को क्या लगेगा (कुटिल हँसी) मुझे मालूम नहीं। एक पल हमारे मन में आया कि इस Weather में हम क्या करेंगे? इतना cloud है जा पाएंगे या नहीं जा पाएंगे तो By in large ये opinion आया experts का कि साहब डेट बदल दें क्या?
मेरे मन मे दो विषय आये एक secrecy अभी तक तो secret रहा है लेकिन अगर secrecy में कुछ looseness आयी तो हम कर ही नहीं सकते, हमें कुछ करना ही नहीं चाहिए।
दूसरा मैंने कहा.मैं…I am not a personally जो इन सारे विज्ञान को जानता हूँ…लेकिन मैंने कहा इतना क्लाउड है, बारिश है..तो एक बेनिफिट है कि हम राडार से बच सकते हैं cloud benefit भी कर सकता है। सब उलझन में थे कि क्या करें then Ultimately मैंने कहा ..ठीक है..क्लाउड है..जाईये …चल पड़े…
यह सारी बातें प्रधानमंत्री मोदी ने न्यूज नेशन को दिए गए अपने इंटरवियू में बालाकोट एयर स्ट्राइक के संदर्भ में कहीं)
इंटरव्यू का यह हिस्सा यहां देखें..
इन सबका एक गंभीर पहलू भी है।अगर देश की एयरफोर्स अपने एक्सपर्ट्स की बातों को नजरअंदाज करके मोदी की हवा-हवाई बातों के आधार पर पाकिस्तान पर हवाई हमलें करने गयी तो यह बेहद दुःखद है क्योंकि सेना ने जानबूझकर केवल मोदी के कहने से अपने पायलट्स की जान खतरें में डाल दी।
प्रधानमंत्री मोदी की ‘एक्सपर्ट्स सलाह’ की वज़ह से हमारा एक पायलट उनके कब्जे में आया। एक मिग-21 दुश्मन ने मार गिराया और एक मिग-21 कथित रूप से उन्होंने गिराया जिसमें 5-6 लोग मारे गए।
पिछले पाँच वर्ष में मोदी-सरकार में क्या काम हुए इस पर पूरे चुनाव-प्रचार में बहस कम ही हो रही है।काम का किसी को करना भी क्या है? पांच साल से मनोरंजन तो ख़ूब हो ही रहा है। इस मनोरंजन के दो फ़ायदे हैं। पहला लोग ख़ूब हँस रहे हैं जिससे उनका स्वास्थ्य अच्छा रह रहा है। दूसरा कॉमेडी के ज़रिए रोजी-रोटी चलाने वालों को जोक लिखने के लिए मशक्क़त नहीं करनी पड़ रही है, रोज़ाना नया माल मिल रहा है।ट्विटर पर क्रिएटिव लोगों ने इस अप्रत्याशित घटना क्रम के ख़ूब मजे लिए।
वरुण ग्रोवर ने अपने शो में एक बार कहा था कि हम लोग जिसे जोक समझते हैं वो अगले ही दिन सच हो जा रहा है और यह सब मोदी और उनके लोगों की वज़ह से ही हो रहा है।
‘गप्पू’ और ‘पप्पू’ दोनों ही नरेंद्र मोदी है।
देश का सौभाग्य है कि मोदी जैसे महान प्रधानमंत्री उसे मिला है।ऐसा प्रधानमंत्री न पहले कभी हुआ है और शायद आगे भी नहीं होगा।
धन्य है!
”मैं पहली बार मतदान करने वालों से कहना चाहता हूं कि क्या आपका पहला वोट वीर जवानों को समर्पित हो सकता है जिन्होंने पाकिस्तान में हवाई हमले किए?क्या आपका पहला वोट पुलवामा के वीर शहीदों के लिए हो सकता है?
प्रधानमंत्री मोदी ने 10 अप्रैल 2019 को महाराष्ट्र के लातूर के एक चुनावी भाषण में यही सब कहा था,जी हाँ देश के सबसे लोकप्रिय नेता और पिछले पांच सालों में विकास की गंगा बहा देने वाले प्रधानमंत्री ने आतंकी हमले में मारे गए जवानों के नाम पर अपने लिए वोट मांगा.
भाजपा राष्ट्रवाद को आगे कर 2019 का चुनाव लड़ रही है।
भाजपा के लोग जानते हैं कि अपनी सहूलियत के हिसाब से बनी पिच पर वो अच्छी बैटिंग करेंगे पर साथ ही भाजपा ने इसके लिए ख़ूब तैयारी भी की है और उनकी चुनावी तैयारी बाकी दलों की तुलना में काफ़ी बेहतर भी रहती है।
जब तक विपक्षी दलों के नेताओं ने AC कमरों में बैठकर चाय-समोसे का आनंद लेते हुए 2019 के चुनाव की योजना बनाना शुरू किया तब तक बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह देश के हर राज्य में घूम चुके थे। चुनाव खत्म होने के बाद 5 साल दूसरे दलों के नेता अपने निजी कामों में लग जाते हैं तो वहीं भाजपा अगले चुनाव की तैयारी शुरू कर देती है।
राज्य के हर लोकसभा, लोकसभा के हर विधानसभा, विधानसभा के हर गांव के जातिगत आंकड़े, वोटरों की कुल संख्या,यहां तक कि भाजपा को मिलने वाले संभावित वोटरों की संख्या का अंदाज़ा लगा लिया जाता है और उसके हिसाब से तैयारी की जाती है।अपने पन्ना प्रमुखों को एक एक वोट अपने पक्ष में दिलवाने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है।
जहां जातिगत आंकड़े पक्ष में नहीं दिख रहे होते हैं वहाँ काफ़ी समय पहले से ही धार्मिक ध्रुवीकरण का रास्ता तलाशना शुरू कर दिया जाता है।
हर छोटे-छोटे कार्यक्रम, सरकार की हर योजना को एक बड़ा इवेंट बना कर लोगों तक पहुंचाया जाता है।सरकार की विफलताओं को भी सफलता बना कर प्रचारित करने का हुनर इनमें है। पैसा तो मानों इनके लिए खेत में उग रहा है, कभी भी उसकी कमी नहीं होती है।
बड़ी-बड़ी जनसभाएं, विदेशों में बड़े-बड़े इंवेंट हर चीज़ इनके लिए संभव है।
2019 चुनाव भी लगभग इसी दिशा में बढ़ता हुआ दिख रहा है।राज्यवार भाजपा ने तैयारी की और अपने लिए एक टारगेट सेट किया है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की भाजपा में नैतिकता, मर्यादा, सच-झूठ सब किनारे वैसे भी ताक पर रख दिये गए हैं, चुनावी जीत अंतिम लक्ष्य है, चाहे वो किसी भी कीमत पर मिले।
उन्हें भी पता है कि चुनाव में जीत जाने पर केवल जीत की ही बात होगी बाकी सब भुला दिया जाएगा।
उत्तर प्रदेश जहां कहा जा रहा है कि सपा-बसपा गठबंधन से भाजपा को काफ़ी नुकसान होगा और भाजपा अपना पिछला प्रदर्शन नहीं दोहरा पाएगी वहाँ तमाम आशंकाओं के बावज़ूद भाजपा अच्छा चुनाव लड़ रही है। सपा-बसपा गठबंधन से बाहर रहकर कांग्रेस भाजपा को पर्याप्त फायदा दे रही है और जहां कांग्रेस के मजबूत उम्मीदवार हैं वहां गठबंधन के लिये ख़तरा पैदा हो रहा है।उदाहरण के लिए फतेहपुर सीकरी, बहराईच, सहारनपुर, मुरादाबाद, कुशीनगर,इलाहाबाद, प्रतापगढ़, बाराबंकी,धौरहरा कुछ ऐसी सीट हैं जहां कांग्रेस तीसरे नंबर पर भी रहकर भी भाजपा को जीतने का मौका दे रही है।
रायबरेली और अमेठी के अलावा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस किसी और सीट से जीत जाए तो यह उसके लिए सफलता ही होगी और इस सफलता का श्रेय प्रियंका गांधी को दे दीजियेगा।
उत्तर प्रदेश के अलावा पूर्व में बंगाल और उड़ीसा में भाजपा धमक के साथ चुनाव लड़ रही है। पिछली बार बंगाल में 2 सीट थी इस बार आंकड़ा बढ़ेगा ही ऐसी उम्मीद जताई जा रही है।यहाँ भाजपा बंगाली, गैर बंगाली और मुस्लिम के बीच की खाई बढ़ा कर चुनाव लड़ रही है। इस सब की तैयारी पिछले बंगाल-विधानसभा से ही शुरू कर दी गयी थी। लेफ्ट-दल बंगाल पर हासिये पर जा चुके हैं इसलिए भाजपा वोट ℅ के मामले में अब नंबर 2 पर जा पहुंची है, सीट कितनी जीत पाएगी वो 23 को ही पता चल पाएगा।
उड़ीसा में बंगाल जैसा माहौल बनाने की कोशिश है यहां बीजेपी नवीन पटनायक के पुराने वर्जस्व को तोड़ रही है।
दक्षिण में कर्नाटक के अलावा भाजपा लिए ज्यादा उम्मीद नहीं है। तमिलनाडु में AIDMK से शुरुआत में समझौता करके गठबंधन के लिए ‘कुछ का’ जुगाड़ कर लिया है। केरल में भाजपा कोई सीट भले ही न जीत पाए लेकिन सबरीमाला मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाकर भाजपाइयों ने वहाँ भी अपने लिए वोट प्रतिशत बढ़ाने का मौका बना लिया है।
पश्चिम वैसे भी बीजेपी का गढ़ रहा है।महाराष्ट्र में उद्धव की गालियाँ खा-खा कर भी अंत में हिन्दू-हिन्दू भाई का नारा लगाकर अपना साथी बना लिया। गुजरात और राजस्थान में पहले जैसा परिणाम लाना भाजपा के लिए चुनौती है।
दिल्ली, हरियाणा जैसे छोटे राज्यों में वोट काटने वाले दलों की बदौलत भाजपा आरामदायक स्थिति में है।
शायद 2019 चुनाव मोदी के लिए ठीकठाक चुनौती वाला होता लेकिन तब पुलवामा हुआ और उसके बाद बालकोट, जिसने सारे जरूरी मुद्दे किनारे कर भाजपा को अपनी पसंदीदा पिच पर खेलने का मौका दे दिया।मोदी अपने किसी भी चुनावी भाषण में नोटबन्दी और जीएसटी की बात नहीं कर रहे हैं,स्किल इंडिया,मेक इन इंडिया, स्मार्ट सिटी ये सब तो बहुत पहले ही खत्म कर दिए गए हैं।
अब पाकिस्तान का सहारा है।
मोदी और शाह की अगुवाई में देश के लोगों को बस यह यकीन दिलाने की कोशिश है कि मोदी के हाथों में ही देश सुरक्षित है, पाकिस्तान को केवल मोदी ही जवाब दे सकता है।
1947 से हमने पाकिस्तान से कई सैन्य लड़ाईयां लड़ी लेकिन कौन सी लड़ाई में वो हमें हरा पाया?
हर मोर्चे पर हमेशा भारत ही तो आगे रहा है।1971 में तो हमारी सेना के साहस के आगे पाकिस्तान दो अलग अलग टुकड़ों में बंट गया और उसने इस क़दर घुटने टेके कि उसके लगभग 90 हज़ार जवानों ने भारत के जनरल के सामने आत्मसमपर्ण तक करना पड़ा। तब मोदी और शाह छोटे थे इसलिए उन्हें यह सब याद नहीं होगा।
भारत को असली खतरा तो चीन से हैं,जो सैन्य ताकत में हमसे ज्यादा ताकतवर है, सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है लेकिन मोदी कभी भी पाकिस्तान की तरह चीन को नहीं धमकाते।ढोकलाम पर भी उनका रवैया ढुलमुल ही था। अपने भाषणों में वो चीन का नाम नहीं लेते हैं क्यों? क्योंकि चीन से उनके राष्ट्रवाद को हवा नहीं मिलेगी। चीन का नाम लेकर वो हिन्दू-मुसलमान नहीं कर पाएंगे। चीन का नाम लेकर वो मंदिर-मस्जिद नहीं कर पाएंगे। चीन का नाम लेकर वो श्मशान-क्रबिस्तान की बात नहीं कर पाएंगे। चीन का नाम लेकर ईद-दिवाली की बात नहीं कर पाएंगे लेकिन पाकिस्तान का नाम लेकर वो ये सब आसानी से कर पा रहे हैं।
देश के लिए पुलवामा एक कलंक है लेकिन भाजपा के लिए यह वरदान साबित हो रहा है।
पुलवामा में आतंकी हमला न हुआ होता तो चुनाव में बीजेपी की स्तिथि भी अच्छी न होती।
20 मई 2014 को पहली बार नरेंद्र दामोदरदास मोदी देश के प्रधानमंत्री के रूप में संसद पहुंचे थे। संसद में दाखिल होते समय उन्होंने संसद की सीढ़ियों पर माथा टेका और हाथ जोड़कर प्रणाम किया था।संसद को उन्होंने मंदिर बताया था और कहा था कि संसद को अपराधियों और दागियों से मुक्त करने के लिए जो भी ज़रूरी कदम उनकी सरकार उठा पाएगी, एक साल के अंदर उठाएगी।
2014 में लोकसभा में पहुंचे सबसे ज्यादा सांसद प्रधानमंत्री मोदी की अपनी पार्टी बीजेपी के थे और सबसे ज्यादा दागियों में भी उन्हीं की पार्टी टॉप पर थी।
2014 के बाद अब 2019 आ चुका हैं। देश में पुनः चुनाव चल रहे हैं और 23 मई तक नई सरकार भी आ जायेगी लेकिन मोदी का वो एक साल कब आएगा किसी को ख़बर नहीं।
मोदी सरकार ने दागी सांसद और विधायकों के केस के जल्दी निवारण के लिए भले ही कुछ न किया हो लेकिन उनके पास एक और मौका तब था जब उनकी पार्टी की केन्द्रीय कार्यसमिति लोकसभा-2019 के लिए प्रत्याशियों का चयन कर रही थी।प्रत्याशी चुनते समय वो दागियों को दूर रख सकते थे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मोदी और उनके पार्टी अध्यक्ष के लिए यह सब केवल भाषण के विषय भर है।
याद रहे जब अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे तब वो स्वंय एक आरोपी थे।गुजरात से उन्हें तड़ीपार किया गया था लेकिन बाद में वो सभी आरोपों से मुक्त हो गए।
2019 लोकसभा चुनाव लगभग खत्म होने को है लेकिन इस बार भी कई दागी अलग-अलग पार्टियों से संसद में पहुंचने की दहलीज पर हैं।तमाम दागियों के बीच भाजपा ने आतंकवाद की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को भी भोपाल से उम्मीदवार बना कर संसद पहुंचने का एक मौका दे दिया है।
संसद में पहले भी कई अलग-अलग पार्टियों से संगीन आरोपों वाले लोग पहुंचे हैं लेकिन अगर प्रज्ञा ठाकुर जीत कर संसद पहुंच जाती है तो शायद भारतीय संसद के इतिहास में पहली बार ऐसा होगा कि बम ब्लास्ट की एक आरोपी माननीय सांसद बन कर वहां बैठी होगी। वैसे भी मोदी जी को ‘पहली बार’ में ज्यादा रुचि रहती है तो उनके नाम पहली बार आतंक की आरोपी को संसद पहुंचाने का नया कीर्तिमान हो जाएगा।इससे भी ज्यादा हास्यस्पद क्या होगा कि प्रधानमंत्री मोदी फिर से उसी संसद की सीढ़ियों को सर झुका कर प्रणाम कर रहे होंगे, जिसमें प्रज्ञा ठाकुर सांसद होगी।
भोपाल से भाजपा प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर जमानत पर रिहा है।अदालत को तय करना है कि वो दोषी है या नहीं।
लेकिन अदालत का फैसला आने से पहले ही देश का प्रधानमंत्री और देश की सबसे बड़ी पॉलिटिकल पार्टी का मुखिया उसे निर्दोष बता रहा है। दोनों अपने चुनावी भाषणों में प्रज्ञा पर पुलसिया जुर्म का आरोप लगा रहे हैं और उस पर अन्याय होने की बात लगातार दोहरा रहे हैं।
जब देश का प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी उसे फैसले से पहले ही निर्दोष मानती है तो अदालत में उसके दोषी ठहराए जाने की कितनी संभावना होगी,यह बड़ा सवाल है। अगर प्रज्ञा ठाकुर जीतकर संसद में पहुंच जाती है तो यक़ीनी तौर पर सरकारी जांच एजेंसी जो केंद्र सरकार के अधीन काम करती है उसको दोषी ठहराने के लिए ठीक से काम नहीं ही करेगी।
2014 से पहले मालेगांव ब्लास्ट मामले में जांच एजेंसियों का रुख़ क्या था और 2014 में भाजपा सरकार आने के बाद अचानक से बिल्कुल विपरीत हो गया। इस पर इंडियन एक्सप्रेस ने सिलसिलेवार पड़ताल की है जिसे यहां पढ़ें।
इन सब से इतर एक और जरुरी बात, कोर्ट का फैसला कभी प्रज्ञा के खिलाफ़ भी आ जाये तब भी भाजपा, संघ और उसकी विचारधारा के समर्थक लोग प्रज्ञा को दोषी नहीं मानेंगे क्योंकि उनके हिसाब से प्रज्ञा का अगर मालेगांव ब्लास्ट में कोई हाथ है तो वो अच्छा ही है।
मालेगांव ब्लास्ट मारे गए लोग हिन्दू नहीं मुसलमान थे इसलिए इन लोगों के हिसाब से यह सब ठीक ही हुआ था। यह देशभर में हुए मुस्लिम आतंकवाद का एक रिएक्शन भर था। हमारे आसपास भाजपा के समर्थक तमाम लोग दबी जुबान से यही मानते हैं। जिन्हें मेरी बात पर थोड़ी सी भी शंका है वो नाथूराम गोडसे को याद कर लें।अदालत द्वारा फांसी की सज़ा दिए जाने के बावजूद गोडसे इनके लिए ‘हुतात्मा गोडसे’ है। गोडसे के किये को सही ठहराने के लिए इनके पास कई मूर्खतापूर्ण दलीलें हैं। गांधी पुण्य तिथि को हर साल देश भर में यही लोग गांधी वध के रूप में मनाते नज़र आते हैं। गोडसे जिनका हीरो है प्रज्ञा ठाकुर उनकी ‘शक्ति स्वरूपा’ बनेगी ही।
दाऊद इब्राहिम भी इनकी नज़र में आतंकवादी नहीं होता बशर्ते वो हिन्दू होता और मुम्बई ब्लास्ट में मरने वाले केवल मुसलमान होते।
गर्मी का मौसम है और देश में चुनावी सरगर्मी बढ़ गयी है। सत्ता में चाहे कोई भी आए लेकिन 23 मई को देश में गर्म हवाएँ अपने उफान पर होंगी। गर्म लू के थपेड़ों के बीच अगर ये तीन नौजवान चुनाव जीत कर लोकसभा में बैठते हैं तो यह किसी शीतल हवा जैसा ही होगा और सत्ता संतुलन के लिए भी सकारात्मक होगा ।
‘आज़ादी’ के इन नारों का मतलब तमाम पुरातनपंथी, सामंतवादी और दमनकारी व्यवथाओं से आज़ादी है। कन्हैया की भाषा में कहूँ, तो भारत से नहीं दोस्तों भारत में आज़ादी चाहिए।
जेएनयू कांड के बाद जब पहली बार कन्हैया जेल से लौटे तब जेएनयू में सैकड़ों छात्रों के बीच जोरदार भाषण दिया और उस ऐतिहासिक भाषण के बाद कन्हैया, आज के कन्हैया बन कर उभरे।इसी भाषण में कन्हैया ने मोदी को निशाने पर लिया और कहा-“प्रधानमंत्री जी अपने भाषण में स्टालिन की बात कर रहे थे मेरी इच्छा हुई कि मैं टीवी मैं घुस जाऊँ और उनसे कहूँ कि थोड़ा हिटलर की बात भी कीजिए थोड़ा मुसोलिनी की भी बात कीजिए जिसकी काली टोपी आप लगाते है।”उनके उस दिन के पूरे भाषण को यहाँ देखें।
कन्हैया की पहचान केवल आज़ादी के नारे ही नहीं हैं उनके पास विचार भी हैं वो अपने बेहतरीन भाषणों के लिए जाने जाते हैं। अपने भाषण में वो शब्दों के सहज चयन, व्यंग्य की तीखी मार के साथ कमाल कर देते हैं। उनके भाषण में प्रवाह है, अतिउत्साह है मगर असावधानी बिल्कुल नहीं है। भाषण में व्यंग्य है, तंज है, हाजिरजवाबी है लेकिन अभद्रता नहीं है। यही बात उन्हें इस दौर के सबसे अच्छे राजनीतिक भाषणबाज़ माने जाने वाले मोदी से अलग बनाती है।
कम्युनिस्ट विचारधारा जो अब केवल बंद कमरे में सिगरेट के धुएं के बीच बोझिल भाषा तक ही सीमित रह गयी है, उसे कन्हैया आगे एक नई दिशा दे सकते हैं।पूरे विपक्ष के पास हिंदी में कोई ऐसा आदमी नहीं है जिसकी रीच हो। कन्हैया के पास धर्म और जाति का बैरियर तोड़ कर सब जनों तक पहुँचने वाली आम भाषा है। सवर्ण वर्ग से आने वाले कन्हैया अंबेडकरवाद की बात करते हैं ।वो वामपंथ के क्रांति के रंग लाल को अंबेडकरवाद के नीले रंग से जोड़ने की बात पुरज़ोर तरीक़े से करते हैं।
कन्हैया की बेगुसराय में लड़ाई बहुत मुश्किल है।लोगों के मन उनके देशद्रोही होने की बात इस क़दर भर दी गयी है कि कुछ लोग उनसे नफ़रत करते हैं।साथ ही उन्हें भाजपा और गठबंधन के उम्मीदवार से भी पार पाना होगा जिनका पूरे क्षेत्र में मजबूत जनाधार है। भाजपा के गिरिराज सिंह और आरजेडी के तनवीर हसन राजनीति के पुराने और बड़े खिलाड़ी हैं।
कन्हैया को अपने लोगों की चुनौती से भी पार पाना होगा।बूढ़े नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टियां क्या एक नए लड़के को सहजता से स्वीकार कर पाएंगी? अंग्रेजियत वाले वामपंथी क्या एक हिंदी भाषी कन्हैया को अपना रोलमॉडल बनने देंगे? कन्हैया नीले और लाल रंग को एक साथ लाने की बात करता है, क्या वामपंथ के भद्रलोग इस पर व्यावहारिक सहमति देंगें ? क्या सारी वामपंथी पार्टियां देश को एकसूत्र में बांधने वाले तिरंगे को लाल झंडे से ऊपर रख पाएंगी? क्या वे जयहिंद बोलने में उसी गर्व का अनुभव कर पाएंगी जो लाल सलाम बोलने में उन्हें होता है? यह सारे सवाल हैं जिनका सामना कन्हैया को हमेशा करना पड़ेगा। मीडिया में उनकी अत्यधिक पॉपुलरटी उनके लिए दिल्ली में तो माहौल बना रही है लेकिन बेगूसराय में उनके लिए यह फ़ायदेमंद होगा इस पर संसय है ।
लड़ाई बहुत मुश्किल ना हो तो लड़ने का मज़ा ही क्या है? सरकार की विफलता और नरेंद्र मोदी की आलोचना को हिंदू विरोधी और देश विरोधी बतला कर प्रचारित किया जाता रहा है। कन्हैया कुमार जो अब तक इन सबका सामना बाहर कर रहे थे, संसद पहुंचेंगे तो इन सवालों पर बहुतों की आवाज़ बनेंगे।
मैं उस कल्पना मात्र से उत्साहित हूं कि कन्हैया संसद के निचले सदन में बैठा हो। उस सदन में, जहां मोदी उनके सामने हो।यक़ीन है कि संसद में कन्हैया के तथ्य और तर्क सबको प्रभावित जरूर करेंगे। २०१४ में हम ये दलील सुनते थे कि नया प्रधानमंत्री बोलता तो है, पिछले प्रधानमंत्री की तरह मौन तो नहीं रहता। यदि बोलने की कला इस देश में राजनीतिक कुशलता का पैमाना है तो क्यों न हम उसे सांसद चुनें, जो हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री से भी बेहतर और कहीं बेहतर बोलता है।
वामपंथ का युवा चेहरा सांसद बनने के बाद क्या करता है वो भी देखना अपने आप में अच्छा होने वाला होगा। कन्हैया ग़रीब घर से आते हैं।उनके भाई असली चौकीदार हैं ।उनकी मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। उनकी डिग्री असली है और अब वो डॉ कन्हैया कुमार हैं जिनकी देश को दरकार है।
नाम-आतिशी
लोकसभा क्षेत्र-पूर्वी दिल्ली
पार्टी-आम आदमी पार्टी
आतिशी मरलेना, कम्युनिस्ट माता-पिता ने मार्क्स+लेनिन के नाम को जोड़कर आतिशी के नाम में मरलेना जोड़ दिया। प्रत्याशी घोषित होने के बाद से ही आतिशी ने अपने नाम से मरलेना हटा लिया।कारण पूछने पर पार्टी के लोग बताते हैं कि ’मरलेना’ सरनेम की वजह से बीजेपी और संघ के लोगों ने उनके खिलाफ गैर हिन्दू होने का अभियान चलाना शुरू कर दिया था उन्हें ईसाई बतलाया जाने लगा। जिसके कारण से नाम से मरलेना हटाना पड़ा।
दिल्ली के सेंट स्टीफन्स कॉलेज से जिस साल आतिशी ने इतिहास में ग्रेजुएशन किया उस साल वो ही यूनिवर्सिटी की टॉपर थी।आगे की पढ़ाई उन्होंने ऑक्स्फ़र्ड से की।आतिशी आम आदमी पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी की सदस्य है और पार्टी की पॉलिसी निर्धारण में भी उनकी महत्वपूर्व भूमिका रहती है।आम आदमी पार्टी के शुरुआत से ही टीवी बहसों में पार्टी का पक्ष रखने वाली आतिशी के व्यक्तित्व में एक दुर्लभ संयम और सौम्यता है।आम आदमी ने भले ही योगेंद यादव को पार्टी से निकाल दिया हो लेकिन आतिशी की चर्चा लेडी योगेंद यादव की तरह ही होती रही है।
आतिशी का महत्वपूर्ण योगदान दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने में रहा है।’आप’ की सरकार आने के बाद दिल्ली के सरकारी विधालयों में हालात बहुत बेहतर हुए जिसकी तारीफ़ दबी ज़ुबान से विरोधी भी करते रहे हैं।भले ही इन सबका श्रेय शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को दिया जाता हो लेकिन बधाई की असली हक़दार आतिशी ही हैं। आतिशी, मनीष सिसोदिया के सलाहकार के तौर पर एक रुपए महीने के सांकेतिक वेतन पर काम कर रही थीं।
सरकारी स्कूल में बड़े स्तर पर टीचर्स-पेरेंट्स मीटिंग हो या हैप्पीनेस क्लासेस का नया आईडिया, सब आतिशी के दिमाग़ की ही उपज था।प्राइमरी स्कूल में इंफ्रास्ट्रक्चर पर क्या-क्या होना चाहिए उसे उन्होंने जाना और कमियों को दूर किया। कुल मिलाकर दिल्ली के सरकारी स्कूलों के हालात पिछले चार सालों में काफ़ी बेहतर हुए जिसका फ़ायदा पढ़ने वाले बच्चों और उनके अभिवावकों को भी हुआ। पहली बार देश में किसी सरकार ने अपने बजट का बड़ा हिस्सा शिक्षा को अलॉट किया और इसका सदुपयोग आतिशी और टीम ने बेख़ूबी किया।
पूर्वी दिल्ली से आतिशी की लड़ाई मुश्किल है।फ़िलहाल भाजपा और कोंग्रेस ने अपने उम्मीदवार नहीं घोषित किए हैं। आतिशी कई महीनों से प्रचार कर रही हैं जिसका फ़ायदा उन्हें हो सकता है लेकिन आख़िरी मौक़े पर वोटों के बिखराव का सीधा फ़ायदा भाजपा उठा सकती है।
आतिशी पढ़ी लिखी हैं। आतिशी हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में पकड़ रखती हैं। किसी राजनीतिक घराने से नहीं आती हैं।इतिहास की पढ़ाई की है और घर के माहौल के कारण उनके पास एक विचारधारा भी है।उनकी भाषा में किसी और राजनीतिक महिला की तरह अतिउत्साह जैसी बात भी नहीं है।सरल, सौम्य और यूँ कहूँ कि भाषाई मिठास वाली आतिशी अगर संसद में पहुँचेंगी तो न केवल अपनी पार्टी के लिए मददगार साबित होगी बल्कि अपने क्षेत्र के लिए भी कुछ नया और अच्छा कर पाएँगी। जब संसद में किसी एक महिला सांसद की बात आती है तो आतिशी एक सशक्त चेहरा नज़र आती हैं।
नाम-इमरान प्रतापगढ़ी
लोकसभा क्षेत्र-मुरादाबाद(उत्तर प्रदेश)
पार्टी-कांग्रेस
“प्यार की बड़ी इससे और मिसाल क्या होगी,
हम नमाज़ पढ़ते हैं गंगा में वज़ू करके…”
शायर, दोस्त, नौजवान और मजलूमों के मददग़ार इमरान प्रतापगढ़ी वैसे तो प्रतापगढ़ से हैं लेकिन चुनाव मुरादाबाद से लड़ रहे हैं।
जब लोग शायरी का मतलब महबूब की जुल्फ़े, आँचल, उसकी नीली आंखे, चांद-तारे और इश्क़ ही समझते हो तब इमरान प्रतापगढ़ी ने शायरी को एक नया मुक़ाम दिया और सामाजिक मुद्दों को अपनी शायरी के ज़रिए लोगों के बीच पहुँचाया। अपनी पहचान एक विद्रोही शायर के रूप बमें बनायी। इमरान ख़ुद कहते हैं कि वो ग़ालिब नहीं हबीब के वंशज हैं। इमरान ऐसा शायर हैं जो अपनी कलम के सहारे संघ और उसकी विचारधारा से लड़ता दिखता है।
समसामयिक मुद्दे पर इमरान त्वरित बात कह देते हैं।मोदी और उनके चेलों की खिंचाई करते हैं। हाज़िरजवाबी हैं, अच्छे वक्ता हैं।हिन्दू और उर्दू दोनों का बख़ूबी इस्तेमाल करते हैं।रामचरितमानस की चौपाइयां सुनाते हैं ।हिन्दू और मुसलमान दोनों के बीच लोकप्रिय हैं। जिस मुशायरे में उनका नाम होता है, भीड़ काफ़ी जुटती है।
शायर इमरान मज़लूम लोगों की मदद में भी आगे बढ़ते हैं।जेएनयू के गायब छात्र नजीब पर इमरान ने नज़्म पढ़ी और नज़ीब की माँ के दर्द को लोगों से कुछ यूँ साझा किया।
“सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली,
समंदर सी ख़ामोश गहरी है दिल्ली
मगर एक मॉं की सदा सुन ना पाये,
तो लगता है गूँगी है बहरी है दिल्ली
वो ऑंखों में अश्कों का दरिया समेटे,
वो उम्मीद का इक नज़रिया समेटे
यहॉं कह रही है वहॉं कह रही है,
तड़प करके ये एक मॉं कह रही है
नहीं पूछता हो कोई हाल मेरा
कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा”
पुलवामा हमले में उत्तरप्रदेश से शहीद सीआरपीएफ के जवान अवधेश के घर इमरान पहुंचे और अपनी ओर से परिवार को आर्थिक मदद की।मॉब लिंचिंग का शिकार हुए जुनैद, पहलू खान के परिवार की आर्थिक मदद की।मुसलमानों पर हो रहे लगातार हमले के विरोध में इमरान ने अपनी टीम के साथ दिल्ली के जंतर मंतर पर रक्तदान का कार्यक्रम किया जिसमें देश भर से लोग शरीक हुए।
इमरान लगातार अपने मुशायरें में कहते रहें हैं कि आज के हालात बहुत बुरे हैं। आने वाले दिनों के इरादे भी अच्छे नहीं लगते हैं। आपसी भाईचारा ख़तरे में है।नफ़रती ताकतों की देश में हुक़ूमत है। इन नफ़रत फैलाने वालों की संख्या बहुत कम है। ये सिर्फ़ चीखते और चिल्लाते हैं। अगर हम अमन पसंद लोगों को इकठ्ठा करने में कामयाब रहें तो कामयाबी मिल सकती है। समाज में अमन और शांति लाने का यही एक रास्ता है।
‘राह में ख़तरे भी हैं, लेकिन ठहरता कौन है,
मौत कल आती है, आज आ जाये डरता कौन है !
तेरी लश्कर के मुक़ाबिल मैं अकेला हूँ मैं मगर,
फ़ैसला मैदान में होगा कि मरता कौन है !’
मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी के शहर मुरादाबाद से शायर इमरान की चुनावी लड़ाई आसान बिलकुल नहीं हैं। मुक़ाबले में भाजपा के कुँवर सर्वेश और गठबंधन के डॉक्टर एसटी हसन हैं। दोनों मुरादाबाद के पुराने और चर्चित चेहरे हैं और इमरान मुरादाबाद के लिए नए हैं।वोटों का बिखराव यहाँ भाजपा को फ़ायदा पहुँचा दे इसका भी डर है।
लेकिन उम्मीद पर तो दुनिया क़ायम हैं। 2014 में मोदी लहर के बीच उत्तर प्रदेश से बीजेपी को उम्मीद से भी बेहतर सफलता मिली जिसके कारण एक भी मुस्लिम चेहरा संसद नहीं पहुंचा।इसलिए इस बार मुरादाबाद से एक मुसलमान चेहरा संसद पहुंचना चाहिए। सोने पर सुहागा हो, अगर वह मुसलमान नौजवान हो और इमरान हो।
देश को आजतक मोदी जी जैसा प्रधानमंत्री नहीं मिला है। ऐसा प्रधानमंत्री जो 18 घंटे बिना थके बिना रुके लगातार काम करता हो। रात में बस 4 घंटे सोता हो। सुबह उठकर नियमित योगासन करता हो। नहा-धोकर प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करता हो। वाकई देश धन्य है ऐसा प्रधान सेवक पाकर।
मोदी जी ही थे जिन्होंने पाकिस्तान में घुस कर एयर स्ट्राइक करने का पूरा मास्टर प्लान तैयार किया और फिर उसे वायु सेना के अधिकारियों को दिया। ख़ुद रात भर जगकर बिना कुछ खाये पिये इस योजना को सफल बनाया। एयर स्ट्राइक पर गए पायलट्स को दिल्ली में अपने सरकारी घर पर बने कंट्रोल रूम से लगातार निर्देश दिया कि आतंकियों का ठिकाना कहाँ है और उस पर कब और कैसे अटैक करना है। कुछ लोग तो ये भी बताते हैं कि मोदी जी ख़ुद एक मिराज विमान लेकर पाकिस्तान के अंदर घुसे थे और पूरे ऑपेरशन को अंजाम तक पहुंचाया। लेकिन उनका दिल इतना बड़ा है कि ये बात किसी और को नहीं बताई और इसका कभी श्रेय नहीं लिया। जब तक ऑपरेशन खत्म नहीं हुआ और पायलट्स सकुशल वापस नहीं लौटे, उन्होंने कुछ नहीं खाया-पिया। ऑपेरशन की सफलता के बाद ब्रह्म मुहर्त में उन्होंने दुर्गा सप्तशती का पाठ किया और मौजूद सभी भक्तों को प्रसाद बांटा। भक्त-जन मोदी जी के हाथों से प्रसाद पाकर अभिभूत हुए। कुछ सौभाग्यशाली भक्तों को मोदी जी के चरणों को धोकर अमृत पीने का भी मौका मिला।
सूर्योदय के बाद दैनिक क्रिया से निवृत्त हुए बिना उन्होंने केबिनेट सिक्योरिटी कॉउंसिल की बैठक की। पूरे ऑपेरशन के बारे में सबको बताया। सबने खड़े होकर करतल ध्वनि से उनका अभिवादन किया। फिर जलपान किये बिना ही वो राजस्थान के चुरू में एक सभा में पहुंचे वहां उन्होंने एक वीर रस की कविता पढ़ी—
“सौगंध देश की खाता हूं देश नहीं झुकने दूंगा देश नहीं मिटने दूंगा”
कविता सुनकर मेरे जैसे तमाम लोगों के रोगंटे खड़े हो गए और मुंह से अनायास ही निकल पड़ा ‘वाह मोदी जी वाह’।
इसके बाद दोपहर का खाना खाए बिना पराक्रमी प्रधानमंत्रीजी दिल्ली आए और अचानक से मेट्रो से इस्कॉन टेम्पल पहुँचे। मेट्रो की यात्रा के दौरान उन्हें दो मुस्लिम बंधु मिले जिनसे मोदी जी बड़ी आत्मीयता से मिले। मुस्लिम बंधु भी उनसे मिलकर भावविभोर हो उठे। उनके चेहरे का हाव-भाव बतला रहा था कि आज उन्हें साक्षात किसी दिव्य पुरुष के दर्शन हुए हैं। इस्कॉन टेम्पल में मोदी जी ने विश्व की सबसे बड़ी गीता का अनावरण किया और भगवान कृष्ण की भांति गीता का उपदेश देकर सभी भक्तों का मार्गदर्शन किया।
सच कहूं तो मोदी जी इस कलयुग में भगवान कृष्ण का साक्षात अवतार हैं लेकिन भारत के कुछ गिने-जुने सेक्युलर, कांग्रेसी, आपिये, टुकड़े-टुकड़े गैंग, डिज़ाइनर पत्रकारों को मोदी जी की अहमियत नहीं समझ आती है। एक फकीरी सी है उनके स्वभाव में।
बस मैं उम्मीद करता हूँ 2019 ही नहीं, आने वाले सौ जन्मों तक परम पूजनीय, प्रातः स्मरणीय, देवतुल्य, चंद्रगुप्त के अवतार मोदी जी की कृपा भारतवर्ष पर यूँ ही बनी रहे।
दोनों हाथ उठाकर ज़ोर से बोलिये–
“हर-हर मोदी”
~दिलीप ‘देशभक्त’
इस पोस्ट को आग की तरह फेसबुक और व्हाट्सएप पर फैला दो..
हमारे-तुम्हारे मन को युद्धरत और क़बीलाई बना देंगे, यही ख़ुदगर्ज़ मंसूबे हैं, सियासत के खेल अजूबे हैं।
चुनाव करीब है और कुछ लोग सेना जैसी दिखने वाली वर्दी पहनकर वोट मांगने निकले हैं। सत्ता का लालच देश के विचार से आगे बढ़ गया है। भारत पाकिस्तान के बहाने देशभक्त और देशद्रोह के प्रमाण पत्र बांटे जा रहे हैं। झूठ का ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि सच भी झूठा नज़र आने लगा है। तथ्य को पीछे छिपा दिया गया है और झूठ ख़ुद को देशभक्त बतलाकर सच को बेशर्मी से चिढ़ा रहा है।
सत्ता का यह दौर—जहाँ झूठ खुद को ‘देशभक्त’ और सच को ‘देशद्रोही’ कहकर आईने को धिक्कार देता है—अब संस्थाओं को नेस्तनाबूद करने की फेहरिस्त में सेना को आख़िरी मोहरा बना देना चाहता है। एक-एक संस्था को ऐसे कुचला गया है जैसे यह देश नहीं, कोई कंपनी हो, और संस्थाएं बस ‘डिपार्टमेंट्स’ जिन्हें बंद या बदला जा सकता है।
देखिए एक-एक संस्थान का हाल:-
केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI)—‘तोते’ का गला भी घोंट दिया गया
फरवरी 2017 में आलोक वर्मा सीबीआई के प्रमुख नियुक्त किए गए। सीबीआई डायरेक्टर बनने से पहले वर्मा दिल्ली के पुलिस कमिश्नर, दिल्ली में जेलों के डीजीपी, मिज़ोरम के डीजीपी, पुडुचेरी के डीजीपी और अंडमान-निकोबार के आईजी थे। आलोक वर्मा सीबीआई के पहले निदेशक थे जिनके पास इस जांच एजेंसी का कोई अनुभव नहीं रहा था बावजूद इसके उन्हें चीफ़ बनाया गया। उनकी नियुकि से पहले राकेश अस्थाना को सीबीआई का स्पेशल डायरेक्टर नियुक्त किया गया था। राकेश अस्थाना वर्ष 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और स्पेशल डायरेक्टर बनने से पहले सीबीआई में कई भूमिकाओं में काम कर चुके थे।अस्थाना ने कई अहम मुक़दमों की जांच की थी जिनमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का चारा घोटाला भी शामिल था। गोधरा में ट्रेन जलाने की एसाआईटी जांच भी अस्थाना ने की थी इसलिए मोदी और शाह के पसंद के व्यक्ति थे। इनकी नियुक्ति भी विवादित थी क्योंकि इन्हें सीबीआई के नंबर दो अधिकारी आरके दत्ता के ऊपर वरीयता दी गयी थी।
जब आलोक वर्मा सीबीआई चीफ बने तो उन्होंने राकेश अस्थाना की नियुक्ति का न केवल विरोध किया बल्कि कई संगीन आरोप लगाये। जवाब में अस्थाना ने भी आलोक वर्मा पर घूस लेने का आरोप लगाया। हवाला और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में मीट कारोबारी मोईन क़ुरैशी को क्लीनचिट देने में कथित तौर पर घूस लेने के आरोप में सीबीआई ने अपने ही विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज किया। अस्थाना पर आरोप लगा कि उन्होंने मोईन क़ुरैशी मामले में हैदराबाद के एक व्यापारी से दो बिचौलियों के ज़रिये पांच करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी। जिसके बाद राकेश अस्थाना ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर भी इस मामले में आरोपी को बचाने के लिए दो करोड़ रुपये की घूस लेने का आरोप लगाया।दोनों अफसरों के बीच मची रार सार्वजनिक हो गई तो केंद्र सरकार ने दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया, साथ ही अस्थाना के ख़िलाफ़ जांच कर रहे 13 सीबीआई अफसरों का भी तबादला कर दिया गया।आलोक वर्मा सुप्रीम कोर्ट में गए जहां से उन्हें वापस सीबीआई में भेजा गया लेकिन सरकार ने उसी दिन उनका ट्रांसफर फायर सेफ्टी विभाग में कर दिया जिसके बाद उन्होंने स्वेच्छा से रिटायरमेन्ट ले लिया।
सीबीआई की ऐसी दशा पहली बार हुई जहां नंबर एक और दो की लड़ाई हुई और सरकार ने अपनी पसंद वाले को बचाने का भरपूर प्रयास किया।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)—-
सरकार और आरबीआई के बीच विवाद इसलिए शुरु हुआ क्योंकि सरकार आरबीआई के कोष से 3.5 लाख करोड़ रुपये चाहती थी। शुरु में सरकार ने इस मसले पर आक्रामक रवैया अपनाया, यहां तक कि उसने आरबीआई एक्ट की धारा 7 तक के इस्तेमाल की सोच डाली।इस धारा का इस्तेमाल कर सरकार रिजर्व बैंक को निर्देश दे सकती है लेकिन रिजर्व बैंक के 83 साल के इतिहास में किसी भी सरकार ने इसका इस्तेमाल नहीं किया था। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने यह चेतावनी भी दे दी कि सरकार द्वारा आरबीआई की स्वायत्तता को कमज़ोर करना विनाशकारी हो सकता है। लेकिन सरकार अपने रुख़ पर कायम रही। परिणाम यह हुआ कि 61 सालों के इतिहास में पहली बार आरबीआई के गवर्नर ने इस तरह से इस्तीफा दे दिया।
इस्तीफा देने के बाद न ही उन्होंने प्रधानमंत्री और न ही वित्त मंत्री का धन्यवाद किया। उर्जित पटेल के इस्तीफा देने के बाद सरकार ने शशिकांत दास को नया गवर्नर नियुक्त किया जिनकी शिक्षा इतिहास विषय में हुई थी।
केन्द्रीय सतर्कता आयोग (CVC)—
मोदी सरकार ने केवी चौधरी को भारत का अगला सीवीसी नियुक्त किया गया। चौधरी काले धन के मामले में गठित विशेष जांच दल के सलाहकार भी थे।सीवीसी का पद परंपरागत तौर से किसी पूर्व आईएएस को ही मिलता रहा है लेकिन यह पहली बार ही हुआ जब किसी गैर-आईएएस को इस पद पर नियुक्त किया गया। इसके अलावा चौधरी पर कई आरोप भी थे।आरोप था कि चौधरी ने हवाला कारोबारी मोईन कुरैशी को क्लीन-चिट देकर पूर्व सीबीआई डायरेक्टर रंजीत सिन्हा की मुश्किलें आसान कीं, उधर सिन्हा ने उन्हें ‘स्टॉक-गुरु’ घोटाले से आरोपमुक्त कर दिया.
इसके अलावा भी चौधरी पर केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड का चीफ रहते हुए अपने पद का दुरुपयोग करने था अपराधियों को लाभ पहुंचाने के कई आरोप प्रसिद्ध वकील रामजेठमलानी और प्रशांत भूषण ने लगाए थे।
केंद्रीय सूचना आयोग (CIC)—-
केंद्रीय सूचना आयोग में लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने के लिए 20 दिसंबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में चयन समिति की हुई बैठक में चार लोगों को सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त करने की सिफारिश की गई थी। इसके बाद 1 जनवरी, 2019 को सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त होने वालों में पूर्व आईएफएस अधिकारी यशवर्द्धन कुमार सिन्हा, पूर्व आईएएस अधिकारी नीरज कुमार गुप्ता, पूर्व आईआरएस अधिकारी वनजा एन. सरना और पूर्व विधि सचिव सुरेश चंद्रा शामिल थे।
लेकिन आरोप लगा कि केंद्र की मोदी सरकार ने सुरेश चन्द्रा को बिना आवेदन किए ही नियुक्त कर दिया।कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) द्वारा वेबसाइट पर अपलोड की गई नियुक्ति की फाइलों से भी खुलासा हुआ है कि सुरेश चंद्रा ने इस पद के लिए आवेदन ही नहीं किया था। बाद में सुरेश चन्द्रा ने भी स्वीकार किया था कि उन्होंने इस पद के लिए आवेदन नहीं किया था। ध्यान देने वाली बात यह थी कि सुरेश चंद्रा वित्त मंत्री अरुण जेटली के निजी सचिव रह चुके थे और सूचना आयुक्त को चुनने वाली कमेटी में अरुण जेटली सदस्य भी थे।
भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान (FTII)—
फिल्म इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया जो कि पुणे में स्तिथ है में टेलीविजन कलाकार गजेन्द्र सिंह चौहान को सरकार ने नियुक्त किया जिनकी नियुक्ति को लेकर कई दिनों तक इंस्टीट्यूट में हंगामा होता रहा। इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षण ले रहे छात्र−छात्राएं हड़ताल पर चले गए।भाजपा और सरकार के लोगों ने हड़ताल कर रहे छात्र-छात्राओं को देशद्रोही तक बतला दिया.कई महीनों तक चले धरने, प्रदर्शन और प्रशिक्षण के बहिष्कार के बाद आखिरकार केंद्र सरकार को चौहान को हटाकर अभिनेता अनुपम खेर को अध्यक्ष नियुक्त करना पड़ा। फिलहाल खेर ने भी अपनी व्यस्तता के चलते इस्तीफा दे दिया है।
केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC)—-
यह संस्था भी केंद्र सरकार की वजह से विवादों में रही।केंद्र सरकार ने पहलाज निहलानी को इसका चेयरमैन नियुक्त किया। निहलानी जबरदस्त विवादों में घिर गए। निहलानी पर अनावश्यक रूप से फिल्मों को पास करने में अड़ंगे लगाए जाने के आरोप लगे।साथ ही निहलानी अपने स्तरहीन बयानों के लिए सरकार की किरकिरी कराने लगे। उनके कामकाज से खफा होकर फिल्म इंडस्ट्री में भी व्यापक असंतोष रहा।केंद्र सरकार पर बोर्ड के जरिए छिपे हुए एजेंडे के अनुरूप काम करने के आरोप लगे। सरकार की ज्यादा किरकिरी होने पर निहलानी को रूखसत होना पड़ा और फिर भाजपा के चुनावी गीत लिखने वाले गीतकार प्रसून जोशी की एंट्री हुई और उन्हें बोर्ड का नया चेयरमैन नियुक्त किया गया।
लोकपाल (Lokpal)—
लोकपाल तो याद ही होगा।हो सकता है हाथ में तिरंगा लेकर, सफेद टोपी पहनकर आप और हम इस आंदोलन का हिस्सा रहे हों। कांग्रेस सरकार ने जाते-जाते भारी दवाब में लोकपाल कानून संसद में पास कर दिया जिसे विपक्षी पार्टी भाजपा ने भी पूरा समर्थन दिया था। अब भाजपा सरकार में हैं और कार्यकाल खत्म होने को है लेकिन लोकपाल का अता पता नहीं है।सुप्रीम कोर्ट के दवाब के बाद सरकार ने 28 सितंबर 2018 को लोकपाल अध्यक्ष और उसके सदस्यों के नामों की सिफारिश करने के लिए आठ सदस्यीय एक समिति बनायी थी। समिति की अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई थी। लेकिन अभी तक इस पर कुछ फाइनल नहीं हो सका है।
चुनाव आयोग (ECI)—
2018 में चुनाव आयोग के मुखिया बने एके जोति.ल। एके जोती गुजरात कैडर के अधिकारी रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी के भरोसेमंद अधिकारी माने जाते थे। केंद्र सरकार ने राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग को कहीं ज़्यादा पारदर्शी बनाने के लिए जिस इलेक्ट्रॉल बांड्स का प्रस्ताव रखा था, उससे 2017 में चुनाव आयोग सहमत नहीं हुआ था लेकिन 2018 में मुख्य चुनाव आयुक्त एके जोती ने इस प्रस्ताव को सही दिशा का क़दम बताया। 08 अक्तूबर, 2018 को चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा वाली प्रेस कांफ्रेंस को तीन घंटे के लिए टाल दिया था।पहले पत्रकारों को साढ़े बारह बजे प्रेस कांफ्रेंस के लिए बुलाया गया था बाद में ये समय साढ़े तीन बजे किया गया।इस बीच दोपहर के एक बजे राजस्थान के अजमेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक रैली को संबोधित करना था। आरोप लगा कि चुनाव आयोग ने समय इसलिए बदला ताकि प्रधानमंत्री की रैली पर अचार संहिता लागू नहीं हो।
मीडिया —-खंभा नहीं, खोमचा बन गया है
भारत में मीडिया लगभग प्राइवेट हाथों में ही है।इसे लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में चौथा खम्भा, खम्भा नहीं बल्कि खोमचा बन गया।इस खोमचे में काम करने वाले पत्रकार भी इस पतन के लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं जितने खोमचे के मालिक. आज मीडिया पर बिक जाने के आरोप हैं। समूल्य खबर दिखाने एवं छापने के आरोप हैं। चुनिंदा ख़बरों को छुपाने के आरोप हैं।दलगत पक्षपात के आरोप हैं। ये वही सब आरोप हैं जो एक भ्रष्ट दलाल पर होते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि मीडिया मुंहजोर और बेशरम हो चुका है। अपराधी को बेगुनाह और बेगुनाह को अपराधी बनाने में लगा हुआ है।
याद कीजिये, यही मीडिया कांग्रेस सरकार के समय सरकार से सवाल करती थी लेकिन मोदी सरकार में विपक्ष से सवाल किया जा रहा है।जो मीडिया संस्थान या पत्रकार सवाल करने की हिम्मत जुटा पाते हैं उन्हें धमकियां मिल रही हैं, गालिया मिल रही हैं,उन्हें चैनल्स से निकलवा दिया जा रहा है।संस्थानों पर सरकारी छापे डाले जा रहे हैं।इस दौर में मीडिया का जितना पतन हुआ शायद ही कभी हुआ हो।
इतनी संस्थाओं को लोकतांत्रिक मूल्यों से तो डिगा ही दिया है हमारे प्रिय प्रधानमंत्री ने. बस सेना को बख़्श दीजिए. हिंदुस्तान और पाकिस्तान के निज़ाम में बुनियादी अंतर यही है कि हमारे यहां सेना सत्ता के खेल में साझेदार नहीं रही है. बख़्श दीजिए प्लीज़!
“देशभक्ति हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकती। मेरा आश्रय मानवता है। मैं हीरे के दाम में काँच नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जिंदा हूं, मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।”
(रविन्द्र नाथ टैगोर)
पुलवामा हमले के बाद देश में गुस्सा है और देश के लिए कुछ कर गुज़रने की भावना चरम पर है. 15 अगस्त, 26 जनवरी के बाद फिर से जनसमूह तिरंगे लेकर सड़क पर निकल पड़ा है. भारत माता की जय की गूंज दूर तक सुनाई दे रही है।सब कुछ ठीक है लेकिन राष्ट्रवाद की इस आंधी में कुछ ऐसा भी हो रहा है जो ठीक नहीं है, जो आतंकियों के मंसूबों को कामयाब बनाता है, जो देश की एकता को चोट पहुंचाता है, जो अपने ही देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करता है,जो नफ़रत को जन्म देता है,जो आपसी भाईचारे के लिए चुनौती पैदा करता है.
इसलिए देशभक्ति के कुछ स्वरूप मुझे डराते हैं. मुझे डर तब लगता है, जब इसके बहाने कुछ उपद्रवी लोग भारत माता की जय के नारे लगाते हुए देहरादून में कश्मीरी छात्राओं के हॉस्टल को घेर लेते हैं. मुझे डर लगता है, जब कुछ लोग पटना में छोटे-छोटे कश्मीरी दुकानदारों को घेर लेते हैं और जब एक कश्मीरी पूछता है कि मेरी क्या ग़लती है को उसका गला पकड़ लिया जाता है.
डर लगता है मुझे टीवी देखने से. टीवी चैनलों का उन्माद सबसे आगे है. एंकरों ने सीमा पर लड़ाई का एलान कर दिया गया है. स्टूडियो वॉर रूम बना दिए गए हैं जहां चार लोग एअर कंडीशनर रूम में बैठकर पूरी लड़ाई की योजना बना दे रहे हैं. हमारे पास क्या हथियार हैं, उन्हें कैसे इस्तेमाल करना है? सब टीवी पर बैठे उन्मादी एंकर तय कर दे रहे हैं. मानो, इन्हें ही सीमा पर जाकर लड़ना हो.
टीवी के बाहर भी कहीं कहीं वैसा ही उन्माद दिखाई पड़ता है. जब शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देना चाहिए तब लोग श्रद्धांजलि की आड़ में अपने हित साध रहे हैं.हंसी-ठिठोली के साथ, हाथों में मोमबत्तियां लेकर किसकी मौत का शोक मनाया जा रहा है? मज़े के लिए नारे लग रहे हैं, श्रद्धांजलि सभाओं में फ़ोटो अच्छी आये इसका ज्यादा ख्याल रखा जा रहा है. जब पीड़ित परिवारों की मदद की कोशिश होनी चाहिए तब राजनेता शहीद सिपाही की शव यात्रा में हाथ हिलाने और फोटो खिंचाने के लिए पहुँच रहे हैं.
देश का मुसलमान दवाब, तनाव और इसकी समानार्थी सभी तरह की स्थितियों का सामना कर रहा है. दवाब है अपनी देशभक्ति साबित करने का, दवाब है कि एक हिंदू की अपेक्षा तेज़ आवाज़ में पाकिस्तान मुर्दाबाद कहने का, दवाब है एक हिंदू की अपेक्षा आतंक के खिलाफ़ ज़्यादा विरोध प्रदर्शन करने का और एक हिंदू की अपेक्षा आतंक के खिलाफ ज़्यादा तीखी फ़ेसबुक पोस्ट करने का. उन्हें शक की निगाह से देखे जाने का मौसम लौट आया है.
निशाने पर मुसलमान एक्टर, लेखक, कवि,समाजसेवी सब हैं. आमिर खान और नसरूदीन शाह से पूछा जा रहा है कि उनके बच्चों को अब डर नहीं लगता. पूछा जा रहा है कि सलमान,शाहरुख़, जावेद अख्तर और सैफ अली खान ने घटना पर शोक जताया या नहीं? जताया तो कब जताया? उसमें कितनी देरी की?जल्दी जताया तो उनके शब्द क्या थे? स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाला हर मुसलमान शक के नज़रिए से देखा जा रहा है। मुसलमान पड़ोसी की गतिविधियों का हिसाब रखा जा रहा है.
मुसलमान के बाद सबसे ज़्यादा सेक्युलर और लिबरल जमात निशाने पर हैं. सवाल जेएनयू के छात्रों से पूछा जा रहा है. सवाल कन्हैया कुमार, शेहला राशिद से पूछा जा रहा है। बरखा दत्त, रविश कुमार, राजदीप सरदेसाई, अभिसार शर्मा जैसे पत्रकारों को फोन करके, मैसेज करके धमकियां दी जा रही हैं. सवाल अवार्ड वापसी करने वाले लेखकों और कवियों से पूछा जा रहा है. लगता ऐसा है कि देश की सरकार यही लोग चला रहे हैं. सारी ज़िम्मेदारी इन्हीं की है. जिनसे सवाल पूछा जाना चाहिए वे नारे लगा और लगवा रहे हैं.
हर विपक्षी पार्टी जो भाजपा के ख़िलाफ़ खड़ी है, निशाने पर है. फर्ज़ी ख़बरों, फ़ोटोज़ की बाढ़ आ गयी है. राहुल गांधी की फ़ोटो के साथ पुलवामा में अटैक करने वाले आतंकी की फ़ोटो जारी की जा रही है. अफ़वाह फैलाई जा रही है कि कुछ दिन पहले प्रियंका गांधी दुबई में पाक सेना-चीफ़ से मिली थी. पाकिस्तान के जश्न के विडीओ भारत के बता कर शेयर किए जा रहे हैं . सीरिया और बग़दाद के विडीओ भारत के बता कर फैलाए जा रहे हैं. व्हाट्सएप मैसेज के ज़रिए नफ़रत फैलायी जा रही है.
अब सवाल यह कि ये कौन लोग हैं? जो सबसे सवाल कर रहे हैं लेकिन प्रधानमंत्री से,गृहमंत्री से,कश्मीर के राज्यपाल से इनका कोई सवाल नहीं है. सरकार चला रही पार्टी और उनके नेताओं से इनका कोई सवाल नहीं है. क्या ये लोग जिम्मेदार लोगों से सवाल करने से डरते हैं? या क्या ये लोग इन्हीं के साथी संगी है? जवाब हम और आप अच्छे से जानते हैं.
चुनाव बस आने को है. आतंकी घटना सरकारी पार्टी, भाजपा के लिए संजीवनी का काम कर रही है. उनको मन मुताबिक़ पिच मिल गयी है जो उनकी विचारधारा और उसकी मौक़ापरस्ती को ख़ूब सूट करती है. इस पिच पर वे फ्रंटफुट पर खेलते हैं. पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारों के बीच किसान, जवान और बेरोज़गारों के सारे मुद्दे पीछे रह जाएंगे. भाजपाईयों के लिए एक ऐसा प्लेटफ़ोर्म तैयार हो गया है जिस पर आसानी से वोटों की खेती की जा सकती है. अमित शाह की तरफ से पार्टी नेताओं को इशारा भी दिया जा चुका है. प्रधानमंत्री के लिए चुनावी भाषणों में बोलने के लिए अच्छा मैटेरियल भी जुट गया है. वैसे भी छद्म राष्ट्रवाद आतंकवाद और पाकिस्तान के बिना फल-फूल नहीं सकता.
इन सबके बीच अहम बात यह है कि बॉर्डर पर जा कर भारत का सिपाही ही लड़ेगा, जान भी वही गंवाएगा और उसी का परिवार सब कुछ सहेगा लेकिन क्या नफ़रत की आग लगाने वाले लोगों को असल में सैनिकों की कोई फ़िक्र है? क्या ये लोग जवान तेजबहादुर के साथ तब खड़े हुए थे जब उसने सेना के खाने की क्वालिटी पर सवाल उठाया था? क्या ये लोग शहीद हेमराज के परिवार के साथ आए थे जब परिवार सड़क पर दर-दर की ठोंकरें खा रहा था? क्या इन्होंने कभी माँग की कि जब अर्धसैनिक बल का जवान को नौकरी के बाद पेंशन मिले और जब ड्यूटी पर मौत हो जाए तो उसे शहीद का दर्जा और शहीद वाली सुविधाएँ मिलें? क्या जब सैनिक जंतर मंतर पर अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे थे इन्होंने उनका साथ दिया? इन सारे सवालों का जवाब नहीं है क्योंकि फ़िरक़ापरस्त ताक़तों को इससे मतलब ही नहीं हैं. ये बस ये तय करने में लगे हैं कि बातचीत से हल निकालने की सलाह देशभक्ति है या लड़ाई लड़ने की सलाह देशभक्ति है? समस्या का समाधान क्या हो सकता है इन्हें उस पर बात नहीं करनी, उन्हें तय करना है कि इनकी परिभाषा में देशभक्त कौन हैं और देशद्रोही कौन हैं?
शहीद सैनिकों के प्रति हमारी जो ज़िम्मेदारी है वो हम अपनी हैसियत के हिसाब से पूरी कर रहे हैं. लेकिन आपने क्या किया? जब तक आपने बताया नहीं तब तक आप देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं पाएंगे.हाँ, अगर आप नफ़रत अच्छे से फैला पा रहे हैं, आपकी आवाज़ में ग़ुस्सा दिख रहा है, आप वीर रस की ज़ोरदार कविता गा रहे हैं या कापी पेस्ट कर रहे हैं, आप अगर सोनू निगम की तरह सेक्युलर लोगों को गाली दे रहे हैं, आप ग्रांडमास्टर शीफ़ू और पायल रोहतगी की तरह धर्मनिरपेक्षता को निशाने पर ले रहे हैं तो कमल की मुहर वाला देशभक्ति का सर्टिफिकेट ले जाइए.
पर नफ़रती लोगों को मालूम होना चाहिए कि पुलवामा में शहीद एक जवान कश्मीर का नसीर अहमद है पिछले दिनों औरंगजेब नाम के कश्मीरी जवान ने भी शहादत दी थी. मुशर्रफ़ ने अपनी भारत यात्रा के दौरान जब भारत में मुसलमानों की स्थिति पर चिंता ज़ाहिर करने के बहाने भारत को नीचा दिखाने की कोशिश की थी तब मौलाना महमूद मदनी ही थे जिन्होंने उसे ज़ोरदार जवाब देकर उसकी बोलती बंद कर दी थी. ये वो देश है जहां देश के सबसे लोकप्रिय भजन शकील बदायूंनी ने लिखे, मोहम्मद रफ़ी ने गाए और नौशाद और ख़य्याम ने उन्हें संगीतबद्ध किया.
इस देश की मूल आत्मा को बहुत लोग बदलने की कोशिश में लगे हैं. उन्हें सभी पहचानते हैं, पर उनकी धूर्त साज़िशों को भी पहचानना होगा.
मुनव्वर राणा साहब ने ठीक ही फ़रमाया है
“बस इतनी सी बात पर उसने हमें बलवाई लिखा है
हमारे घर के एक बर्तन पर “आईएसआई” लिखा है”
हम क्या कर सकते हैं?
आतंकवाद और उससे पैदा होने वाली समस्या से सरकार को लड़ना है. हमारा काम उसकी नीति और नीयत पर पैनी नज़र रखना है. हम आतंक से घर बैठे बोलकर, लिखकर, नारे लगाकर, मोमबत्ती जला कर, शोकसभा में शामिल होकर नहीं लड़ सकते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि ये सब ना करें, जरूर करें, लेकिन ध्यान रखें हमारा विरोध प्रदर्शन केवल हँसी-ठिठोली न बन जाए, श्रद्धांजलि सभाएं केवल फ़ोटो खिंचवाने का मौक़ा न बन जाएं, ये मौक़ा किसी धर्म विशेष का विरोध न बन जाए.
ऐसा न हो जाये कि कल तक जो महिला पर छींटाकशी कर रहा था वो आज देशप्रेम के नारे लगा रहा हो.
आतंकवादी और पाकिस्तान में बैठे उनके आका आतंकी गतिविधियों के ज़रिए न केवल भय फैलाना चाह रहे हैं बल्कि इस देश की एकता अखंडता, धर्मनिरपेक्षता पर चोट करना चाहते हैं. वो चाहते हैं कि देश के मुसलमानों को ये बताया जाए कि भारत देश उनके लिए सुरक्षित नहीं है और हम एक कौम के खिलाफ़ नफ़रत बढ़ा कर उनका काम आसान बना रहे हैं.
जब परिवार पर कोई बाहरी हमला करता है तो परिवार को आपसी भेद भुलाकर एक होना पड़ता है. मुश्किल वक्त में देश के भिन्न-भिन्न विचारों वालों को और मजबूती के साथ एक होना पड़ता है. ध्यान रखना पड़ेगा कि इस नाज़ुक मौक़े का कोई राजनीतिक इस्तेमाल तो नहीं कर रहा.
अगर हम और आप सचेत नहीं हुए तो आपके आक्रोश की आंच पर कोई अपनी चाय की केतली चढ़ाता रहेगा और आपको भनक भी नहीं लगेगी.